Tuesday, 5 September 2017

सोरिआसिस ( छाल रोग )

छालरोग या सोरियासिस (अंग्रेज़ी:Psoriasis) एक चर्मरोग है। सामान्य भाषा में इसे अपरस भी कहते हैं। यह रोग एक असंक्रामक दीर्घकालिक त्वचा विकार है जो कि परिवारों के बीच चलता रहता है। छाल रोग सामान्यतः बहुत ही मंद स्थिति का होता है। इसके कारण त्वचा पर लाल-लाल खुरदरे धब्बे बन जाते हैं। यह दीर्घकालिक विकार है जिसका अर्थ होता है कि इसके लक्षण वर्षों तक बने रहेंगे। ये पूरे जीवन में आते-जाते रहते हैं। यह स्त्री-पुरुष दोनों ही को समान रूप से हो सकता है। इसके सही कारणों की जानकारी नहीं है। अद्यतन सूचना से यह मालूम होता है कि सोरिआसिस निम्नलिखित दो कारणों से होता हैः
  • वंशानुगत पूर्ववृत्ति
  • स्वतः असंक्राम्य प्रतिक्रिया 
  • पहचान ------ लाल खुरदरे धब्बे, त्वचा के अनुपयोगी परत में त्वचा कोशिकाओं की संख्या बढ़ जाने के कारण पैदा होते हैं। सामान्यतः त्वचा कोशिकाएं पुरानी होकर शरीर के तल से झड़ती रहती है। इस प्रक्रिया में लगभग 4 सप्ताह का समय लग जाता है। कुछ व्यक्तियों को सोरिआसिस होने पर त्वचा कोशिकाएं 3 से 4 दिन में ही झड़ने लगती है। यही अधिकाधिक त्वचा कोशिकाओं का झड़ाव त्वचा पर छालरोग के घाव पैदा कर देता है। छालरोग में त्वचा पर लाल, खुरदरे धब्बे, खुजली और मोटापा, चिटकना और हथेलियों या पैर के तलवों में फफोले पड़ना, के लक्षण से पहचाने जाते हैं। ये लक्षण हल्के-फुल्के से लेकर भारी मात्रा में होते हैं। इससे विकृति और अशक्तता की स्थिति पैदा हो सकती है।
    कुछ कारक है जिनसे छाल रोग से पीड़ित व्यक्तियों में चकते पड़ सकते हैं। इन कारकों में त्वचा की खराबी (रसायन, संक्रमण, खुरचना, धूप से जलन) मद्यसार, हार्मोन परिवर्तन, धूम्रपान, बेटा-ब्लाकर जैसी औषधी तथा तनाव सम्मिलित हैं। छाल रोग से व्यक्तियों पर भावनात्मक तथा शारीरिक प्रभाव पड़ सकते हैं। छाल रोग आर्थरायटिस वाले व्यक्तियों को होते हैं। इससे दर्द होता है तथा इससे व्यक्ति अशक्त भी हो सकता है। छाल रोग संक्रामक नहीं है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को नहीं लगता ! प्राय सोरायसिस के रोगी अपने इस रोग को आम दाद-खाज खुजली के रोग से जोड़कर लंबे समय तक इसका उपचार कराने से कतराते रहते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि जब यह रोग काफी पुराना तथा जटिल हो जाता है तब रोगी इसके इलाज के लिए चिंतित होता है। रोग के संदर्भ में विशेष बात यह ध्यान देने योग्य है कि रोग जितना पुराना हो जाता है उसके उपचार में उतना ही समय लगता है 
  • क्या है सोरायसिस
    मनुष्य की सामान्य त्वचा पर सोरायसिस रोग पपड़ीदार, रक्तिम;रक्तवर्णितद्ध वह विकार है जो चकतों के रूप में अलग से उभरे होते हैं। यह कुछ-कुछ मछली की उपरी खाल की तरह होते हैं। यह चकते प्राय हाथ-पैर, घुटनों, कोहनी, सिर के बालों के नीचे और पीठ के निचले हिस्सों पर देखने को मिलते हैं। इन चकतों का आकार मुख्यत 2-4 मिमि से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है, जिनमें खुजली की शिकायत भी रोगी को होती है।  आयुर्वेद में इस रोग को एककुष्ठ कहा जाता है। यह रोग सामान्यतया शरीर में हो जाने वाली दाद-खाज से भिन्न प्रकृति का है। जहां दाद-खाज का घरेलू उपचार संभव है वहीं सोरायसिस के रोगी को चिकित्सकीय उपचार की परम आवश्यकता होती है। उपयुक्त उपचार के अभाव में रोगी के प्राणों पर भी संकट उत्पन्न हो सकता है।
    सोरियासिस (PSORIASIS) "अपरस रोग / छाल रोग" :

