Wednesday, 23 December 2020
डिनर छोड़ें : चुस्त दुरुस्त निरोग रहें
बॉलीवुड के सुपरस्टार अक्षय कुमार से एकबार पत्रकारों ने पूछा कि आपकी सेहत का क्या राज है। अक्षय कुमार का जवाब विल्कुल ही आयुर्वेद के सूत्रों पर आधारित था। अक्षय ने कहा कि मैं कभी भी सूरज डूबने के बाद डिनर (रात्रि भोजन) नहीं करता। हमेशा सूर्यास्त के पहले डिनर कर लेता हूं। इसके बाद अक्षय ने इसके फायदे बताए, तो सबलोग दंग रह गए और जब अक्षय ने सूर्यास्त के बाद डिनर करने के नुकसान बताए, तो लोग एकदम से डर गए।
दरअसल यह आयुर्वेद का सूत्र है—
चरक संहिता और अष्टांग संग्रह भी रात में खाने से बचने के लिए कहता हैं;क्योंकि उस समय जठराग्नि, जो खाना पचाने का काम करती हैं,बहुत कमजोर रहती है. जैसे-जैसे सूर्य ढलता है, जठराग्नि भी मंद पड़ने लगती है.
सायं भुक्त्वा लघु हितं समाहितमना: शुचि:|
शास्तारमनुसंस्मृत्य स्वशय्यां चाथ संविशेत ||
रात्रौ तु भोजनं कुर्यातत्प्रथमप्रहरान्तरे|
किञ्चिदूनंसमश्नयाद्दुर्जरं तत्र पर्जयेत् ||
रात का भोजन सूर्यास्त के पूर्व ही कर लेना चाहिए और पेट भरकर नहीं खाना चाहिए, पेट को कुछ खाली रखकर ही भोजन करना चाहिए.
हिंदुओं के प्राचीन शास्त्रों में भी यह कहा गया है कि, “चत्वारि नरक्द्वाराणि प्रथमं रात्रिभोजनम्”, मतलब रात्रिभोजन नरक का पहला द्वार है| 'नरक के द्वार' से अभिप्राय यहां अस्वस्थता ही समझें.
"जो व्यक्ति शराब, मांस, पेय, सूर्यास्त के बाद खाता है और जमीन के नीचे उगाई सब्जियों का उपभोग करता है; उस व्यक्ति के किये गए तीर्थयात्रा, प्रार्थना और किसी भी प्रकार कि भक्ति बेकार हैं|"
- महाभारत (रिशिश्वरभरत)
जैन धर्म में भी सूर्यास्त के बाद भोजन निषिद्ध है. वे तो अबतक पालन कर रहे हैं.
भगवान बुद्ध भी अपने भक्तों को आयुर्वेद का ये उपदेश देते हुए कहा करते थे कि स्वस्थ और युवा रहना चाहते हो, तो कभी भी सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करो। हमेशा सूर्य डूबने से पहले भोजन कर लो और किसी हाल में सूर्यास्त के बाद कुछ भी न खाओ। लोग उनकी बात मान कर ऐसा ही करते थे और मोटापे सहित कई गंभीर वीमारियों से बचे रहते थे, पर बाद में लोगों ने यह कहकर इसका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया कि चूंकि प्राचीन काल में बिजली नहीं थी, इसीलिए लोग जल्दी खाना खा लेते थे। ऐसा कहने वाले लोगों ने देर रात डिनर करने की आदत लगायी. बहुत पहले लोग रात में नहीं खाते थे. गांव के लोग तो विल्कुल ही नहीं खाते थे. और, अब हाल यह है कि मोटापा दुनिया में महामारी बन चुका है।
अब जब यही बात अमेरिका और यूरोप के वैज्ञानिक शोध (रिसर्च) के बाद कह रहे हैं, तो सबके कान खड़े हुए हैं।
अगर आप सूरज डूबने से पहले डिनर कर लेंगे, तो यह तय है कि आपको मोटापे की समस्या से कभी नहीं जूझना पड़ेगा और अगर आप मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं, तो आपको इससे जरूर मुक्ति मिल जाएगी। अगर आप कब्ज, गैस या दूसरी तरह की पेट की बीमारियों से जूझ रहे हैं या फिर पेट बाहर निकल रहा है, तो सूर्यास्त से पहले भोजन करना इसका रामबाण इलाज है। इससे कब्ज, गैस और दूसरी पेट की वीमारियों से मुक्ति मिलेगी। दरअसल डिनर करने और बेड पर सोने जाने के बीच गैप (समय का अंतर) होना चाहिए। ऐसा न हो कि रात 10 बजे डिनर किया और 10.30 बजे सो गए। जब ऐसा होता है, तो इससे पेट से संबंधित समस्याएं पैदा होती है। कब्ज, गैस और दूसरी समस्याएं होती हैं। इन्हीं समस्याओं से हृदय व्याधि भी होती है.
जब हम सोने जाते हैं तो हमारे शरीर के अधिकांश अंग रेस्ट मोड में चले जाते हैं;पर जब हम देर से डिनर करते हैं, तो हमारा डाइजेस्टिव सिस्टम सोते वक्त भी पूरी तेजी से काम करता रहता है। इस वजह से गहरी नींद नहीं आती, नींद कई बार टूट भी जाती है, निद्रा-चक्र में व्यवधान होता है, जिससे कलेजे में जलन महसूस होता है. रात में भोजन करने से पेशाब में वृद्धि और उत्सर्जन की आवश्यकताएं बढ़ जाती हैं, जिससे अनावश्यक निद्रा-नाश होता है. अगर हम सूर्यास्त के पहले भोजन कर लेंगे, तो सुबह सोकर उठने पर खुद को ताजा-ताजा महसूस करेंगे। सुबह से ही अच्छे मूड में बने रहेंगे.
बहुत से लोग ये कहने लगते हैं कि हमारा जीवन शैली ही कुछ ऐसी है कि जल्दी नहीं खा सकते, पार्टियों में जाना पड़ता है या फिर प्रोफेशन ही ऐसा है। बॉलीवुड में अपनी फिटनेस के लिए खिलाड़ियों के खिलाड़ी के नाम से मशहूर अक्षय कुमार कहते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं सूर्यास्त के बाद डिनर नहीं करता। अगर अक्षय ऐसा कर सकते हैं, तो आप क्यों नहीं? आपको चुस्त-दुरुस्त और निरोगी बने रह
ना है, तो डिनर छोड़ ही दें. यह भारतीय संस्कृति है भी नहीं.