    [1] सोरायसिस (Psoriasis) त्वचा पर होने वाली Autoimmune रोग है | जिसके होने से त्वचा का कोशिका मरने लगता है और लाल एवं सफ़ेद धब्बे के रूप में शारीर में दिखने लगता है | यह रोग प्रतिराकक्षा प्रणाली के गलत संदेश के कारण कोशिकाओ की तीव्र वृद्धि दर के कारण उत्पन होता है | लोग इस बीमारी को छुवाछुत मानते है ,परंतू यह बीमारी छुवाछुत के कारण नहीं फैलता है | यह genetic एवं और immune system से सम्बंधित है, न की छुआछुत से | यह बीमारी किसी को भी हो सकता है ,चाहे वो लड़का हो या लड़की | यह शारीर के किसी भी भाग में हो सकता है | एक बार यह किसी के शारीर में होने के बाद ऊम्र भर रह जाता है |
    [2] सोरियासिस / अपरस रोग / छाल रोग (अंग्रेज़ी: PSORIASIS) एक प्रकार का असंक्रामक दीर्घकालिक त्वचा विकार (चर्मरोग) है जो कि परिवारों के बीच चलता रहता है। यह रोग सर्दियों के मौसम में होता है। यह रोग उन व्यक्तियों को होता है जो अधिक परेशानियों से घिरे रहते हैं। छाल रोग सामान्यतया बहुत ही मंद स्थिति का होता है। इसके कारण त्वचा पर लाल-लाल खुरदरे धब्बे बन जाते हैं। यह ऐसा दीर्घकालिक विकार है जिसका यह अर्थ होता है कि इसके लक्षण वर्षों तक बने रहेंगे। ये पूरे जीवन में आते-जाते रहते हैं। यह स्त्री-पुरुष दोनों ही को समान रूप से हो सकता है। सोरियासिस में त्वचा में कोशिकाओं की संख्या बढने लगती है। चमडी मोटी होने लगती है और उस पर खुरंड और पपडियां उत्पन्न हो जाती हैं। इस रोग के भयानक रुप में पूरा शरीर मोटी लाल रंग की पपडीदार चमडी से ढक जाता है। इस रोग का प्रभाव अधिकतर व्यक्तियों की हाथों-पैरों, कलाइयों, कोहनियों, कमर, हथेलियों, घुटनों, खोपडी तथा कंधों पर होता है।
    [3] सोरायसिस रोग जब किसी व्यक्ति को हो जाता है तो जल्दी से ठीक होने का नाम नहीं लेता है। यह छूत का रोग नहीं है। इस रोग का शरीर के किसी भाग पर घातक प्रभाव नहीं होता है। जब यह रोग किसी को हो जाता है तो उस व्यक्ति का सौन्दर्य बेकार हो जाता है तथा वह व्यक्ति भद्दा दिखने लगता है। यदि इस बीमारी के कारण भद्दा रूप न हो और खुजली न हो तो सोरायसिस के साथ आराम से जिया जा सकता है।
    [4] सोरायसिस रोग होने के लक्षण-
    जब किसी व्यक्ति को सोरायसिस हो जाता है तो उसके शरीर के किसी भाग पर गहरे लाल या भूरे रंग के दाने निकल आते है। कभी-कभी तो इसके दाने केवल पिन के बराबर होते हैं। ये दाने अधिकतर कोहनी, पिंडली, कमर, कान, घुटने के पिछले भाग एवं खोपड़ी पर होते हैं। कभी-कभी यह रोग नाम मात्र का होता है और कभी-कभी इस रोग का प्रभाव पूरे शरीर पर होता है। कई बार तो रोगी व्यक्ति को इस रोग के होने का अनुमान भी नहीं होता है। शरीर के जिस भाग में इस रोग का दाना निकलता है उस भाग में खुजली होती है और व्यक्ति को बहुत अधिक परेशान भी करती है। खुजली के कारण सोरायसिस में वृद्धि भी बहुत तेज होती है। कई बार खुजली नहीं भी होती है। जब इस रोग का पता रोगी व्यक्ति को चलता है तो रोगी को चिंता तथा डिप्रेशन भी हो जाता है और मानसिक कारणों से इसकी खुजली और भी तेज हो जाती है।
    सोरायसिस रोग के हो जाने के कारण और भी रोग हो सकते हैं जैसे- जुकाम, नजला, पाचन-संस्थान के रोग, टान्सिल आदि। यदि यह रोग 5-7 वर्ष पुराना हो जाए तो संधिवात का रोग हो सकता है।
    [5] सोरियासिस का शरीर पर प्रभाव क्षेत्र:-
    अपरस रोग में रोगी की त्वचा पर जगह-जगह लाल-लाल से खुरदरे दाग-धब्बे हो जाते हैं। जितने यह दाग-धब्बे भयानक लगते हैं उतनी ज़्यादा इनमें खुजली नहीं होती है। जब यह रोग किसी व्यक्ति के शरीर के किसी भाग पर होता है तो उस भाग की त्वचा का रंग गुलाबी (लाल) होकर सूज जाता है और फिर त्वचा के ऊपर सफेद सादी, सूखी एवं कड़ी खाल (त्वचा की पतली परत) जम जाते हैं। त्वचा सूखकर फट सी जाती है। जब ऊपर की पपड़ी उतरती हैं तो त्वचा से रक्त निकलने लगता हैं। लेकिन इसमें से कुछ मवाद आदि नहीं निकलता। ये लक्षण हल्के-फुल्के से लेकर भारी मात्रा में होते हैं। इससे विकृति और अशक्तता की स्थिति पैदा हो सकती है|
    [6] दीर्घकालिक प्रभाव-
    छाल रोग से व्यक्तियों पर भावनात्मक तथा शारीरिक प्रभाव पड़ सकते हैं। छाल रोग ऑर्थरायटिस वाले व्यक्तियों को होते हैं। इससे दर्द होता है तथा इससे व्यक्ति अशक्त भी हो सकता है। छाल रोग संक्रामक नहीं है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को नहीं लगता।
    [7] सोरायसिस रोग होने का कारण:-
    १=अंत:स्रावी ग्रन्थियों में कोई रोग होने के कारण सोरायसिस रोग हो सकता है।
    २=पाचन-संस्थान में कोई खराबी आने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
    ३=बहुत अधिक संवेदनशीलता तथा स्नायु-दुर्बलता होने के कारण भी सोरायसिस रोग हो सकता है।
    ४=खान-पान के गलत तरीकों तथा असन्तुलित भोजन और दूषित भोजन का सेवन करने के कारण भी सोरायसिस रोग हो सकता है।
    ५=असंयमित जीवन जीने, जीवन की विफलताएं, परेशानी, चिंता तथा एलर्जी के कारण भी यह रोग हो सकता है।
    [8] अति शीघ्र बढ़ने या ख़राब होने का कारण:-
    कुछ कारक है जिनसे छाल रोग से पीड़ित व्यक्तियों में चकते पड़ सकते हैं। इन कारकों में त्वचा की ख़राबी (रसायन, संक्रमण, खुरचना, धूप से जलन) मद्यसार, हार्मोन परिवर्तन, धूम्रपान, बीटा-ब्लाकर जैसी औषधी तथा तनाव सम्मिलित हैं।
    [9] Psoriasis के प्रकार:-
    सोरायसिस के मुख़्य प्रकार जो की उनके लक्षणों और होने वाले भागो के अनुसार बांटे गए है -
    1 -पट्टिका psoriasis:
    यह बात के रोगियों को पीड़ा से psoriasis के सब के साथ 80% psoriasis है के प्रकार व्यापक अधिकांश. यह चांदी सफेद रंग और लाल रंग के धब्बे सूजन के पैमाने से भिन्न है. एक यह घुटने, कोहनी, पीठ के निचले हिस्से पर खोज सकते हैं, और खोपड़ी, लेकिन यह कहीं भी हो सकता है.
    2-उलटा छालरोग:
    कांख, स्तनों के नीचे, कमर, त्वचा गुप्तांग क्षेत्र में सिलवटों, नितंबों सबसे आम जगहों पर जहां उलटा छालरोग से पता चला है.
    3-Erythrodermic छालरोग:
    Erythrodermic सोरायसिस बीमारी का सबसे अधिक भाग के भड़काऊ प्रकार है कि अक्सर पूरे शरीर पर फैल रहा है के लिए एक है. Erythrodermic छालरोग अक्सर अस्थिर पट्टिका psoriasis के लिए नेतृत्व कर सकते हैं. प्रासंगिक, व्यापक, उज्ज्वल लालिमा इस अवधि के दौरान त्वचा की मुख्य विशेषताएं हैं.
    4-Guttate छालरोग:
    अभिव्यक्ति छोटे आकार के छोटे लाल धब्बे बचपन या जवानी अवधि में शुरुआत के माध्यम से पता चला है.
    5-Pustular psoriasis:
    एक नियम के रूप में वयस्कों में मनाया, pustular psoriasis के आसपास लालिमा के साथ मवाद के गैर संक्रामक फफोले के माध्यम से प्रकट होता है. रोग के रूप में यह एक संक्रमण नहीं है, नहीं फैलता है.
    6-Palmo पदतल Psoriasis:
    पीपीपी या Palmo पदतल Psoriasis (Palmoplantar Pustulosis) काफी अलग तरह से प्रकट होता है. स्पॉट हथेलियों और तलवों पर स्थित हैं|
    7-कील Psoriasis: नाखून परिवर्तन
    8-खोपड़ी Psoriasis:
    यह सिर के पीछे होता है, लेकिन खोपड़ी के अन्य क्षेत्रों में भी यह हो सकता है.
    9-Psoriatic गठिया:
    Psoriatic गठिया में दर्द होता है और ज्यादा रोग जोड़ों के आसपास सूजन, जोड़ों का दर्द, तराजू, लाली बढ़ती है, त्वचा के घावों psoriatic गठिया के दौरान देखा जाता है.
    [10] रोक थाम:-
    • धूप तीव्रता सहित त्वचा को चोट न पहुंचने दें। धूप में जाना इतना सीमित रखें कि धूप से जलन न होने पाएं।
    • मद्यपान और धूम्रपान न करें।
    • स्थिति को और बिगाड़ने वाली औषधी का सेवन न करें।
    • तनाव पर नियंत्रण रखें।
    • त्वचा का पानी से संपर्क सीमित रखें।
    • फुहारा और स्नान को सीमित करें, तैरना सीमित करें।
    • त्वचा को खरोंचे नहीं।
    • ऐसे कपड़े पहने जो त्वचा के संपर्क में आकर उसे नुकसान न पहुंचाएँ।
    • संक्रमण और अन्य बीमारियाँ हो तो डाक्टर को दिखाएं।
    [11] प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:

    • ज़्यादा मिर्च मसालेदार चीज़ें न खाएं।
    • सोरियासिस या अपरस रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को कम से कम 7 से 15 दिनों तक फलों का सेवन करना चाहिए और उसके बाद फल-दूध पर रहना चाहिए।
    • अपरस रोग से पीड़ित व्यक्ति को यदि कब्ज की शिकायत हो तो उसे गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ़ करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप रोगी का यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
    •अपरस रोग से पीड़ित रोगी को उपचार करने के लिए सबसे पहले उसके शरीर के दाद वाले भाग पर थोड़ी देर गर्म तथा थोड़ी देर ठण्डी सिकाई करके गीली मिट्टी का लेप करना चाहिए। इसके फलस्वरूप अपरस रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
    • रोगी व्यक्ति के अपरस वाले भाग को आधे घण्टे तक गर्म पानी में डुबोकर रखना चाहिए तथा इसके बाद उस पर गर्म गीली मिट्टी की पट्टी लगाने से लाभ होता है।
    • रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक प्रतिदिन गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ़ करना चाहिए और फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए। इसके फलस्वरूप अपरस रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
    • अपरस रोग से पीड़ित रोगी को नीबू का रस पानी में मिलाकर प्रतिदिन कम से कम 5 बार पीना चाहिए और सादा भोजन करना चाहिए।
    • अपरस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को दाद वाले भाग पर रोजाना कम से कम 2 घण्टे तक नीला प्रकाश डालना चाहिए।
    • अपरस रोग से पीड़ित रोगी को आसमानी रंग की बोतल के सूर्यतप्त जल को 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन दिन में 4 बार पीने से अपरस रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
    • अपरस रोग से पीड़ित रोगी को नमक का सेवन नहीं करना चाहिए।
    • रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में स्नान करना चाहिए और उसके बाद घर्षण स्नान करना चाहिए और सप्ताह में 2 बार पानी में नमक मिलाकर स्नान करना चाहिए।
    • रोगी को अपने शरीर के अपरस वाले भाग को प्रतिदिन नमक मिले गर्म पानी से धोना चाहिए और उस पर जैतून का तेल या हरे रंग की बोतल व नीली बोतल का सूर्यतप्त तेल लगाना चाहिए। इसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।
    • रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन अपने शरीर के रोगग्रस्त भाग पर नीला प्रकाश डालना चाहिए। इसके अलावा रोगी को रोजाना हल्का व्यायाम तथा गहरी सांस लेनी चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।
    [12] सोरियासिस (छाल रोग) का घरेलू नुस्खों से इलाज-
    • बादाम 10 नग का पावडर बनाले। इसे पानी में उबालें। यह दवा सोरियासिस रोग की जगह पर लगावें। रात भर लगी रहने के बाद सुबह मे पानी से धो डालें। यह नुस्खा अच्छे परिणाम प्रदर्शित करता है।
    • एक चम्मच चंदन का पावडर लें। इसे आधा लिटर में पानी मे उबालें। तीसरा हिस्सा रहने पर उतार लें। अब इसमें थोडा गुलाब जल और शक्कर मिला दें। यह दवा दिन में 3 बार पियें। बहुत कारगर उपाय है।
    • पत्ता गोभी सोरियासिस में अच्छा प्रभाव दिखाता है। ऊपर का पत्ता लें। इसे पानी से धोलें। हथेली से दबाकर सपाट कर लें। इसे थोडा सा गरम करके प्रभावित हिस्से पर रखकर उपर सूती कपडा लपेट दें। यह उपचार लम्बे समय तक दिन में दो बार करने से जबर्दस्त फ़ायदा होता है।
    • पत्ता गोभी का सूप सुबह शाम पीने से सोरियासिस में लाभ होता है।
    • नींबू के रस में थोडा पानी मिलाकर रोग स्थल पर लगाने से सुकून मिलता है।
    • शिकाकाई पानी में उबालकर रोग के धब्बों पर लगाने से नियंत्रण होता है।
    • केले का पत्ता प्रभावित जगह पर रखें। ऊपर कपड़ा लपेटें।
    • इस रोग को ठीक करने के लिये जीवन शैली में बदलाव करना जरूरी है। सर्दी के दिनों में 3 लीटर और गर्मी के मौसम मे 5 से 6 लीटर पानी पीने की आदत बनावें। इससे विजातीय पदार्थ शरीर से बाहर निकलेंगे।
    •विटामिन `ई´ युक्त पदार्थों का अधिक सेवन करने से यह रोग कुछ ही महीनों में ठीक हो जाता है।
    [13] आहार का महत्त्व-
    १-व्यक्ति को जो आहार अच्छा लगे, वही उसके लिए उत्तम आहार है क्योंकि छाल रोग से पीड़ित व्यक्ति खान-पान की आदतों से उसी प्रकार लाभान्वित होता है जैसे हम सभी होते हैं। कई लोगों ने यह कहा है कि कुछ खाद्य पदार्थों से उनकी त्वचा में निखार आया है या त्वचा बेरंग हो गई है।
    २-सोरायसिस रोग से पीड़ित रोगी को दूध या उससे निर्मित खाद्य पदार्थ, मांस, अंडा, चाय, काफी, शराब, कोला, चीनी, मैदा, तली भुनी चीजें, खट्टे पदार्थ, डिब्बा बंद पदार्थ, मूली तथा प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए।
    ३-जौ, बाजरा तथा ज्वार की रोटी इस रोग से पीड़ित रोगी के लिए बहुत अधिक लाभदायक है।
    ४-नारियल, तिल तथा सोयाबीन को पीसकर दूध में मिलाकर प्रतिदिन पीने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
    आंवले का प्रतिदिन सेवन करने से रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
    ५-इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को 1 सप्ताह तक फलों का रस (गाजर, खीरा, चुकन्दर, सफेद पेठा, पत्तागोभी, लौकी, अंगूर आदि फलों का रस) पीना चाहिए। इसके बाद कुछ सप्ताह तक रोगी व्यक्ति को बिना पका हुआ भोजन खाना चाहिए जैसे- फल, सलाद, अंकुरित दाल आदि और इसके बाद संतुलित भोजन करना चाहिए

ब्रेन स्ट्रोक


जानलेवा हो सकता है ब्रेन स्ट्रोक
बिगड़ती जीवनशैली, अनियमित खानपान, हाइपरटेंशन और धूम्रपान की वजह से ब्रेन स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन ज्यादातर लोग अब भी इसकी गंभीरता से अनजान हैं। इलाज के बेहतर विकल्प उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को समय पर सही उपचार मिलने में परेशानी होती है। ब्रेन स्ट्रोक के बारे में कुछ प्रमुख जानकारी, आइए जानते हैं।
न्यूरोलॉजी  विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल हर छठा आदमी अपनी जिंदगी में कभी न कभी स्ट्रोक की समस्या से रूबरू होता है। हर छठे सेकंड में एक व्यक्ति की मौत स्ट्रोक से होती है।  60 से ऊपर की उम्र के लोगों में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण स्ट्रोक होता है। 15 से 59 आयुवर्ग में मृत्यु का पांचवां सबसे बड़ा कारण है। अगर आप इसके लक्षणों को जानते हैं और समय पर चिकित्सा के उपाय किए जाते हैं तो मरीज को बचाने में काफी सहूलियत हो सकती है।
क्या होती है प्रॉब्लम-
ब्रेन स्ट्रोक का सबसे सामान्य लक्षण होता है शरीर के किसी एक ओर के हिस्से में कमजोरी या लकवा जैसी स्थिति होना। स्ट्रोक होने पर ऐसा भी संभव है कि मरीज अपनी इच्छानुसार एक ओर के हाथ-पैर भी न हिला सके और कोई संवेदना भी महसूस न हो।
मरीज को बोलने में भी दिक्कत आ सकती है, और चेहरे की मांस पेशियां कमजोर हो जाती हैं जिससे लार बहने लगती है। सुन्न पडऩा या झुरझुरी होना भी इसका सामान्य लक्षण होता है।
स्ट्रोक आने के बाद 70 फीसदी मरीज अपनी सुनने और देखने की क्षमता खो देते हैं। साथ ही 30 फीसदी मरीजों को दूसरे लोगों के सहारे की जरूरत पड़ती है। आमतौर पर 20 फीसदी हृदय मरीजों को स्ट्रोक की समस्या होती है।

स्ट्रोक के दो प्रकार

स्किमिक स्ट्रोक-
धमनियों में चर्बी की मात्रा अधिक होने से वह पतली हो जाती है, जिससे ब्लॉकेज आ जाती है। इससे स्ट्रोक पड़ता है। इसे स्किमिक स्ट्रोक कहते हैं। 

ब्रेन हेमरेज -
यह स्ट्रोक ब्लड प्रेशर अधिक होने से होता है। इसमें ब्रेन के अन्दर रक्त नलिकाओं में लिकेज आ जाता है, जिससे ब्रेन हेमरेज हो जाता है। ब्रेन हेमरेज में ब्रेन के अन्दर भी लीकेज होता है और उसके सतह पर भी।
इन लक्षणों न करें नजरंदाज -
कई बार बड़े स्ट्रोक से पहले छोटा स्ट्रोक पड़ता है, जिसमें कुछ समय के लिए आंख की रोशनी चली जाती है और फिर लौट आती है। या फिर अंग का कोई हिस्सा कमजोर हो जाता है और फिर ठीक हो जाता है। ऐसा चक्कर व तेज सिर दर्द हो सकता है, जो जिंदगी में पहली बार हुआ हो। पीडि़त को सांस लेने में भी तकलीफ हो सकती है और वह अचेत भी हो सकता है।
क्यों होता है ऐसा
न्यूरो विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी की वजह से दिमाग की किसी रक्त नलिका में रक्त का जमाव हो जाता है। इसके कारण रक्त का बहाव नहीं हो पाता। इससे उस रक्त नालिका से जुड़े शरीर के अन्य भाग काम करना बंद कर देते हैं।  सर्दियों में ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों की संख्या गर्मियों की अपेक्षा बढ़कर लगभग दोगुनी हो जाती है। इसके पीछे कारण ये होता है कि सर्दियों में रक्त गाढ़ा हो जाता है। शरीर को गर्म रखने के लिए रक्तचाप भी बढ़ जाता है। इसके अलावा ठंड के मौसम में लोग बेहतर स्वास्थ्य के लिए ज्यादा कैलोरी युक्त भोजन लेने लगते हैं, जिससे कॉलेस्ट्रॉल काफी तेजी से बढ़ता है, और रक्त प्रवाह में अवरोध बनता है।