विनय आयुर्वेदा
Sunday, 20 December 2020
ऐसी वनस्पति(लकड़ी ) जो मधुमेह के अलावा अनेक रोग जड़ से खत्म कर देती है
प्रकृति ने हमे रोग से साथ उसके निवारण के लिए अनेक प्रदान की है जिसका उपयोग हमारे पूर्वज खुद करके स्वस्थ रहते थे उन्हें किसी चिकित्सक के पास नही जाना पड़ता था एक ऐसी वनस्पति(लकड़ी) के बारे में आपको जानकारी प्रदान कर रहा हु आप उपयोग करे यह लकड़ी आपको बाजार में मिल जाएगी बस ध्यान रहे लकड़ी सही हो .... अगर आपको न मिले मुझसे संपर्क करे 8460783401
दिन में कम से कम 8-10 गिलास पानी पीने से आप कई बीमारियों से बचे रहते है। कुछ लोग तो स्वस्थ रहने के लिए तांबे या पीतल के बर्तन में भी पानी पीते है लेकिन क्या आप जानते है कि लकड़ी के बर्तन में पानी पीने से आप कई बीमारियों से बच सकते है। पुराने समय में भी लोग लकड़ी के बर्तन में पानी पीते थे, जिससे वो कई गंभीर बीमारियों से दूर रहते थे। लकड़ी के बर्तन में पानी पीने शरीर में से जहरीले तत्व बाहर निकल जाते हैं, जिससे आप कई बीमारियों से बचे रहते है। आज हम आपको बताएगे कि किस लकड़ी के बर्तन में पानी पीने से आप अर्थराइटिस से लेकर डायबिटीज जैसी समस्याओं से बचे रह सकते है। तो आइए जानते है लकड़ी के बर्तन में पानी पीने के फायदे।
विजयसार की लकड़ी
भारत, नेपाल और श्रीलंका में पाई जाने वाली विजयसार की लकड़ी से बने बर्तन में पानी पीने से आपकी कई समस्याए दूर हो सकती है। आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार विजयसार की लकड़ी में औषधीय गुण होने के कारण इसमें पानी पीने से कई रोग दूर हो जाते है। हल्के या गहरा लाल रंग की यह लकड़ी आपको किसी आयुर्वेदिक औषधि की दुकान से मिल जाएगी। इसके अलावा आप इस लकड़ी से बने गिलास लेकर इसमें पानी पी सकते है।
सेवन करने का तरीका
विजयसार की सूखी लकड़ी के 25 ग्राम टुकड़े को पीस लें। इसके बाद एक मिट्टी का बर्तन में पानी डालकर इस लकड़ी के पाउडर को मिक्स करें। सुबह इसे छानकर खाली पेट पीएं। इसके अलावा रोजाना दिन में 8-10 गिलास पानी इस लकड़ी के बर्तन में डालकर पीने से आप कई बीमारियों से बचे रह सकते है।
लकड़ी के बर्तन में पानी पीने के फायदे
1. डायबिटीज
इस लकडी के बर्तन में रात भर पानी रखें और सुुबह खाली पेट पीएं। इससे आपका शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है। डायबिटीज के मरीजों के लिए इस बर्तन में पानी पीना बहुत फायदेमंद है। इसके अलावा इस लकड़ी के पाउडर पीने से आप डायबिटीज इस समस्या को खत्म भी कर सकते है।
2. अर्थराइटिस
हड्डियों के कमजोर होने की वजह से कई लोगों को गठिया और जो़ड़ों में दर्द की समस्या हो जाती है, जिसे अर्थराइटिस भी कहते है।। ऐसे में इस लकड़ी के बर्तन या इसका पानी पीने से शरीर में 'यूरिक एसिड' कम होता हैं, इस रोग में राहत मिलती है।
3. दिल के रोग
स्वस्थ दिल के लिए 'ब्लड सर्कुलेशन' का ठीक से काम करना बहुत जरूरी है। इसके लिए लकड़ी के बर्तन में रखा पानी पीएं जिससे शरीर का कोलेस्ट्रोल 'कंट्रोल' में रहता है और दिल की बीमारियां नहीं होती।
4. उच्च रक्त-चाप
इस लकड़ी का या इसके बर्तन में पानी पीने से ब्लड प्रैशर कंट्रोल में रहता है। इससे आप उच्च रक्त-चाप की समस्या से बचे रहते है। इसके अलावा इसका पानी पीने से हाथ-पैरों के कंपन्न भी दूर होती है।
5. त्वचा के रोग
स्किन एलर्जी, खाज-खुजली और बार-बार फोडे-फिंसी होने की समस्या को दूर करने के लिए दिन में दो बार इस लकड़ी का पानी पीएं। इससे आपकी हर स्किन प्रॉब्लम दूर हो जाएगी।
6. वजन घटाना
इस लकड़ी का पानी पीने से शरीर का 'एक्स्ट्रा फैट' कम होता है, जिससे आपका मोटापा कुछ समय में ही कम होने लगता है। इसके अलावा इस लकड़ी के बर्तन में पानी पीने से वजन जल्दी कम होता है।
Wednesday, 16 December 2020
Tuesday, 15 December 2020
डायबिटीज --इनमें से कोई भी लक्षण दिखे तो करा लें जांच, हो सकती है डायबिटीज
दुनियाभर में डायबिटीज के सबसे ज्यादा मामले भारत में ही हैं. भारत की लगभग 5 फीसदी आबादी डायबिटीज से पीड़ित है. जिन लोगों में डायबिटीज होने की अधिक संभावना होती है, उनमें पहले से ही कई लक्षण सामने आते हैं. लेकिन, जानकारी न होने की वजह से लोग डायबिटीज के इन लक्षणों को पहचान नहीं पाते हैं, और समय पर इलाज ना होने की वजह से वो डायबिटीज की गिरफ्त में आ जाते हैं, सामान्यतः मधुमेह यानि डायबिटीज़ तीन प्रकार की होती है, टाइप- 1 डायबिटीज, टाइप- 2 डायबिटीज और टाइप- 1.5 डायबिटीज .
डायबिटीज के क्या क्या लक्षण हो सकते हैं
जरूरत से ज्यादा प्यास लगना
वेसे तो भरपूर मात्रा मे पानी पीना आपकी सेहत के लिय लाभप्रद है लेकिन अगर आपको जरूरत से ज्यादा प्यास लगती है तो यह भी डायबिटीज के लक्षण हो सकते हैं. आपके ज्यादा प्यास लगने का सबसे बड़ा कारण आपका बार-बार टॉयलेट जाना है. ज्यादा भूख लगना, मुंह का सूखना या फिर एक दम से वनज बढ़ना या घटना भी टाइप- 2 डायबिटीज के लक्षण हैं।
अधिक थकान महसूस होना
अगर पूरी नींद लेने के बाद भी आपको थकान महसूस होती है तो ये भी चिंता का विषय हो सकता है. दरअसल, डायबिटीज से पीड़ित लोगों के शरीर में कार्बोहाइड्रेट सही तरह से ब्रेक नहीं हो पाता है. इस वजह से खाने से मिलने वाली एनर्जी शरीर को पूरी तरह से नहीं मिलती है. थकान डायबिटीज टाइप 2 के आम लक्षणों में से एक है जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं.
बिना किसी वजह का वजन कम होना
अगर आपका वजन बिना किसी वजह के कम हो रहा है तो ये डायबिटीज का लक्षण हो सकता है. डायबिटीज़ एक मेटाबॉलिक समस्या है जिसमें आपके शरीर में ब्लड शुगर स्तर उच्च होता है. इसके दो कारण हो सकते हैं, या तो ये कि आपके शरीर में इंसुलिन का निर्माण न हो पा रहा हो या फिर ये कि आपका शरीर इंसुलिन के लिए प्रतिक्रिया नहीं कर पा रहा हो, या फिर ये दोनों ही कारण हो सकते हैं.
आंखों से धुंधला दिखाई देना
डायबिटीज के लक्षणों में एक लक्षण ये भी है कि इस बीमारी में आंखों की रोशनी पर फर्क पड़ता है और आपको धुंधला दिखाई देता है. डायबिटीज की समस्या आपके आंखों के रेटिना औऱ उसकी महीन रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करती है, अगर समय पर इसका पता ना लगाया जाए तो आपको डायबिटिक रेटिनोपैथी नामक समस्या का सामना करना पड़ सकता है. इसके कारण आपके आंखों में सूजन आ जाती है औऱ यह सूजन आपकी आंखों में अनावश्यक रक्त वाहिकाएं बढा देती है जिससे खून आने की समस्या भी हो सकती है.