स्ट्रोक की स्थिति में क्या करें
मरीज को स्ट्रोक के साढ़े चार घंटे के अंदर ही अस्पताल पहुंचाने की कोशिश करें। अच्छा होगा कि पहले घंटे के अंदर ही सही चिकित्सक के पास पहुंचें। हार्ट अटैक की तरह बे्रन स्ट्रोक में भी पहला घंटा गोल्डर ऑवर माना जाता है। जांच व इलाज में देरी से ब्रेन को गंभीर नुकसान भी हो सकता है। अगर मरीज को सही इलाज मिल जाए तो कभी-कभी स्ट्रोक से पूरी तरह उबरा जा सकता है। यह मुमकिन न हो, तब भी इलाज से मरीज को बहुत कुछ अपने लायक बनाया जा सकता है। ध्यान रखें कि मरीज के पहले 48 से 72 घंटे बहुत नाजुक होते हैं।
अस्पताल में उपचार प्रक्रिया-
अस्पताल पहुंचने पर क्लीनिकल परीक्षण के बाद मस्तिष्क का सीटी स्कैन या एमआरआई किया जाता है। इस जांच से यह मसला सुलझ जाता है कि लकवा खून का दौरा रुकने से हुआ है या धमनी फटने से। डॉक्टर धमनियों के माध्यम से दवाइयां देते हैं, जो मस्तिष्क में जाकर रक्त के थक्के के तोड़ देती हैं। ऐसी दवाएं भी दी जाती हैं जिनसे मस्तिष्क की सूजन कम हो। कोशिश यह रहती है कि मस्तिष्क का कम-से-कम नुकसान हो और जीवन के लिए जरूरी क्रियाएं सुचारू रूप से चलती रहें। सांस चलाए रखना, शरीर को समुचित मात्र में द्रव और पोषक तत्व देने के लिए नाक से प्लास्टिक की ट्यूब से द्रव रूप में आहार देना, मूत्राशय में केथेटर लगाना, मल-त्याग पर नियंत्रण न रहने की स्थिति में साफ-सफाई, समय से करवट दिलाना, पेशियों की नियमित मालिश और व्यायाम जैसी अनेक चीजों पर ध्यान देने की सख्त जरूरत होती है। तुरंत इलाज मिल जाने पर मरीज के लाखों रुपये का खर्च भी बच जाता है। मरीज 2 से 3 दिन में पूरी तरह से स्वस्थ होकर घर जा सकता है।
दिनचर्या में रखें ध्यान-
आमतौर पर लोग यह सोचते हैं कि अगर स्ट्रोक हो भी गया, तो तीन घंटे का वक्त इलाज मिलने के लिए काफी होता है। इसलिए वे इसकी ज्यादा परवाह नहीं करते। लेकिन, कुछ ही लोग इतनी भाग्यशाली होते हैं कि उनके ऊपर दवा काम कर जाती हैं, लेकिन हर कोई उनकी तरह भाग्यशाली नहीं होता। इसे रोकने का एक ही तरीका है और वह है-बचाव। ऐसे लोगों को अपने लाइफ स्टाइल में बदलाव लाना चाहिए ताकि वे स्ट्रोक की स्टेज के आसपास भी न पहुंच पाएं।
हाई ब्लड प्रेशर, डायबीटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं से ग्रस्त लोग नियमित जांच कराते रहें। तनाव मुक्त जीवन जीने की सलाह दी जाती है। तनाव का भी असर ब्रेन स्ट्रोक पर पड़ता है।
मोटापे को हावी न होने दें ओर सही व संतुलित आहार को अपनी आदतों में ढालें।  शारीरिक रूप से सक्रियता बनाएं रखें और हो सके तो रोज उचित व्यायाम करें।
सिगरेट-तंबाकू का सेवन करते हों तो तुरंत बंद कर देंं। शराब पीने की आदत हो तो सीमित मात्रा में सेवन करें। साथ ही स्ट्रोक की चेतावनी देने वाले शरीर संकेतों को पहचानना सीखें।

Monday, 4 September 2017

ऍसिडिटी ( आम्लपित्त)

अम्लपित्त या ऍसिडिटी के कारण पेट में जलन होती है| इसका अनुभव लगभग कभी ना कभी सभीको होता है !कुछ वर्ष पहले हम जल्दबाजी, चिंता और तिखा आहार यह ऍसिडीटी के कारण मानते थे| लेकिन इससे केवल तत्कालिक ऍसिडिटी होती है| आधुनिक विज्ञान के अनुसार अब इसका असली कारण एच. पायलोरी जिवाणू है| यह संक्रमण दूषित खान-पानसे होता है|
कुछ लोगोंको गरम खाना, शराब, ऍलर्जी और तले हुए पदार्थोंके कारण तत्कालिक अम्लपित्त होता है| जादातर यह शिकायत कुछ समय बाद या उल्टी के बाद रूक जाती है|   तमाखू खानेसे या धूम्रपान के कारण ऍसिडिटी होती है| अरहर या चनादाल या बेसन के कारण कुछ लोगोंको अम्लपित्त होता है| मिर्च खानेसेभी ऍसिडिटी होती है|

 अम्लपित्त / एसिडीटी

इसको आयुर्वेदमे अम्लपित्त कहा जाता है ।

“अम्लगुणोद्रिक्तं पित्तं अम्लपित्तम । “ याने जिस व्याधीमे अम्लगुणसे पित्त ब‌ढ़ता है उसे अम्लपित्त कहा जाता है ।

अपने शरीरमे पित्त दो प्रकारका होता है । एक प्राकृत पित्त जो तीखे रसवाला रहता है और दुसरा विकृत पित्त जो अम्लरसका होता है ।

अम्लपित्त एक ऐआ व्याधी है जो तेयार होनेमे कई दिन तो क्या , कई महिनेभी लग सकते है । धीरे धीरे निर्माण होनेवाला ये व्याधी है  और इसिलिये उसपे उपचार लेते समय भी जल्द्बाजी करके फायदा नही होता है ।वर्षा ऋतूके प्रभावसे शरीरमे पित्त संचित होने लगता है । और ऐसी स्थितीमे अगर विरुद्धाहार, दुषित भोजन का सेवन, एक्दम खट्टे-जलन करनेवाले पदार्थोंका सेवन करना, जादा पानी पिना, नया धान्य-मद्य आदि का सेवन, फर्मेंटेड चीझोंका सेवन, खट्टा दहि या छाछ का अतिसेवन, जादा उपवास करना, रात को जागरन, दिनमे सोना, बाँसी चीझे खाना ऐसे कारनोंसे पित्त और जादा दुषित होता है और फिर अम्लपित्तकी शुरुवात होती है ।
भूक न लगना, छाती-कंठमे जलन होना, जी मचलना, अन्न का पचन न होना, क्लम ( बैठे बैठे थकान महसूस होना, खट्टी या कड़्वी ड़्कारे आना, अरुचि, पेट भराभरासा लगना, पेटमे दर्द, सिरदर्द, हृत्शूल, गैसेस, कभी कभी पतले दस्त होना, गुदामे जलन होना ये सब लक्षण अम्लपित्त के है ।

आयुर्वेदने अम्लपित्तके दो प्रकार वर्णन किये है । वह इस प्रकार –

१) उर्ध्वग अम्लपित्त – इसमे उल्टिया होती है । उल्टी का रंग हरा, पीला, नीला या काला रहता है । उल्टी एक्दम कड़्वी या खट्टी रहती है । उल्टी के बाद सिरद्रद, पेटमे जलन आदि लक्षण कम हो जाते है ।

२) अधोग अम्लपित्त – ये बहोत कम बार दिखनेवाला प्रकार है । इसमे उल्टीकी बजाय टट्टीद्वारा हरे / काले / पीले रंग का पित्त निकलता है । मल निकलते समय गुददाहभी होता है । इसमेभी पित्त निकल जानेके बाद सिरदर्द, पेटकी जलन आदि लक्षण कम हो जाते है ।

अम्लपित्त ये एक ऐसा व्याधी है जो औषधी की बजाय परहेज से जल्दी ठीक होता है । अगर परहेज पालन नही हो रहा है तो दवाई लेना व्यर्थ है ।
डॉक्टरी इलाज कब करे?
जलन और दर्द जादा हो और दवा से न रुके तब अपने डॉक्टर से मिलिए| हप्ते- दो हप्ते के बाद जलन और दर्द होता रहे तो डॉक्टरसे मिलना चाहिए| दर्द अगर एकाध बिंदू से जुडा हो तब अल्सर की संभावना होती है| इसके लिए डॉक्टरसे मिले| डॉक्टर गॅस्ट्रोस्कोपीकी सलाह दे सकते है| गॅस्ट्रोस्कोपीका मतलब है दुर्बीनसे जठरका अंदरुनी स्थिती देखना|
रोकथाम- तीखे, मसालेदार और जादा गरम पदार्थ, तमाखू, धूम्रपान और शराब सेवन न करे| अरहर, चनादाल या बेसनसे मूँग अच्छा होता है|अम्लपित्त ऍलर्जीका प्रभाव हो तो आहार में उस चीज का पता करना पडेगा| जाहिर है की इस पदार्थको न खाए| योगशास्त्रनुसार तनाव से छुटकारा होनेपर ऍसिडिटी कम होती है| इसके लिये योग उपयोगी है|
एच. पायलोरी जीवाणू संक्रमण टालनेके लिए खानापिना साफ सुथरा चाहिए| दर्द और जलन अक्सर होती रहे तो जल्दी ही डॉक्टरसे मिलकर अल्सर याने छाला टालना चाहिए|

Sunday, 3 September 2017

रक्तचाप

रक्तचाप (अंग्रेज़ी:ब्लड प्रैशर) रक्तवाहिनियों में बहते रक्त द्वारा वाहिनियों की दीवारों पर द्वारा डाले गये दबाव को कहते हैं। धमनियां वह नलिका है जो पंप करने वाले हृदय से रक्त को शरीर के सभी ऊतकोंऔर इंद्रियों तक ले जाते हैं। हृदय, रक्त को धमनियों में पंप करके धमनियों में रक्त प्रवाह को विनियमित करता है और इसपर लगने वाले दबाव को ही रक्तचाप कहते हैं। किसी व्यक्ति का रक्तचाप, सिस्टोलिक/डायास्टोलिक रक्तचाप के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है। जैसे कि १२०/८० सिस्टोलिक अर्थात ऊपर की संख्या धमनियों में दाब को दर्शाती है। इसमें हृदय की मांसपेशियां संकुचित होकर धमनियों में रक्त को पंप करती हैं। डायालोस्टिक रक्त चाप अर्थात नीचे वाली संख्या धमनियों में उस दाब को दर्शाती है जब संकुचन के बाद हृदय की मांसपेशियां शिथिल हो जाती है। रक्तचाप हमेशा उस समय अधिक होता है जब हृदय पंप कर रहा होता है बनिस्बत जब वह शिथिल होता है। एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति का सिस्टोलिक रक्तचाप पारा के 90 और १२० मिलिमीटर के बीच होता है। डायालोस्टिक रक्तचाप पारा के ६० से ८० मि.मि. के बीच होता है। वर्तमान दिशा-निर्देशों के अनुसार सामान्य रक्तचाप १२०/८० होना चाहिए। रक्तचाप को मापने वाले यंत्र को रक्तचापमापी या स्फाइगनोमैनोमीटर कहते हैं

निम्न रक्तचाप- निम्न रक्तचाप (हाइपोटेंशन) वह दाब है जिससे धमनियों और नसों में रक्त का प्रवाह कम होने के लक्षण या संकेत दिखाई देते हैं। जब रक्त का प्रवाह काफी कम होता हो तो मस्तिष्क, हृदय तथा गुर्दे जैसे महत्वपूर्ण इंद्रियों में ऑक्सीजन और पौष्टिक पदार्थ नहीं पहुंच पाते जिससे ये इंद्रियां सामान्य रूप से काम नहीं कर पाती और इससे यह स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती है। उच्च रक्तचाप के विपरीत, निम्न रक्तचाप की पहचान मूलतः लक्षण और संकेत से होती है, न कि विशिष्ट दाब संख्या के। किसी-किसी का रक्तचाप ९०/५० होता है लेकिन उसमें निम्न रक्त चाप के कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते हैं और इसलिए उन्हें निम्न रक्तचाप नहीं होता तथापि ऐसे व्यक्तियों में जिनका रक्तचाप उच्च है और उनका रक्तचाप यदि १००/६० तक गिर जाता है तो उनमें निम्न रक्तचाप के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। यदि किसी को निम्न रक्तचाप के कारण चक्कर आता हो या मितली आती हो या खड़े होने पर बेहोश होकर गिर पड़ता हो तो उसे आर्थोस्टेटिक उच्च रक्तचाप कहते हैं। खड़े होने पर निम्न दाब के कारण होने वाले प्रभाव को सामान्य व्यक्ति शीघ्र ही काबू में कर लेता है। लेकिन जब पर्याप्त रक्तचाप के कारण चक्रीय धमनी में रक्त की आपूर्ति नहीं होती है तो व्यक्ति को सीने में दर्द हो सकता है या दिल का दौरा पड़ सकता है। जब गुर्दों में अपर्याप्त मात्रा में खून की आपूर्ति होती है तो गुर्दे शरीर से यूरिया और क्रिएटाइन जैसे अपशिष्टों को निकाल नहीं पाते जिससे रक्त में इनकी मात्रा अधिक हो जाती है

उच्च रक्तचाप- १३०/८० से ऊपर का रक्तचाप, उच्च रक्तचाप या हाइपरटेंशन कहलाता है। इसका अर्थ है कि धमनियों में उच्च चाप (तनाव) है। उच्च रक्तचाप का अर्थ यह नहीं है कि अत्यधिक भावनात्मक तनाव हो। भावनात्मक तनाव व दबाव अस्थायी तौर पर रक्त के दाब को बढ़ा देते हैं। सामान्यतः रक्तचाप १२०/८० से कम होनी चाहिए और १२०/८० तथा १३९/८९ के बीच का रक्त का दबाव पूर्व उच्च रक्तचाप (प्री हाइपरटेंशन) कहलाता है और १४०/९० या उससे अधिक का रक्तचाप उच्च समझा जाता है। उच्च रक्तचाप से हृदय रोग, गुर्दे की बीमारी, धमनियों का सख्त हो जाने, आंखे खराब होने और मस्तिष्क खराब होने का जोखिम बढ़ जाता है। है। युवाओं में ब्लड प्रेशर की समस्या का मुख्य कारण उनकी अनियमित जीवन शैली और गलत खान-पान होते हैं। यदि चक्कर आयें, सिर दर्द हो, साँस में तक़लीफ़ हो, नींद न आए, शीथीलता रहे, कम मेहनत करने पर सांस फूले और नाक से खून गिरे इत्यादि तो चिकित्सक से जांच करायें, संभव है ये उच्च रक्तचाप के कारण हो।

 उच्च रक्तचाप के कारण- 

  • चिंता, क्रोध, ईर्ष्या, भय आदि मानसिक विकार

  • कई बार, बार-बार या आवश्यकता से अधिक खाना।

  • मैदा से बने खाद्य, चीनी, मसाले, तेल-घी अचार, मिठाईयां, मांस, चाय, सिगरेट व शराब आदि का सेवन।