घाव का जल्दी ठीक नहीं होना
डायबिटीज रोगियों में त्वचा का संक्रमण या घाव का रहता है खतरा. डायबिटीज के मरीजों को चोट लगने से परहेज करना चाहिए अन्यथा घाव जल्दी ठीक नहीं होता है, और कई बार तो पस बनने लगती है और इंसान के अंग को काटना भी पढ़ता है। इसके अलवा डायबिटीज के मरीज को जब चोट लगती है तो खून का बहना भी जल्द बंद नहीं होता है कई बार बहुत ज्यादा खून बह जाने से इंसान की जान चली जाती है।
Monday, 14 December 2020
वर्तमान कोरोनाकाल में विटामिन ई की कमी आपको बीमार बना सकती है - विटामिन ई की कमी दूर करने के उपाय
विटामिन ई हमारी बॉडी के लिए जरूरी पोष्क तत्व है जिसकी कमी से शरीर में कई तरह के रोग होने लगते हैं। विटामिन ई वसा में घुलनशील एक विटामिन है। इसकी मुख्य भूमिका एक एंटीऑक्सिडेंट के रूप में कार्य करना है। कोरोनाकाल में बॉडी में विटामिन ई की कमी को जांचना बेहद जरूरी है। विटामिन ई इम्यून सिस्टम को वायरस और बैक्ट्रिया के खिलाफ मजबूत रखने के लिए मदद करता है। जब हमारे शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटामिन ई नहीं मिल पाता तो हमारे शरीर में विटामिन ई की कमी होती है। विटामिन ई की आवश्यकता पुरूष और महिलाओं में उम्र और शारीरिक स्थिति के मुताबिक अलग-अलग होती है।
विटामिन ई की कमी के लक्षण: खड़ा होने में तकलीफ होना, मांस पेशियों का कमजोर होना, आंखों से धुंधला दिखाई देना, पाचन का कमजोर होना और तंदुरुस्त महसूस नहीं होना इस बीमारी के प्रमुख लक्षण है।
विटामिन ई की जांच और उसकी भरपाई:
खून में विटामिन ई की कमी को कुछ टेस्ट करके आसानी से जांचा जा सकता है। इस विटामिन की कमी की भरपाई डाइट के जरिए आसानी से की जा सकती है। आइए हम आपको बताते हैं कि आप अपनी डाइट में किन चीजों का सेवन करके विटामिन ई की कमी को दूर कर सकते हैं।
सूरजमुखी के बीज देंगे भरपूर विटामिन ई:
सूरजमुखी के बीज में विटामिन ई के अलावा मैग्नीशियम, कॉपर, विटामिन बी1, सेलेनियम और फाइबर मौजूद रहता है। आप सूरजमुखी के बीज को अपने ब्रेकफास्ट में बेहद आसानी से शामिल कर सकते हैं।
बादाम:
बॉडी में विटामिन ई की कमी को दूर करना है तो बादाम का सेवन करें। तकरीबन एक औंस बादाम से आपको 7.3 मिलीग्राम विटामिन ई प्राप्त होता है। वैसे बादाम के सेवन से आपकी याददाश्त तेज होती है, वजन कंट्रोल रहता है, मोटापा और दिल की बीमारियों का जोखिम भी कम होता है।
पाइन नट:
हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक बादाम की तरह ही पाइन नट्स में भी विटामिन ई पाया जाता है। दो टेबलस्पून पाइन नट से आपको करीबन 3 मिलीग्राम विटामिन ई प्राप्त होता है।
एवोकैडो:
एवोकाडो कई पोषक तत्वों का एक समृद्ध स्रोत है, जैसे पोटेशियम, ओमेगा −3 एस, और विटामिन सी और विटामिन के। आधा एवोकाडो भी आपके विटामिन ई की दैनिक आवश्यकता का 20 प्रतिशत तक होता है। वैसे आम और कीवी में भी विटामिन ई होता है, लेकिन एवोकाडो में विटामिन ई की मात्रा अधिक पाई जाती है।
पीनट बटर:
मूंगफली और उसकी मदद से बनने वाले मक्खन में विटामिन ई प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। महज दो टेबलस्पून पीनट बटर के सेवन से आप अपने शरीर के विटामिन ई की दैनिक आवश्यकता का 18 प्रतिशत प्राप्त कर सकते हैं।
Saturday, 12 December 2020
गिलोय के फायदे व उपयोग - उत्तम जैन (प्राकृतिक चिकित्सक)
गिलोय के फायदे - आयुर्वेद में अमृत तुल्य माने जाने वाली गिलोय को अमृता भी कहा जाता है गिलोय मानव जाति के लिए कितनी फायदेमंद है पढ़े
1- डायबिटीज:-विशेषज्ञों के अनुसार गिलोय हाइपोग्लाईसेमिक एजेंट की तरह काम करती है और टाइप-2 डायबिटीज को नियंत्रित रखने में असरदार भूमिका निभाती है। गिलोय जूस (giloy juice) ब्लड शुगर के बढे स्तर को कम करती है, इन्सुलिन का स्राव बढ़ाती है और इन्सुलिन रेजिस्टेंस को कम करती है। इस तरह यह डायबिटीज के मरीजों के लिए बहुत उपयोगी औषधि है।
2- डेंगू:-डेंगू से बचने के घरेलू उपाय के रुप में गिलोय का सेवन करना सबसे ज्यादा प्रचलित है। डेंगू के दौरान मरीज को तेज बुखार होने लगते हैं। गिलोय में मौजूद एंटीपायरेटिक गुण बुखार को जल्दी ठीक करते हैं साथ ही यह इम्युनिटी बूस्टर की तरह काम करती है जिससे डेंगू से जल्दी आराम मिलता है।
3- अपच:-अगर आप पाचन संबंधी समस्याओं जैसे कि कब्ज़, एसिडिटी या अपच से परेशान रहते हैं तो गिलोय आपके लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है। गिलोय का काढ़ा, पेट की कई बीमारियों को दूर रखता है। इसलिए कब्ज़ और अपच से छुटकारा पाने के लिए गिलोय का रोजाना सेवन करें।
4- खांसी;-अगर कई दिनों से आपकी खांसी ठीक नहीं हो रही है तो गिलोय का सेवन करना फायदेमंद हो सकता है। गिलोय में एंटीएलर्जिक गुण होने के कारण यह खांसी से जल्दी आराम दिलाती है। खांसी दूर करने के लिए गिलोय के काढ़े का सेवन करें।
5- बुखार:-गिलोय या गुडूची (Guduchi) में ऐसे एंटीपायरेटिक गुण होते हैं जो पुराने से पुराने बुखार को भी ठीक कर देती है। इसी वजह से मलेरिया, डेंगू और स्वाइन फ्लू जैसे गंभीर रोगों में होने वाले बुखार से आराम दिलाने के लिए गिलोय के सेवन की सलाह दी जाती है।
6– इम्युनिटी बढ़ाने में सहायक :-बीमारियों को दूर करने के अलावा शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना भी गिलोय के फायदे में शामिल है। गिलोय सत्व या गिलोय जूस (Giloy juice) का नियमित सेवन शरीर की इम्युनिटी पॉवर को बढ़ता है जिससे सर्दी-जुकाम समेत कई तरह की संक्रामक बीमारियों से बचाव होता है।
7- पीलिया:-पीलिया के मरीजों को गिलोय के ताजे पत्तों का रस पिलाने से पीलिया जल्दी ठीक होता है। इसके अलावा गिलोय के सेवन से पीलिया में होने वाले बुखार और दर्द से भी आराम मिलता है। गिलोय स्वरस (Giloy juice) के अलावा आप पीलिया से निजात पाने के लिए गिलोय सत्व का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
कॅरोना आयुर्वेद दृष्टि में - एक उपचार
कोरोना एक कफ है, पर ये एक सूखा कफ है। हमारे डाक्टर जितनी भी एंटीबायटिक दवाईयां देते हैं वो कफ को सुखाने के लिए देते है लेकिन ये पहले ही सूखा हुआ कफ है तो इस पर कोई असर नहीं होता। इसी वजह से इसका इलाज अभी तक नहीं ढूंढा जा सका क्योंकि वो *अपने दायरे से हटकर नहीं सोच रहे।
पर आयुर्वेद में इसका बहुत ही सरल व सीधा निदान है। आयुर्वेद में कहा गया है कि कफ की बीमारी को काटना सबसे आसान है।
अब मैं इस बीमारी को काटने का सूत्र आपको समझाता हूं* जोकि पूर्णतः वैज्ञानिक है। आयुर्वेद के हिसाब से प्रत्येक खाद्य वस्तु के गुण बताएं गए है। जैसे हर खाद्य पदार्थ अपनी प्रकृति के अनुसार या तो कफनाशक (कफ को नष्ट करने वाले) होता है या कफवर्धक( कफ को बढाने वाले) होता है। अब जिसको कोरोना है उसको एक बंद कमरे में क्वारंटाईन करके हमें सीधा सा काम ये करना है कि उसको कफवर्धक खाद्य वस्तुओं को देना बंद करना है और ज्यादातर कफनाशक चीजों का सेवन कराना है।जब इस वायरस को अपने बढ़ने के लिए खाद्य पदार्थ ही नही मिलेगा और जो मिलेगा वह कफ को नष्ट करने वाला है तो मैं गारंटी देता हूं पांच दिन के अंदर यह नष्ट हो जाएगा और मरीज ठीक हो जाएगा।
अब कफवर्धक चीजों की लिस्ट देख लीजिए जो कि काफी लंबी हैः-
1. कोई भी घी, तेल,दूध, लस्सी,पनीर, दही।
2. प्याज, आलू, उडद की दाल, चने की दाल, अरबी, शकरकन्दी, फूलगोभी, बंदगोभी, शिमला मिर्च, टमाटर, लहसुन, मशरुम।
3. संतरा, सेब, केला, ग्लूकोज,
4.बिस्कुट, गेहूं का आटा, ब्रेड।
नोटः- अंग्रेजी डाक्टर यही गलती कर रहे है क्योंकि वो कफवर्धक चीजों का सेवन मरीज को करा रहे हैं।
कफनाशक चीजें देख लिजिए:
1. अदरक, हल्दी, तुलसी, काली मिर्च।
2. शिलाजीत, मुलेहठी, आमलकी रसायन, काला बांसा।
3. जौ की रोटी, मूंग दाल, घीया, तोरई, जीरा, सेंधा नमक,
4. मीठा अनार, चीकू, नारियल पानी।
मैं इसके पांच इलाज नीचे लिख रहा हूं, जिनमें से हर एक इलाज अपने आप में इसके निदान के लिए पर्याप्त है :
1. कोरोना मरीज को सिर्फ अदरख, हल्दी, तुलसी और काली मिर्च (पाउडर रुप में) का दूध देते रहे। गाय का दूध वो भी देशी हो तो सर्वोत्तम है। उसे कुछ और ना दे। दिन में तीन टाईम ये देते रहें। एक गिलास दूध में मिलाकर गर्म करके। हां वो पानी पी सकता है अगर चाहे तो, पर वो भी गर्म होना चाहिए। 5 दिन लगातार इस प्रक्रिया से मरीज पूर्णत स्वस्थ हो जाएगा और कोरोना खत्म हो जाएगा। इसे ऐसे समझें कफ का सोर्स बंद। कफ खत्म।
2. दिन में तीन टाईम दूध के साथ एक एक चम्मच शिलाजीत रोगी को दे। अर्थात तीन गिलास दूध और तीन चम्मच शिलाजीत। उसे कुछ और ना दे। शिलाजीत अत्यंत कफनाशक है। दिन में तीन टाईम ये देते रहें। एक गिलास दूध में मिलाकर गर्म करके। हां वो पानी पी सकता है अगर चाहे तो, पर वो भी गर्म होना चाहिए। 5 दिन लगातार इस प्रक्रिया से मरीज पूर्णत स्वस्थ हो जाएगा और कोरोना खत्म हो जाएगा। कफ नाशक चीजें इस कफजनित बीमारी को बहुत जल्द ठीक करेंगी।
3. एक चम्मच मुलेहठी को दूध के साथ दें। दिन में तीन बार। और हां दूध हमेशा गर्म ही होना चाहिए। उसे कुछ और ना दे। दिन में तीन टाईम ये देते रहें। एक गिलास दूध में मिलाकर गर्म करके। हां वो पानी पी सकता है अगर चाहे तो, पर वो भी गर्म होना चाहिए। 5 दिन लगातार इस प्रक्रिया से मरीज पूर्णत स्वस्थ हो जाएगा और कोरोना खत्म हो जाएगा। याद रखें ये शुगर के मरीज को ना दें क्योंकी मुलेहठी मीठी होने शुगर को बहुत ज्यादा बढा देती है।
4. अभ्रक भस्म (शतपुटी) शहद या मलाई या दुध में मिलाकर तीन वक्त दें खाली पेट। अभ्रक भस्म की मात्रा 1 ग्राम के आसपास होनी चाहिए। उसके लेने के दो घंटे बाद मरीज को एक गिलास दूध दें। ऐसा दिन में तीन बार करे। मरीज को और कुछ ना दे। लगातार पांच दिन यही प्रक्रिया चलनी चाहिए। हां गर्म पानी पी सकता है मरीज।
5. काला बांसा को जलाकर उसकी राख शहद में मिलाकर दें। और दो घंटे बाद गाय का दूध दे एक गिलास गर्म। दिन में तीन बार ऐसा करे। लगातार पांच दिन यही करे।
दूध वैसे तो कफवर्धक है परन्तु गाय या बकरी का दूध में कफनाशक चीजें मिलाकर खाने से इसकी प्रवृत्ति बदल जाती है। भैंस का दूध ज्यादा कफवर्धक होता है बजाय की गाय या बकरी के दूथ के।इसके अलावा कुछ अन्य उपचार नीचे हैः
1. अन्य कफनाशक चीजों का सेवन। हां अनुपान रुप में सिर्फ गाय का गरम दूध ही लें।
2. जहां मरीज हो उस कमरे का तापमान 45-50 डिग्री तक रखें। उसे लगातार पसीना आएगा और उसका कफ जलना शुरु हो जाएगा। ये कोरोना के विकास के लिए विषम परिस्थिति का निर्माण करता है। जिससे इस वायरस को फैलने में स्वयं रुकावट हो जाएगी।
3. अगर पेशेंट में इतनी शक्ति है कि वो रनिंग कर सकता है तो वो आधा घंटा सवेरे आधा घंटा शाम को दौड लगाए चाहें कितना ही मंदी क्यों ना दौडा जाए पर लगातार आधा घंटा दौडते रहें। यहाँ विज्ञान ये है कि जब शरीर में मेहनत होती है तो सबसे पहले कफ जलता है। ऐसा करने से उसका कफ जलेगा। हां खान पान में ये ध्यान रखना है कि कोई भी कफवर्धक चीज ना ले। जौं की रोटी खाए। और घी या तोरी या मूंग की दाल खाए। वो भी कम।
Friday, 11 December 2020
इम्यूनिटी पर होता है असर -आमला खाये सर्दियों में
सर्दियों में आंवले का सेवन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) सही बनी रहती है जिससे सर्दी-खांसी से बचा जा सकता है.
आंवला (Amla) एक ऐसा सूपर फूड है, जो सेहत के लिए कई तरह से फायदेमंद होता है. आंवले में भरपूर मात्रा में विटामिन-सी (Vitamin-C), आयरन (Iron) और कैल्शियम (Calcium) पाया जाता है. आंवले की खास बात ये है कि इसको कई तरह से खाया जा सकता है. कुछ लोग आंवले का मुरब्बा खाते हैं, तो वहीं कुछ लोग आंवले का जूस, चटनी या अचार बनाकर अपनी पंसद अनुसार सेवन करते हैं. सर्दियों में गुड़ के साथ आंवले का सेवन करने से शरीर में गर्माहट बनी रहती है और कई बीमारियों से बचाव भी होता है. सर्दियों में आंवले का सेवन करने से इम्यूनिटी (Immunity) सही बनी रहती है जिससे सर्दी-खांसी से बचा जा सकता है. आइए आपको बताते हैं कि क्यों आपको ठंड के मौसम में आंवला जरूर खाना चाहिए.
इम्यूनिटी मजबूत करता है
आंवले में भरपूर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है. ये शरीर की इम्यूनिटी पावर मजबूत करने में मदद करता है जिससे शरीर बाहरी संक्रमण से बचा रहता है.
दिल के लिए फायदेमंद
आंवले में पाया जाने वाला विटामिन-सी दिल की सेहत के लिए भी फायदेमंद होता है. जो लोग बैड कोलेस्ट्रोल की समस्या से जूझ रहे हैं, उनको आंवले का सेवन जरूर करना चाहिए.
स्किन को खूबसूरत बनाए
स्किन की खूबसूरती को बनाए रखने के लिए भी विटामिन सी जरूरी होता है. विटामिन सी के सेवन से स्किन टाइट रहती है. त्वचा पर जल्दी झुर्रियां नहीं पड़ती हैं. स्किन में ग्लो बना रहता है. इसके लिए आप चाहें तो दही में आंवले का पाउडर मिलाकर चेहरे पर लगा सकते हैं.
सूजन कम करता है
शरीर में मौजूद फ्री रेडिकल्स हार्ट और स्किन के साथ शरीर की इम्यूनिटी पर भी बुरा असर डालते हैं. दरअसल, फ्री रेडिकल्स शरीर की सूजन के लिए भी जिम्मेदार होते हैं, जो कई सारी बीमारियों को जन्म देने का काम करते हैं. लेकिन आंवले में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स, फ्री रेडिकल्स को न्यूट्रलाइज कर शरीर की सूजन को दूर करने में मदद करते है
Thursday, 10 December 2020
सोरायसिस रोग - उपचार - परहेज
आयुर्वेद के अनुसार, सोरायसिस वात और कफ दोषों के कारण होता है
सोरायसिस त्वचा से जुड़ी ऑटोइम्यून डिजीज है। इस रोग में त्वचा पर कोशिकाएं तेजी से जमा होने लगती हैं। सफेद रक्त कोशिकाओं के कम होने के कारण त्वचा की परत सामान्य से अधिक तेजी से बनने लगती है, जिसमें घाव (skin lesions) बन जाता है। यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है। इन्वर्स सोरायसिस : शरीर के जो हिस्से मुड़ते हैं , वहां पर इसका सबसे ज़्यादा असर देखने को मिलता है. सोरायसिस एक स्किन संबंधी बीमारी है, जिसे स्किन का अस्थमा भी कहा जाता है। इसमें स्किन सेल्स काफी तेजी से बढ़ते हैं। इसमें स्किन की ऊपरी परत पर पपड़ी बन जाती है और वह छिल जाती है।
इससे स्किन में शुष्कता आ जाती है और सफेद धब्बे पड़ जाते हैं पस्ट्युलर सोरायसिस : इसमें लाल चकत्तों के इर्द-गिर्द सफेद चमड़ी जमा होने लगती है. - एरिथ्रोडर्मिक सोरायसिस : यह सोरॉसिस का सबसे ख़तरनाक रूप है जिसमें खुजली के साथ तेज़ दर्द भी होता है
सोयरायसिस रोग इतने प्रकार के होते हैंः-
प्लेक सोरायसिस (Plaque Psoriasis)
प्लेक सोरायसिस एक आम तरह का सोरायसिस है। 10 लोगों में 8 लोग इसी सोरायसिस के शिकार होते हैं। प्लेक सोरायसिस के कारण शरीर पर सिल्वर (चांदी) रंग और सफेद लाइन बन जाती है। इसमें लाल रंग के धब्बे के साथ जलन होने लगती है। यह शरीर के किसी भी हिस्से पर हो सकती है, लेकिन ज्यादातर कोहनी, घुटने, सिर, पीठ में नीचे की ओर होती है। इसमें त्वचा पर लाल, छिलकेदार मोटे या चकत्ते निकल आते हैं। इनका आकार दो-चार मिमी से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है।
गटेट सोरायसिस (Guttate Psoriasis)
यह अक्सर कम उम्र के बच्चों के हाथ पांव, गले, पेट या पीठ पर होती है। यह छोटे-छोटे लाल-गुलाबी दानों के रूप में दिखाई पड़ती है। यह ज्यादातर हाथ के ऊपरी हिस्से, जांघ और सिर पर होती है। तनाव, त्वचा में चोट और दवाइयों के रिएक्शन के कारण यह रोग होता है। इससे प्रभावित त्वचा पर प्लेक सोरायसिस की तरह मोटी परतदार नहीं होती है। अनेक रोगियों में यह अपने आप, या इलाज से चार छह हफ्तों में ठीक हो जाती है। कभी-कभी ये प्लाक सोरायसिस में भी परिवर्तित हो जाती है।