  • नियमित खाने में रेशे, कच्चे फल और सलाद आदि का अभाव।

  • श्रमहीन जीवन, व्यायाम का अभाव।

  • पेट और पेशाब संबंधी पुरानी बीमारी।

  • रक्त चाप बढने से तेज सिर दर्द,थकावट,टांगों में दर्द ,उल्टी होने की शिकायत और चिडचिडापन होने के लक्छण मालूम पडते हैं। यह रोग जीवन शैली और खान-पान की आदतों से जुडा होने के कारण केवल दवाओं से इस रोग को समूल नष्ट करना संभव नहीं है। जीवन चर्या एवं खान-पान में अपेक्षित बदलाव कर इस रोग को पूरी तरह नियंत्रित किया सकता है।
    हाई ब्लड प्रेशर के मुख्य कारण--
    १) मोटापा
    २) तनाव(टेंशन)
    ३) महिलाओं में हार्मोन परिवर्तन
    ४) ज्यादा नमक उपयोग करना
    अब यहां ऐसे सरल घरेलू उपचारों की चर्चा की जायेगी जिनके सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करने से बिना गोली केप्सुल लिये इस भयंकर बीमारी पर पूर्णत: नियंत्रण पाया जा सकता है-
    १) सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रोगी को नमक का प्रयोग बिल्कुल कम कर देना चाहिये। नमक ब्लड प्रेशर बढाने वाला प्रमुख कारक है।
    २) उच्च रक्तचाप का एक प्रमुख कारण है रक्त का गाढा होना। रक्त गाढा होने से उसका प्रवाह धीमा हो जाता है ! 
    इससे धमनियों और शिराओं में दवाब बढ जाता है।लहसुन ब्लड प्रेशर ठीक करने में बहुत मददगार घरेलू वस्तु है।यह रक्त का थक्का नहीं जमने देती है। धमनी की कठोरता में लाभदायक है। रक्त में ज्यादा कोलेस्ट्ररोल होने की स्थिति का समाधान करती है।

    ३)एक बडा चम्मच आंवला का रस और इतना ही शहद मिलाकर सुबह -शाम लेने से हाई ब्लड प्रेशर में लाभ होता है।

    ४) जब ब्लड प्रेशर बढा हुआ हो तो आधा गिलास मामूली गरम पानी में काली मिर्च पावडर एक चम्मच घोलकर २-२ घंटे के फ़ासले से पीते रहें। ब्लड प्रेशर सही मुकाम पर लाने का बढिया उपचार है।

    ५) तरबूज का मगज और पोस्त दाना दोनों बराबर मात्रा में लेकर पीसकर मिला लें। एक चम्मच सुबह-शाम खाली पेट पानी से लें।३-४ हफ़्ते तक या जरूरत मुताबिक लेते रहें।

    ६) बढे हुए ब्लड प्रेशर को जल्दी कंट्रोल करने के लिये आधा गिलास पानी में आधा निंबू निचोडकर २-२ घंटे के अंतर से पीते रहें। हितकारी उपचार है।

    ७) तुलसी की १० पती और नीम की ३ पत्ती पानी के साथ खाली पेट ७ दिवस तक लें।

    ८) पपीता आधा किलो रोज सुबह खाली पेट खावें। बाद में २ घंटे तक कुछ न खावें। एक माह तक प्रयोग से बहुत लाभ होगा।

    ९) नंगे पैर हरी घास पर १५-२० मिनिट चलें। रोजाना चलने से ब्लड प्रेशर नार्मल हो जाता है।

    १०) सौंफ़,जीरा,शकर तीनों बराबर मात्रा में लेकर पावडर बनालें। एक गिलास पानी में एक चम्मच मिश्रण घोलकर सुबह-शाम पीते रहें।

    ११) उबले हुए आलू खाना रक्त चाप घटाने का श्रेष्ठ उपाय है।आलू में सोडियम(नमक) नही होता है।

    पालक और गाजर का रस मिलाकर एक गिलास रस सुबह-शाम पीयें। अन्य सब्जीयों के रस भी लाभदायक होते हैं।

    १३) नमक दिन भर में ३ ग्राम से ज्यादा न लें।

    १४) अण्डा और मांस ब्लड प्रेशर बढाने वाली चीजें हैं। ब्लड प्रेशर रोगी के लिये वर्जित हैं।

    १५) करेला और सहजन की फ़ली उच्च रक्त चाप-रोगी के लिये परम हितकारी हैं।

    १६) केला,अमरूद,सेवफ़ल ब्लड प्रेशर रोग को दूर करने में सहायक कुदरती पदार्थ हैं।

    १७) मिठाई और चाकलेट का सेवन बंद कर दें।

    १८)सूखे मेवे :--जैसे बादाम काजू, आदि उच्च रक्त चाप रोगी के लिये लाभकारी पदार्थ हैं।

    १९)चावल:-(भूरा) उपयोग में लावें। इसमें नमक ,कोलेस्टरोल,और चर्बी नाम मात्र की होती है। यह उच्च रक्त चाप रोगी के लिये बहुत ही लाभदायक भोजन है। इसमें पाये जाने वाले केल्शियम से नाडी मंडल की भी सुरक्षा हो जाती है।

    २०)अदरक:-प्याज और लहसून की तरह अदरक भी काफी फायदेमंद होता है। बुरा कोलेस्ट्रोल धमनियों की दीवारों पर प्लेक यानी कि कैलसियम युक्त मैल पैदा करता है जिससे रक्त के प्रवाह में अवरोध खड़ा हो जाता है और नतीजा उच्च रक्तचाप के रूप में सामने आता है। अदरक में बहुत हीं ताकतवर एंटीओक्सीडेट्स होते हैं जो कि बुरे कोलेस्ट्रोल को नीचे लाने में काफी असरदार होते हैं। अदरक से आपके रक्तसंचार में भी सुधार होता है, धमनियों के आसपास की मांसपेशियों को भी आराम मिलता है जिससे कि उच्च रक्तचाप नीचे आ जाता है।

    २०)लालमिर्च:-धमनियों के सख्त होने के कारण या उनमे प्लेक जमा होने की वजह से रक्त वाहिकाएं और नसें संकरी हो जाती हैं जिससे कि रक्त प्रवाह में रुकावटें पैदा होती हैं। लेकिन लाल मिर्च से नसें और रक्त वाहिकाएं चौड़ी हो जाती हैं, फलस्वरूप रक्त प्रवाह सहज हो जाता है और रक्तचाप नीचे आ जाता है।

उच्च रक्त चाप का निदान महत्वपूर्ण है जिससे रक्त चाप को सामान्य करके जटिलताओं को रोकने का प्रयास संभव हो। फार्मैकोॉजी विभाग, कोलोन विश्वविद्यालय, जर्मनी में हुई एक शोध के अनुसार चॉकलेट खाने और काली व हरी चाय पीने से रक्तचाप नियंत्रण में रहता है। कनाडा के शोधकर्त्ता रॉस डी.फेल्डमैन के अनुसार उच्च रक्तचाप के रोगियों की विशेष देखभाल और जांच की जरूरत होती है, इससे दिल के दौरे की आशंका एक-चथाई कम हो सकती है वहीं मस्तिष्काघात की भी सम्भावना ४० प्रतिशत कम हो सकती है

थायराइड -एक गंभीर समस्‍या

आज थायराइड एक गंभीर समस्‍या बन गई है। थायराइड शरीर का एक प्रमुख एंडोक्राइन ग्लैंड है जो तितली के आकार का होता है एवं गले में स्थित है। इसमें से थायराइड हार्मोन का स्राव होता है जो हमारे मेटाबॉलिज्म की दर को संतुलित करता है। यह हार्मोन मेटाबॉलिज्म को बनाए रखने के लिए जरूरी होती हैं। यह थाइराक्सिन नामक हार्मोन बनाती है, जिससे शरीर की एनर्जी का क्षय, प्रोटीन उत्पादन एवं अन्य हार्मोन के प्रति होने वाली संवेदनशीलता नियंत्रित होती है। थायराइड हार्मोन का स्राव असंतुलित हो जाने पर शरीर की समस्त कार्यप्रणालियां अव्यवस्थित हो जाती हैं। इस रोग में काफी दिक्कत होती है। कभी वजन अचानक से बढ़ जाता है तो कभी अचानक से कम हो जाता है। 

आज थायराइड मानव जाति के लिए एक बेहद गंभीर समस्‍या बन गई है। क्‍योंकि थायराइड को साइलेंट किलर माना जाता है, और लक्षण व्यक्ति को धीरे-धीरे पता चलते हैं और जब इस बीमारी का निदान होता है तब तक देर हो चुकी होती है। इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी से इसकी शुरुआत होती है। जिसके चलते छोटे रोगों से लेकर बड़े-बड़े रोग उत्पन्न होने लगते है, और लोग इसे कंट्रोल करने के लिए दवा खा-खा कर परेशान हो रहे हैं। एलोपैथी में इसका कोई इलाज भी नहीं हैं, बस जीवन भर दवाई लेते रहो, फिर भी पूरी तरह से कोई आराम नहीं। 

थायराइड क्या होता है? 

Thyroid गले में स्थित एक ग्रंथि (gland) का नाम है। यह ग्लैंड गले के आगे के हिस्से में मौजूद होता है और इसका आकार एक तितली के समान होता है। यह बॉडी के कई तरह के metabolic processes*को control करने के काम आता है

थायराइड की समस्याएं क्या होती हैं?

Thyroid Gland से produce होने वाले hormones शरीर में होने वाले सभी मेटाबोलिक प्रक्रियाओं को affect करते हैं। थायराइड disorders से घेंघा जैसी छोटी बीमारी से लेकर जानलेवा कैंसर तक हो सकता है। लेकिन जो सबसे common थायराइड प्रॉब्लम होती है वो है थायराइड हॉर्मोन्स का सही मात्रा में प्रोडक्शन ना होना। इसमें दो तरह की समस्या आती है-
  1. Hyperthyroidism (हाइपरथायरायडिज्म / अतिगलग्रंथिता ): ज़रुरत से अधिक hormones का पैदा होना
  2. Hypothyroidism (हाइपोथायरायडिज्म / अवटु-अल्पक्रियता): ज़रूअत से कम हॉर्मोन्स का प्रोडक्शन होना
इन  समस्याओं की वजह से कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं, लेकिन अगर सही से diagnose करके इलाज किया जाए तो इन्हें अच्छे से manage किया जा सकता है।
अगर आप भी इस समस्‍या से जूझ रहे हैं तो आज हम आपको एक ऐसे घरेलू उपाय के बारे में बता रहे है जिसे आप बिना किसी संकोच के कर सकते हैं।
थायराइड के लिए 10 जड़ी बूटी----थायराइड ग्रंथि के ठीक से काम न करने से रक्त में थायराक्सिन नामक हार्मोन का स्तर पर प्रभाव पड़ता है। इस प्रभाव को दो श्रेणी हाइपरथायराइडिज्म और हाइपोथायाराइडिज्म में रखा जाता है। इस स्थिति में वजन बढ़ने या घटने की समस्या होती है। इस महत्वपूर्ण हार्मोनल ग्रंथि को स्वस्थ व संतुलित बनाये रखने के लिए कुछ जड़ी बूटियां उपयोगी साबित हो सकती है।
मुलेठी--- मुलेठी थायराइड ग्‍लैंड में संतुलन बना कर रखता है जिससे थायराइड के मरीजों में होने वाली थकान एनर्जी में बदलती है। 2011 में, टेक्सास में बायोसाइंसेज और टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट के अनुसार, मुलेठी में पाया जाने वाला प्रमुख घटक ट्रीटरपेनोइड ग्लाइसेरीथेनिक एसिड अत्यधिक आक्रामक होता है जो थायराइड कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकता है।
अश्वगंधा- अश्वगंधा एक ऐसी जड़ी बूटी है जिसमें मौजूद एंटीऑक्‍सीडेंट गुण हार्मोन की सही मात्रा में उत्पादन कर थायराइड को रोकने का कम काम करता है। हार्मोन संतुलन के साथ, अश्वगंधा में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी प्रभाव के कारण यह प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार कर तनाव से मुक्ति दिलाता है
गेहूं का ज्‍वारा- गेहूं का ज्‍वारा प्रकृति की अनमोल देन है। इसमें अनेक औषधीय और रोग निवारक गुण पाए जाते हैं। गेहूं का ज्‍वारा रक्त व रक्त संचार संबंधी रोगों, रक्त की कमी, उच्च रक्तचाप, सर्दी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, साइनस, पाचन संबंधी रोग और थायराइड ग्रंथि के रोग में काम आता है
अलसी- अलसी में ओमेगा-3 फैटी एसिड भरपूर मात्रा में पाया जाता है। यह एसिड थायरायड ग्रंथि के सही तरीके से काम करने में आवश्‍यक भूमिका निभाता है। हाइपोथायरायडिज्म से पीड़ित लोगों को अलसी और अलसी के तेल का प्रयोग जरूर करना चाहिए।
अदरक- अदरक जिंक, मैग्नीशियम और पौटेशियम का एक अच्छा स्रोत है। इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण थायराइड की कार्यक्षमता में सुधार लाने में मदद करते हैं। हाइपोथायरायडिज्म से पीड़ित लोगों को अपने आहार में इसको शामिल करना चाहिए। अदरक का उपयोग आहार में भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार से कर सकते हैं
इचिन्‍सिया- इचिन्‍सिया एक लोकप्रिय जड़ी-बूटी है, इसका उपयोग प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार करने के लिए किया जाता है। इचिन्‍सिया में मौजूद तत्व हाइपोथायरायडिज्म से पी‍ड़‍ित लोगों के इससे निजात दिलाते हैं।
ब्लैडररैक- यह एक प्रकार का हर्ब है जिसका प्रयोग हाइपोथायराडिज्म समेत कई बीमारियों में होता है। इस समुद्री शैवाल में प्राकृतिक आयोडीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है जो थायराइड ग्रंथि को संतुलित करने के लिए जाना जाता है।
बाकोपा- अगर आप थायराइड की समस्या से ग्रस्त हैं तो आप बाकोपा नामक जड़ी बूटी की मदद ले सकते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक बकपा एक शक्तिशाली जड़ी बूटी जो थायराइड ग्रंथि को संतुलित करने के काम करती है।
काले अखरोट- सीफूड के अलावा काले अखरोट को आयोडीन का सबसे अच्छा स्रोत माना जाता है। विभिन्‍न अनुसंधान से पता चलता है कि आयोडीन एक आवश्‍यक पोषक तत्‍व है जो थायराइड ग्रंथि के स्वास्थ्य और कामकाज को ठीक रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
नींबू बाम- मिंट परिवार से सं‍बंधित नींबू बाम एक अद्भुत जड़ी बूटी है। इस जड़ी बूटी को थायरॉयड ग्रंथि के लिए फायदेमंद माना जाता है। रिसर्च बताते है‍ कि यह जड़ी बूटी अति थायरॉयड ग्रंथि की गतिविधियों को सामान्य बनाने में उपयोगी होती है। साथ ही यह थायराइड हार्मोन का उत्पादन भी कम करता है

स्वाइन फ्लू

स्वाइन फ्लू-वायरल बुखार है जो वायरस से फैलता है। बारिश की वजह से स्वाइन फ्लू का वायरस और घातक हो जाता है। वातावरण में नमी बढ़ने के साथ ही यह तेजी से फैलने लगता है। यही वजह है कि मौसम बदलने के साथ एकाएक इसके मामलों की बाढ़ सी आ गई है। यदि बारिश के मौसम में आपको सर्दी, खांसी और बुखार हो और यह 2-3 दिनों में ठीक न हो, तो H1N1 की जांच कराएं !   स्वाइन फ्लू उन्हीं व्यक्तियों में होता है, जिनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। इसके आसान टार्गेट पहले से बीमार चल रहे मरीज, गर्भवती महिलाएं आदि होते हैं !   अगर घर में कोई शख्स स्वाइन फ्लू की चपेट में आ गया हो तो, घर के बाकी लोगों को भी इससे बचने के लिए डॉक्टरी सलाह लेकर दवा खा लेनी चाहिए। स्वाइन फ्लू से बचाव ही इसे रोकना का सबसे बड़ा उपाय है। आराम करना, खूब पानी पीना, शरीर में पानी की कमी न होने देना इसका सबसे बेहतर उपाय है।
क्या है स्वाइन फ्लू ?
स्वाइन फ्लू , इनफ्लुएंजा यानी फ्लू वायरस के अपेक्षाकृत नए स्ट्रेन इनफ्लुएंजा वायरस A से होने वाला इनफेक्शन है। इस वायरस को ही H1N1 कहा जाता है। इसके इनफेक्शन ने 2009 और 10 में महामारी का रूप ले लिया था-लेकिन WHO ने 10 अगस्त 2010 में इस महामारी के खत्म होने का भी ऐलान कर दिया था। अप्रैल 2009 में इसे सबसे पहले मैक्सिको में पहचाना गया था। तब इसे स्वाइन फ्लू इसलिए कहा गया था क्योंकि सुअर में फ्लू फैलाने वाले इनफ्लुएंजा वायरस से ये मिलता-जुलता था। 

क्या है स्वाइन फ्लू के लक्षण ?
स्वाइन फ्लू के लक्षण भी सामान्य एन्फ्लूएंजा जैसे ही होते हैं 
-नाक का लगातार बहना, छींक आना
-कफ, कोल्ड और लगातार खांसी 
-मांसपेशियां में दर्द या अकड़न 
-सिर में भयानक दर्द
-नींद न आना, ज्यादा थकान 
-दवा खाने पर भी बुखार का लगातार बढ़ना
-गले में खराश का लगातार बढ़ते जाना