पस्चुलर सोरायसिस (Pustular Psoriasis)
ये एक दुर्लभ तरह का रोग है। ये ज्यादातर वयस्क में पाया जाता है। इसमें अक्सर, हथेलियों, तलवों या कभी-कभी पूरे शरीर में लाल दानें हो जाते हैं, जिसमें मवाद हो जाता है। ये देखने में संक्रमित प्रतीत होता है। यह ज्यादातर हाथों और पैरों में होता है, लेकिन यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इसके कारण कई बार बुखार, मतली आदि जैसी समस्याएं भी हो जाती हैं।
सोरियाटिक अर्थराइटिक (Psoriatic Arthritis)
ये सोरायसिस और अर्थराइटिस का जोड़ है। 70 फीसदी रोगियों में तकरीबन 10 साल की उम्र से इस सोरायसिस की समस्या रहती है। इसमें जोड़ों में दर्द, उंगलियों और टखनों में सूजन आदि जैसी समस्याएं होती हैं।
एरिथ्रोडर्मिक सोरायसिस (Erythrodermic Psoriasis)
इसमें चेहरे सहित शरीर की 80 प्रतिशत से अधिक त्वचा पर जलन के साथ लाल चकत्ते हो जाते हैं। शरीर का तापमान असामान्य हो जाता है। हदय की गति बढ़ जाती है। यह पूरी त्वचा में फैल जाती है। इससे त्वचा में जलन भी होती है। इसमें खुजली, ह्रदय गति बढ़ने और शरीर का तापमान कम ज्यादा होने जैसी समस्याएं होती हैं। इसके कारण संक्रमण, निमोनिया भी हो सकता है।
इन्वर्स सोरायसिस (Inverse Psoriasis)
इसमें स्तनों के नीचे, बगल, कांख, या जांघों के ऊपरी हिस्से में लाल-लाल बड़े चकत्ते बन जाते हैं। ये ज्यादा पसीने और रगड़ने के कारण होते हैं।
सोरायसिस रोग के लक्षण
सोरायसिस होने पर ये लक्षण दिखाई देते हैंः-
- त्वचा पर सूजन के साथ लाल चकत्ते होना
- लाल चकत्तों पर सफेद पपड़ी जैसी मृत त्वचा होना
- रूखी त्वचा होना और उसमें दरारें पड़ना, खून निकलना आदि
- त्वचा के चकत्तों में दर्द होना
- चकत्तों के आसपास खुजली और जलन महसूस होना
- नाखून मोटे और उनमें दाग-धब्बे पड़ जाना
- जोड़ों में दर्द और सूजन होना
सोरायसिस होने के कारण
सोयरायसिस की समस्या इन कारणों से हो सकती हैः-
रोग प्रतिरोधक शक्ति के कमजोर होने से
जब शरीर की रोग प्रतिरक्षा शक्ति कमजोर हो जाती है, तो नयी कोशिकाएं तेजी से बनने लगती हैैं। यह त्वचा इतनी कमजोर होती है कि पूरी बनने से पहले ही खराब हो जाती हैं। इसमें लाल दाने और चकत्ते दिखाई देने लगते हैं।
आनुवांशिक (वंशानुगत रूप से) रूप से
- यह एक आनुवांशिक बीमारी है, जो परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी एक से दूसरे को होती है।
- अगर माता-पिता में से किसी एक को यह रोग है, तो बच्चों को यह रोग होने की सम्भावना 15% तक बढ़ जाती है।
- अगर माता-पिता दोनों को यह बीमारी है तो बच्चों को यह रोग होने की सम्भावना 60% अधिक हो जाती है।
इन्फेक्शन (संक्रमण)
- कई बार वायरल या बैक्टीरियल इन्फेक्शन भी इस रोग का कारण बनता है।
- यदि आप गले के अलावा त्वचा के इंफेक्शन से पीड़ित हैं, तो ये सोरायसिस से ग्रस्त हो सकते हैं।
- यदि आपके घर में कोई व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित है, तो यह समस्या आपको भी हो सकती है।
सोरायसिस होने के अन्य कारण
- त्वचा पर कोई घाव जैसे- त्वचा कट जाना, मधुमक्खी काट लेना या धूप में त्वचा का झुलसना। यह सोयरासिस होने का कारण बन सकता है।
- तनाव, धूम्रपान और अधिक शराब का सेवन करने से भी सोयरासिस से ग्रस्त हो सकते हैं।
- शरीर में विटामिन डी की कमी होने, एवं उच्च रक्तचाप से संबंधित कुछ दवाइयां खाने से भी यह रोग होता है।
सोरायसिस से प्रभावित होने वाले अंग
सोरायसिस 20 से 30 वर्ष की आयु में होती है, जो शरीर के इन अंगों में हो सकती हैः-
- हथेलियों
- पांव के तलवे
- कोहनी
- घुटने
- सोयसाइसिस पीठ पर अधिक होता है।
- सोयराइसिस किसी भी उम्र में नवजात शिशुओं से लेकर वृद्धों को भी हो सकती है।
सोरायसिस में आपका खान-पान
पोषण वाला भोजन नहीं खाने से भी इस रोग का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा तनाव और मानसिक विकार होने, शराब और धूम्रपान जैसी आदतों से भी सोरायसिस बढ़ सकता है। इसलिए सोयरासिस में आपका खान-पान ऐसा होना चाहिएः-
- पौष्टिक भोजन का सेवन करें।
- शराब, धूम्रपान आदि से दूर रहें।
सोरायसिस में आपकी जीवनशैली
सोरायसिस में आपकी जीवनशैली ऐसी होनी चाहिए ताकि बीमारी जल्द ठीक हो सकेः-
- तनाव मुक्त जीवनशैली जीने की कोशिश करें।
- त्वचा को सूखा रखने की कोशिश करें।
- सूरज की तेज रोशनी से त्वचा की रक्षा करें।
डॉक्टर की सलाह के बिना दवा ना लें
दवा का साइड इफेक्ट भी सोरायसिस का कारण बनता है। दर्द-निवारक दवाएं, मलेरिया, ब्लडप्रेशर कम करने की दवाएं लेने से सोरायसिस की बीमारी हो सकती है। अगर बीमारी पहले से है तो अधिक बढ़ सकती है।
शराब और धूम्रपान ना करें
जो लोग नियमित रूप से मदिरापान और धूम्रपान करते हैं। उनको इस बीमारी का खतरा बहुत बढ़ जाता है।
सोरायसिस से ग्रस्त लोगों का आहार ऐसा होना चाहिएः-
- अनाज: पुराना चावल, गेहूं, जौ दाल: अरहर, मूंग, मसूर दाल फल एवं सब्जीया सहजन, टिण्डा, परवल, लौकी, तोरई, खीरा, हरिद्रा, लहसुन, अदरक, अनार, जायफल अन्य: अजवाइन, शुंठी, सौंफ, हिंग, काला नमक, जीरा, लहसुन, गुनगुना पानी का सेवन करें
सोरायसिस से ग्रस्त लोगों को इनका सेवन नहीं करना चाहिएः-
- अनाज: नया धान, मैदा,
- दाल: चना, मटर, उड़द
- फल एवं सब्जियां: पत्तेदार सब्जियाँ– सरसों, टमाटर, बैंगन, नारंगी, नींबू, खट्टे अंगूर, आलू, कंद–मूल
- अन्य: दही, मछली, गुड़, दूध, अधिक नमक. कोल्ड्रिंक्स, संक्रमित/फफूंदी युक्त भोजन, अशुद्ध एवं संक्रमित जल
- सख्त मना: तैलीय मसालेदार भोजन, मांसहार और मांसाहार सूप, अचार, अधिक तेल, अधिक नमक, कोल्डड्रिंक्स, मैदे वाले पर्दाथ, शराब, फास्टफूड, सॉफ्टडिंक्स, जंक फ़ूड, डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ, तला हुआ एवं कठिनाई से पाचन वाला भोजन
- विरुद्ध आहार: मछली + दूध
- सोरायसिस की बीमारी में आपकी जीवनशैली ऐसी होनी चाहिएः-
- दिन में न सोएं।
- भोजन के बाद टहलें।
- पहले वाला भोजन पचे बिना न खाएं।
- हल्का व्यायाम करें।
- तनाव मुक्त जीवनशैली जीने की कोशिश करें।
- त्वचा को सूखा रखने की कोशिश करें।
- सूरज की तेज रोशनी से त्वचा की रक्षा करें।
- गुस्सा, डर, और चिंता न करें।
- पेशाब और शौच को न रोकें।
- आसमान में बादल होने पर ठंडे जल का सेवन करें।
- पूर्वी हवाओं का अत्यधिक सेवन करें।
- गर्म पानी में सेंधा नमक, मिनरल ऑयल, दूध या जैतून का तेल मिलाएं और उससे नहाएं। यह त्वचा को राहत प्रदान करती है और लालीपन औ जलन को भी कम करती है। नहाने के तुरंत बाहर मॉइश्चराइजर लगाएं। स्वस्थ आहार का सेवन करना सोरायसिस के दौरान एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।
- आयुर्वेद मे कुछ औषधिया पंचतिक्त गुगग्लू ,आरोग्यवर्धनी बटी , तालकेश्वर रस , गंधक रसायन , महा मंजिस्था घन , खदिरारिष्ट सहित अनेक औषधी उपयोगी है मगर बिना आयुर्वेदचार्य की सलाह से न लेवे - ज्यादा जानकारी के लिए - 8460783401
पैरों में जलन के कारण और उपाय
हाथों-पैरों में जलन की समस्या को छोटा समझ अक्सर लोग इग्नोर कर देते हैं। मगर असल में इसके कारण ना सिर्फ अहसनीय दर्द बल्कि खुजली जैसी परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। कई बार तो इसके कारण चलना भी मुश्किल हो जाता है। हालांकि कुछ लोग इसके लिए दवाइयों या क्रीम का सहारा लेते हैं लेकिन आप सस्ते व घरेलू नुस्खो से भी इसका इलाज कर सकते हैं।पैरों में होने वाली जलन को दूर करने से पहले हम आपको यह बताते हैं कि आखिर यह समस्या होती क्यों है?
पैरों के तलवे में जलन के कारण
पैरों के तलवों में जलन तब होती है जब पैरों में ब्लड सर्कुलेशन कम हो और लंबे समय तक खड़े हो कर काम करना पड़े। हालांकि यह ज्यादातर उन्हें होता है जो बूढ़े हो चुके हैं या फिर जो लोग डायबिटीज के मरीज है। वहीं कम उम्र में इस समस्या का कारण शरीर में पोषक तत्व जैसे विटामिन बी, फोलिक एसिड या कैल्शियम की कमी भी हो सकता है। इसके अलावा पैरों के तलवे में जलन होने के और भी कारण हो सकते हैं जैसे...-क्रोनिक किडनी रोग (युरिमिया)
-लघु फाइबर न्यूरोपैथी-शराब का सेवन और कम थाईराइड हार्मोन का स्तर|
-लाइम की बीमारी और एचआईवी
-माइलॉयड पोली न्यू थेरेपी
-दवाइयों या कीमोथेरेपी के साइड-इफैक्ट्स
-रक्त वाहिकाओं की सूजन
-गुर्दे से जुड़ी बीमारी
-रक्त वाहिकाओं में संक्रमण
पैरों में जलन की समस्या बहुत आम है. अगर आपके भी पैरों में जलन होती है तो इन घरेलू नुस्खों को अपना सकते हैं. पैरों में जलन का इलाज (Burning sensation in feet) बहुत सरल है
अक्सर लोगों को पैरों में जलन (Burning Sensation in Feet) की परेशानी होती रहती है. कुछ लोगों के पैरों में जलन की समस्या रोजाना होती है. कई बार यह पैरों में जलन होना गंभीर बीमारी का भी संकेत होता है. हलांकि ज्यादातर मामलों में यह थकान या कमजोरी के वजह से होता है. जिनको पैरों में जलन कभी-कभी होती है उनके लिए पैरों में जलन के घरेलू नुस्खे फायदेमंद होते हैं. अगर यह समस्या रोजाना होती है तो शरीर में विटामिन और पोषक तत्वों के लेवल की जांच करानी चाहिए. हम यहां पर पैरों में जलन का इलाज घरेलू नुस्खे के तौर पर बता रहे हैं
हल्दी से पैरों में जलन का इलाज- हल्दी में मौजूद एंटीइंफ्लेमेंटरी प्रोपर्टी इस परेशानी से राहत दिलाने का कारगर उपाय है. 1 बड़े चम्मच हल्दी में पर्याप्त मात्रा में पानी मिलाकर पेस्ट बनाएं. इसे अपने तलवों पर अच्छी तरह लगाएं. 5 मिनट ऐसे ही रहने दें और फिर इसे अच्छी तरह धो लें. आप चाहे तो इस पेस्ट को ठंडा करके भी लगा सकती हैं
सेंधा नमक है पैरों में जलन की दवा - पैरों में जलन की दवा अगर कोई है तो सेंधा नमक है. इसके लिए आप एक टब गुनगुने पानी में एक चौथाई कप सेंधा नमक मिलाएं. इसमें अपने पैरों को 10 से 15 मिनट तक डुबोकर रखें. इसके बाद पैरों को अच्छी तरह पोंछ लें. इससे आपको किसी तरह के दर्द और सूजन से भी राहत मिलेगी
करेले के पत्ता है पैरों में जलन से बचने का उपाय- पैरों की जलन से बचने का उपाय करेले के पत्ता में भी छुपा है. कुछ करेले की पत्तियां लें और इसे अच्छी तरह धो लें. अब इसमें पर्याप्त मात्रा में पानी मिलाकर इसका पेस्ट बना लें. इसे अपने पैरों और तलवों पर अच्छी तरह लगाएं. 10 मिनट बाद धो लें. दिन में दो बार ऐसा करे
सेब का सिरका से पैर के तलवे में जलन होना बंद हो जाता है -एप्पल साइडर विनेगर से पैर के तलवे में जलन होना बंद हो जाती है. अगर आपके घर में मौजूद हो, तो इसे भी पैरों की जलन से राहत पाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके लिए आप एक टब में पानी लें और इसमें 2-3 चम्मच एप्पल साइडर विनेगर मिलाएं. इसमें पैरों का 10 से 15 मिनट डुबोकर रखें.
ठंडा पानी भी पैर के तलवे में जलन का उपचार- किसी प्रकार की जलन हो ठंडा पानी रामबाण इलाज है. पैर के तलवे में जलन का उपचार ठंडा पानी भी कर सकता है. इसके लिए आपको कुछ नहीं करना है, बस एक टब में ठंडा पानी लें और पैरों को इसमें 5 मिनट तक डुबोकर रखें. दो मिनट बाद फिर इसे 5 मिनट तक डुबोकर रखें. दो से तीन बार ऐसा करें.