स्वाइन फ्लू का वायरस तेजी से फैलता है। कई बार मरीज के आसपास रहने वाले लोगों और तिमारदारों को चपेट में ले लेता है। लिहाजा, किसी में स्वाइन फ्लू के लक्षण दिखें तो उससे कम से कम तीन फीट की दूरी बनाए रखना चाहिए, स्वाइन फ्लू का मरीज जिस चीज का इस्तेमाल करे, उसे भी नहीं छूना चाहिए।

कैसे फैलता है स्वाइन फ्लू? 
-स्वाइन फ्लू का वायरस हवा में ट्रांसफर होता है 
-खांसने, छींकने, थूकने से वायरस सेहतमंद लोगों तक पहुंच जाता है

डॉक्टरों का ये भी कहना है कि अगर किसी घर में कोई शख्स स्वाइन फ्लू की चपेट में आ गया तो, घर के बाकी लोगों को इससे बचने के लिए डॉक्टरी सलाह ले कर खुद भी इसकी दवाईयां खानी चाहिए। 

स्वाइन फ्लू से बचाव इसे रोकना का बड़ा उपाय है, हालांकि इसका इलाज भी अब मौजूद है। आराम करना, खूब पानी पीना, शरीर में पानी की कमी न होने देना इसका सबसे बेहतर है। शुरुआत में पैरासीटमॉल जैसी दवाएं बुखार कम करने के लिए दी जाती हैं। बीमारी के बढ़ने पर एंटी वायरल दवा ओसेल्टामिविर (टैमी फ्लू) और जानामीविर (रेलेंजा) जैसी दवाओं से स्वाइन फ्लू का इलाज किया जाता है।

लेकिन इन दवाओं को कभी भी खुद से नहीं लेना चाहिए। वैसे सर्दी-जुखाम जैसे लक्षणों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली तुलसी, गिलोए, कपूर, लहसुन, एलोवीरा, आंवला जैसी आयुर्वेदिक दवाईयों का भी स्वाइन फ्लू के इलाज में बेहतर असर देखा गया है। सर्दियों में इन्हें लेने से वैसे भी जुखाम तीन फिट की दूरी पर रहता है, और स्वाइन फ्लू के वायरस से बचने के लिए भी इतने ही फासले की जरूरत होती है।

Saturday, 2 September 2017

टांगो में सूजन और दर्द

टांगों में सूजन और दर्द, हो सकते हैं इस खतरनाक बीमारी के संकेत
डीवीटी यानी डीप वेन थ्रॉम्बोसिस एक खतरनाक बीमारी है।
इसमें टांगों में ब्लड क्लॉट हो सकता है।
उपचार ना होने पर यह बीमारी घातक भी साबित हो सकती है।
डीवीटी यानी डीप वेन थ्रॉम्बोसिस। यह ब्लड क्लॉट होता है, जो शरीर की नसों की गहराई में बन जाता है। ब्लड क्लॉट तब होता है जब खून गाढ़ा हो जाता है। ज़्यादातर ब्लड क्लॉट्स टांग के निचले हिस्से या जांघ पर होते हैं। शरीर की नसों में मौजूद ब्लड क्लॉट्स जब ब्लडस्ट्रीम में फैलते हैं, तो इनके फटने का भी डर होता है और अगर ऐसा हो जाए, तो इस फटे हुए क्लॉट को एम्बोलस कहते हैं। यह फेफड़ों की आर्टरीज़ तक पहुंचकर खून का प्रवाह रोक सकता है।

इस स्थिति को पल्मनेरी एम्बोलिज़म या पीई कहते हैं। यह बेहद ही खतरनाक होती है। यह फेफड़ों और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है और मृत्यु का कारण भी बन सकती है। टांग के निचले हिस्से या शरीर के अन्य अंगों के मुकाबले, जांघों में ब्लड क्लॉट्स के फटने का डर ज़्यादा होता है। ब्लड क्लॉट्स स्किन के पास मौजूद नसों में ज़्यादा होते हैं, लेकिन ये वाले ब्लड क्लॉट्स फटते नहीं हैं और इनसे पीई होने का खतरा भी नहीं होता।
शरीर की नसों में ब्लड क्लॉट्स या डीवीटी होने के कारण क्या हैं?

शरीर में ब्लड क्लॉट्स तभी होते हैं, जब नसों की अंदरूनी परत डैमेज हो जाती है। फिज़िकल, कैमिकल या बायोलॉजिकल फैक्टर्स के चलते नसों में गंभीर इंजरी हो सकती है, सूजन आ सकती है या इम्यूनिटी कम हो सकती है। सिर्फ यही नहीं, सर्जरी के कारण भी नसें प्रभावित हो सकती हैं। ऐसे में ब्लड क्लॉट्स होने के चांस बढ़ जाते हैं। सर्जरी के बाद खून का प्रवाह कम हो जाता है, क्योंकि मरीज़ कम चलता-फिरता है। अगर आप लंबे समय से बिस्तर पर हैं, बीमार हैं या यात्रा कर रहे हैं, तब भी ब्लड फ्लो कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में खून गाढ़ा हो जाता है। जीन्स या फैमिली हिस्ट्री के कारण भी कई बार ब्लड क्लॉटिंग का रिस्क बढ़ जाता है। और-तो-और, हार्मोन थेरेपी या गर्भनिरोधक गोलियों के सेवन से भी क्लॉटिंग का रिस्क ज़्यादा हो जाता है।  

किन लोगों को डीवीटी का रिस्क होता है?

1- जिन लोगों की डीवीटी की हिस्ट्री रही हो।
2- जो लोग उस कंडीशन में हों, जिसमें ब्लड क्लॉट होने की संभावना ज़्यादा होती है।
3- प्रेग्नेंसी और जन्म देने के बाद के पहले 6 हफ्ते।
4- जो लोग कैंसर का ट्रीटमेंट ले रहे हों।
5- 60 साल से ऊपर के लोग
6- ओबेसिटी
7- स्मोकिंग

डीवीटी के लक्षण?

1- टांगों में सूजन या टांगों की नसों में सूजन
2- खड़े होने या चलने पर टांगों में दर्द या वीकनेस
3- टांग के उस हिस्से का गर्म हो जाना जिसमें सूजन या दर्द हो
4- टांग के प्रभावित हिस्से का लाल या कोई और रंग में बदल जाना
5- पल्मनेरी एम्बॉलिज़म

पीई के लक्षण?

1- सांस लेने में दिक्कत
2- गहरी सांस लेने से दर्द होना
3- खांसी करते वक्त खून निकलना
4- तेज़ी से सांस का चलना और दिल की धड़कनें भी तेज़ हो जाना

डीवीटी का ट्रीटमेंट?

डॉक्टर्स दवाओं और थेरेपीज़ के ज़रिए डीवीटी का इलाज करते हैं। इस उपचार में डॉक्टर का लक्ष्य होता है-

1- ब्लड क्लॉट को बड़ा होने से रोकना
2- ब्लड क्लॉट को फटने से रोकना, ताकि वो फेफड़ों तक ना पहुंच पाए
3- दूसरा ब्लड क्लॉट होने का चांस कम करना

इसके अलावा डॉक्टर्स खून को पतला करने की भी दवाई देते हैं। इसे रेगुलर लेनी होती है। इसका कोर्स लगभग 6 महीने का होता है। इस दवाई को लेने से खून पतला हो जाता है और ब्लड क्लॉट बड़ा नहीं होता। जो ब्लड क्लॉट बन चुका है, यह दवाई उसे ब्रेक नहीं कर सकती। ब्लड क्लॉट्स बॉडी में समय के साथ अब्ज़ॉर्ब  होते हैं। ब्लड थिनर्स को पिल की फॉर्म में ले सकते हैं, इंजेक्शन या फिर नस में एक ट्यूब डालकर भी लिया जा सकता है। लेकिन, ब्लड थिनर्स का साइड इफेक्ट है ब्लीडिंग। ब्लीडिंग तब होती है, जब दवाईयों के कारण खून ज़्यादा पतला हो जाता है। यह घातक भी हो सकता है। कई बार ब्लीडिंग अंदरूनी होती है। इसीलिए, डॉक्टर्स मरीज़ों का बार-बार ब्लड टेस्ट करवाते रहते हैं। इन टेस्ट्स में पता चल जाता है कि खून के जमने के कितने चांस हैं।