Wednesday, 9 December 2020
एसिडिटी आम्लपित्त )होने के कारण ओर उपचार - अम्लं विदग्धं च तत्पित्तं अम्लपित्तम्
अम्लं विदग्धं च तत्पित्तं अम्लपित्तम्
सर्वप्रथम् यह जानना आवश्यक है कि अम्ल पित्त है क्या है ? आयुर्वेद में कहा गया है- अम्लं विदग्धं च तत्पित्तं अम्लपित्तम्। जब पित्त कुपित होकर अर्थात् विदग्ध होकर अम्ल के समान हो जाता है, तो उसे अम्ल पित्त रोग की संज्ञा दी जाती है। पित्त को अग्नि कहा जाता है।
त्रिदोषों में अति महत्वपूर्ण पित्त जब कुपित हो जाता है और अम्ल सा व्यवहार करने लगता है तो उसे अम्ल पित्त कहते है। पित्त का सम्बन्ध जठराग्नि से है। जठराग्नि के क्षीण हो जाने से पाचक रसो की शक्ति भी क्षीण हो जाती है। पाचक रस भोजन को पूर्णत: पचाने में असमर्थ हो जाते है। भोजन पेट में ही पड़ा- पड़ा सड़ने लगता है। आमाशय की पाचन प्रणाली बार- बार क्रियाशील हो भोजन को पचाने का प्रयास करती है। बार- बार पाचक रसो एवं अम्ल को स्त्रावित करती है। जिससे शरीर में अम्ल की अधिकता हो जाती है। अम्ल शरीर में अन्य विभिन्न तकलीफों को उत्पन्न करता है। वही अपचा भोजन पड़े- पडे़ सड़ता है और आँतों द्वारा उसी रूप में रक्त में मिल जाता है। रक्त को दूषित कर सम्पूर्ण शरीर को भी दूषित करता है। अम्ल पित्त का यदि सम्यक उपचार ना किया जाए तो वह आगे चलकर नये रोगों को जन्म देता है। अम्ल पित्त मात्र एक रोग नहीं है। अपितु शरीर में उपस्थित अन्य रोगों का परिणाम है।
सामान्यत: अम्ल पित्त को पाचन तन्त्र का एक रोग माना जाता है। जिसका कारण खान-पान की अनियमितता माना जाता है, परन्तु अम्ल पित्त का मूल कारण मानसिक द्वन्द है। जो व्यक्ति मानसिक रूप से अत्यधिक परेशान रहते है। अपने प्रियजनों पर भी जिसे विश्वास ना हो, जो हर समय स्वयं को असुरक्षित समझे। वे ही मुख्यत: इस रोग से ग्रस्त माने जाते है। समय के साथ यदि अम्ल पित्त बढ़ जाये तो यह अल्सर में बदल जाता है। अम्ल अधिक बन जाने पर वह पाचन अंगों पर घाव बना देता है।
अम्ल पित्त रोग के कारण
अम्ल पित्त रोग मुख्य रूप से मानसिक उलझनों और खान-पान की अनियमितता के कारण उत्पन्न रोग है जिसके प्रमुख लक्षण है-- भोजन सम्बन्धी आदतें अम्ल पित्त रोग का एक प्रमुख कारण है। कुछ व्यक्तियों में अयुक्ताहार-विहार से यह रोग हो जाता है। जैसे- मछली और दूध को एक साथ मिलाकर खाने से यह रोग हो जाता है।
- इसके अतिरिक्त बासी और पित्त बढ़ाने वाले भोजन का सेवन करने से भी अम्ल पित्त रोग होता है। डिब्बाबंद भोजन का अत्यधिक सेवन करना भी अम्ल पित्त रोग को दावत देता है।
- भोजन कर तुरन्त सो जाना या भोजन के तुरन्त बाद स्नान करने से भी यह रोग हो जाता है।
- अम्ल पित्त रोग भोजन के बाद अत्यधिक पानी पीने से भी होता है। ठूस-ठूस कर खाने से भी ये रोग हो जाता है।
- यकृत की क्रियाशीलता में कमी होना भी इस रोग का प्रमुख कारण है।
- यदि दूषित एवं खट्टे-मीठे पदार्थो का अधिक सेवन किया जाए तो भी यह रोग हो जाता है।
- मल-मूत्र के वेग को रोककर रखना भी इस रोग की उत्पत्ति का कारण है।
- नशीली वस्तअुों का अत्यधिक सेवन करना भी इस रोग का एक कारण है।
- इस रोग का एक कारण उदर की गर्मी को बढ़ाने वाले पदार्थो का अधिक सेवन करना है।
- अत्यधिक अम्लीय पदार्थो का बार- बार सेवन करने से भी यह रोग हो जाता है।
- कई व्यक्ति अत्यधिक भोजन कर दिन में सो जाने की आदत होती है जिससे यह रोग हो जाता है।
- दाँतों के रोगों के कारण भी अम्लपित्त रोग होने की सम्भावना रहती है।
- भोजन के तुरन्त बाद खूब पानी पीना भी इस रोग की प्रमुख वजह है।
- अम्ल पित्त रोग का ऋतु परिवर्तन और स्थान परिवर्तन से अति गहरा सम्बन्ध है।
- अम्लता उत्पन्न करने वाली औषधियों के निरन्तर सेवन से भी यह रोग हाता है।
अम्ल पित्त रोग के लक्षण
- अपचन एवं कब्ज का सदैव बना रहना इस रोग का एक प्रमुख लक्षण है।
- इस रोग के रोगी की आँखें निस्तेज हो जाती है।
- जीभ पर सदैव हल्की सफेद- मैली परत जमी रहती है।
- त्वचा मटमैली एवं खुरदुरी हो जाती है।
- भोजन ठीक से नहीं पचता और कभी-कभी उल्टी भी होती है।
- यदि उल्टी के साथ हरे-पीले रंग का पित्त भी निकले तो यह अम्ल पित्त का प्रमुख लक्षण समझना चाहिए।
- अम्ल पित्त के रोगी को कड़वी और खट्टी ड़कारे आती है।
- गले और सीने में तीव्र जलन होती है।
- जी का मचलना, मुँह में कसौलापन एवं उबकाईयाँ आती है।
- ऐसा व्यक्ति सदैव बेचैन और घबराया हुआ रहता है।
- उदर में भारीपन रहता है।
- अम्ल पित्त के रोगियों का मल निष्कासन के समय गर्म रहता है।
- कभी-कभी पतले दस्त भी होते है।
- मूत्र का रंग लाल-पीलापन लिये हुए होता है।
- रोग की तीव्र अवस्था में शरीर में छोटी- छोटी फुन्सियाँ हो जाती है जिन पर खुजली भी होती है।
- कई बार व्यक्ति आँखों के आगे अन्धेरा छा जाने की भी शिकायत करता है।
- सिर में भारीपन एवं दर्द बना रहता है।
- शरीर में सुस्ती एवं थकान बनी रहती है। ऐसा व्यक्ति सदैव विचित्र एवं अनजाने भय से ग्रसित रहता है।
- कई बार व्यक्ति के सम्पूर्ण शरीर में जलन होती है। रोगी हाथों, पैरों, आँखों और सिर पर जलन की शिकायत करता है।
- अम्ल पित्त के कई रोगियों में रक्तस्त्राव भी हो जाता हैंं।
- अम्ल पित्त रोग यदि लम्बे समय तक बना रहे तो बाल झड़ने और सफेद होने लगते है।
- अम्ल पित्त रोग जीर्ण हो जाने पर गैस्ट्रिक एवं ड्यूडिनम अल्सर में बदल जाता है।
अम्ल पित्त रोग के दो प्रकार है-
- उध्र्वग अम्ल पित्त- जिस अम्ल पित्त में खट्टा, हरा, नीला, हल्का लाल, काला, चिपचिपा कड़वा वमन, ड़कार होता है तथा हृदय, गले तथा पेट में जलन और हाथ- पैरों में जलन होती है, उध्र्वग अम्ल पित्त कहलाता है।
- अधोग अम्ल पित्त-जिस अम्ल पित्त में गुदा से हरा, पीला, काला, माँस के धोवन के समान रक्तवर्ण अम्ल पित्त निकलता है तथा प्यास और जलन बनी रहती है, अधोग अम्ल पित्त कहलाता है। प्रत्येक रोग के समान ही अम्ल पित्त रोग को भी उसकी अवस्था के आधार पर प्रारम्भिक अम्ल पित्त, मध्यम अम्ल पित्त और तीव्र अम्ल पित्त में भी बाँटा जा सकता है।
अम्ल पित्त रोग की उपचार -
- सौंठ एवं गिलोय का समभाग चूर्ण शहद के साथ सेवन करना उपयोगी है।
- मिश्री को त्रिफला एवं कुटकी के समभाग चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करना उपयोगी है।
- हरड़, गुड़ और छोटी पीपल को समान मात्रा में मिलाकर उसकी गोली बना लें तथा सेवन करें।
- भृंगराज एवं हरीतकी का समभाग चूर्ण गुड़ के साथ मिलाकर सेवन करना उपयोगी है।
- प्र्रतिदिन नाश्ते में एक पका केले को खाये, तत्पश्चात् दूध पी लें। इससे यह रोग दूर हो जाता है।
- 50 ग्राम मुनक्का और 25 ग्राम सौंफ को रात में पानी में भिगाकर रख दें। सुबह इसे मसलकर छान ले। इसमें 10 ग्राम मिश्री मिलाकर इसे पी ले।
- करेले के पत्तों या फूल को घी में भूनकर उसका चूर्ण बना ले। इस चूर्ण को दिन में 2-3 बार एक से दो ग्राम की मात्रा में खायें।
- 20 ग्राम आँवला स्वरस में, 1 ग्राम जीरा चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम पीयें।
- नीमपत्र रस और अडूसा पत्र रस को 20-20 ग्राम एकत्र कर इसमें थोड़ा शहद मिलाकर दिन में 2 बार खायें।
- बच के चूर्ण को 2-4 रती की मात्रा में मधु के साथ सेवन करे।
- शक्कर में श्वेत जीरे के साथ धनिये का चूर्ण समान मात्रा में मिलाकर खाये।
- जौ अथवा गेहूँ अथवा चावल के सत्तू को मिश्री में मिलाकर खाना चाहिए।
- नीम की छाल, गिलोय व पटोल का काढ़ा बनाकर उसमें शहद डालकर पीने से लाभ मिलता है।
- सूखे आँवले को रात भर भिगोकर रख दें। सुबह उसमें जीरा और सौंठ मिलाकर बारीक पीस ले। इस मिश्रण को दूध में घोलकर पीयें।
- भोजन के पश्चात् दूध के साथ इसबगोल लेते रहने से अम्ल पित्त रोग कभी नहीं होता है।
- छोटी या बड़ी हरड़ का 3 ग्राम चूर्ण और 6 ग्राम गुड़ को मिलाकर दिन में 3 बार खायें।
- मिश्री को कच्चे नारियल के पानी में मिलाकर सेवन करे।
- भोजन के 1 घण्टे बाद आँवले का 5 ग्राम चूर्ण लेना चाहिए।
- अनार के रस में जीरा मिलाकर खाने से अम्ल पित्त रोग दूर हो जाता है।
- भुने हुए जीरे व सेंधा नमक को संतरे के रस में डालकर पीये। इससे अम्ल पित्त रोग का शमन हो जाता है।
- 50 ग्राम प्याज को महीन-महीन काट ले। इससे गाय के ताजे दही में मिलाकर खायें।
- अदरक और अनार के 6-6 ग्राम रस को मिलाकर पी लेने से यह रोग दूर हो जाता है।
- मूली के स्वरस में कालीमिर्च का चूर्ण और नमक मिलाकर खाने से अम्ल पित्त रोग में लाभ मिलता है।
- प्रत्येक भोजन के बाद एक लौंग खा लेनी चाहिए।
- ठण्डा दूध पीने से अम्ल पित्त रोग में लाभ मिलता है।
आहार
- आहार चिकित्सा में पूर्ण प्राकृतिक एवं ताजे भोज्य पदार्थो को शामिल करे। अत्यधिक तले-भुने, गरिष्ठ और मिर्च-मसाले युक्त आहार कदापि ना ले।
- रोगी को फलों में ताजे फल जैसे- नारंगी, आम, केला, पपीता देना चाहिए। कुछ समय के पश्चात् खूबानी, खरबूज, चीकू, तरबूज, सेब भी दे सकते है।
- सूखे मेवे में अखरोट, खजूर, मुनक्का, किशमिश देना चाहिए। कुछ दिनों तक रोगी की सामथ्र्यानुसार सेब का पानी, नारियल का पानी, खीरा और सफेद पेठे आदि का रस देना चाहिए।
- तोराई, टिण्डा, लौकी, परवल आदि की सब्जियाँ रोगी को खाने को दें। रोग के कम हो जाने पर मेथी, चौलाई, बथुआ आदि सब्जियाँ दी जा सकती है। यदि रोगी की आलू खाने की इच्छा हो तो रोगी को आलू उबालकर खाने को दें। ध्यान रखे यदि रोगी आलू ग्रहण कर रहा है तो आलू के साथ अन्य पदार्थ कदापि ना ले।
- अम्ल पित्त रोग में कच्चे नारियल का दूध और गूदा का उपयोग करना चाहिए।
- आँवले और अनार का रस भी अम्ल पित्त रोग में उपयोगी है।
एसिडिटी होने के कारण (Causes of Acidity)
- अत्यधिक मिर्च-मसालेदार और तैलीय भोजन करना।
- पहले खाए हुए भोजन के बिना पचे ही पुन भोजन करना।
- अधिक अम्ल पदार्थों के सेवन करने पर।
- पर्याप्त नींद न लेने से भी हाइपर एसिडिटी की समस्या हो सकती है।
- बहुत देर तक भूखे रहने से भी एसिडिटी की समस्या होती है।
- कुछ वर्ष पहले हम जल्दबाजी, चिंता और तीखा आहार यह एसिडिटी के कारण मानते थे। लेकिन इससे केवल तत्कालिक एसिडिटी होती है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार अब इसका असली कारण एच. पायलोरी जीवाणु है। यह संक्रमण दूषित खान-पान से होता है।कुछ लोगों को गरम खाना, शराब, ऍलर्जी और तले हुए पदार्थों के कारण तत्कालिक अम्लपित्त होता है। ज्यादातर यह शिकायत कुछ समय बाद या उल्टी के बाद रूक जाती है। गर्भावस्था में कभी कभी अंतिम महिनों में जादा आम्लता महसूस होती है। तंबाखू खाने से या धूम्रपान के कारण ऍसिडिटी होती है। अरहर या चना दाल या बेसन के कारण कुछ लोगों को अम्लपित्त होता है। मिर्च खाने से भी ऍसिडिटी होती है। आयुर्वेद से कैसे करे इलाज़-आयुर्वेद में इसका इलाज संशमन और संशोधन दो प्रकार से किया जाता है। संशमन चिकित्सा में औषधियों का प्रयोग किया जाता है और संशोधन में पंचकर्म द्वारा इसका इलाज किया जाता है। इन सभी औषधियों का प्रयोग बिना चिकित्सक के परामर्श के बिल्कुल नही करना चाहिए।
1. अविपत्तिकर चूर्ण
2. सुतशेखर रस
3. कामदुधा रस
4. मौक्तिक कामदुधा
5. अमलपित्तान्तक रस
6. अग्नितुण्डि वटी
7. फलत्रिकादी क्वाथ पंचकर्म चिकित्सा में इसका इलाज़ वमन चिकित्सा द्वारा किया जाता है जिससे इस रोग से पूर्ण रूप से मुक्ति मिल जाती है। NOTE: इलाज के किसी भी तरीके से पहले, पाठक को अपने चिकित्सक या अन्य स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता की सलाह लेनी चाहिए।
Sunday, 6 December 2020
पुरानी खांसी को भी मिनटों में दूर करता है ये होममेड कफ सीरप
सालों पुरानी खांसी को भी 5 मिनट में दूर करता है ये होममेड कफ सीरप !
अब मौसम काफी बदल चुका है। सुबह-शाम ठंडी हवाएं चलने लगी है।
अब मौसम काफी बदल चुका है। सुबह-शाम ठंडी हवाएं चलने लगी है। इस बदलते मौसम का सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। सर्दी-जुकाम, खांसी-बुखार और गले में दर्द और खराश जैसे रोग आजकल बहुत ही आम हो गए हैं। ये सुनने में जितने छोटे और आम लग रहे हैं पीड़ा उतनी ही भयानक देते हैं। अक्सर लोग सर्दी-खांसी होने पर एंटीबायोटिक्स यानि कि अंग्रेजी दवाएं लेते हैं। ये दवाएं हमारी सेहत पर सकारात्मक असर करने के बजाय कभी-कभी बुरा असर कर देती हैं। जिसके चलते बेहतर हैं कि आप कुछ घरेलू तरीकों से ही अपनी मौसमी बीमारियों का इलाज कराएं। सर्दी-जुकाम होने पर आयुर्वेदिक सिरप का इस्तेमाल करने से आपको जल्दी फायदा मिलता है। आज हम आपको खांसी के लिए घर में सिरप बनाने का तरीका बता रहे हैं।
किन चीजों से बनेगा सीरप
करीब 10 से 12 तुलसी के पत्ते
3 से 4 लौंग
4 से 5 काली मिर्च
2 चम्मच शक्कर की चाशनी
चुटकी भर सेंधा नमक
थोड़ी सी सोंठ और दालचीनी पाउडर
और 1 छोटा अदरक का टुकड़ा
बनाने की विधि
इस सिरप को बनाना बहुत ही आसान है। शायद आपने इस सिरप का नाम और इसके बारे में अपनी दादी-नानी से जरूर सुना होगा। पहले के समय में ऐसी मौसमी बीमारियों के लिए इसी तरह घर में सिरप तैयार किया जाता था। अब जानते हैं कैसे बनाना है ये सिरप। इसे बनाने के लिए सबसे पहले तुलसी के पत्ते, लौंग, सेंधा नमक, काली मिर्च, अदरक के टुकड़े, सोंठ और दालचीनी पाउडर को अच्छी तरह पीस कर इसका बारीक पेस्ट बना लें। अब इसे एक गिलास पानी में डालकर अच्छी तरह उबाल लें। जब ये अपनी पहले की मात्रा से पककर आधा रह जाएं तो इसे आंच हल्की कर इसे हटा दें। अब इसे 1 ग्लास में रखें और इसमें 1 चम्मच शहद मिलाएं। आपको सिरप एकदम तैयार है। आप इसे एक बार में 2 से 3 चम्मच पी सकते हैं। आप चाहे तो इसे किसी कांच की शीशी में भरकर रख 1 दिन के लिए रख भी सकते हैं। लेकिन 1 दिन से ज्यादा ना रखें। ये सिरप खांसी के साथ ही सर्दी-जुकाम, गले में दर्द और गले में खराश में भी आराम दिलाता है।
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