Wednesday, 13 September 2017

दूब घास औषधीय गुणों से भरपूर

अरे घास री रोटी ही जद बन बिलावड़ो ले भाग्यो। कहा जाता है कि महाराणा प्रताप ने वनों में भटकते हुए जिस घास की रोटियां खाई थीं, वह भी दूब घास से ही निर्मित थी। जीं हां दूब घास मनुष्यों के लिए पूर्ण पौष्टिक आहार है और इसे औषधि के रूप में विशेष तौर पर प्रयोग किया जाता है

 दूब घास के औषधीय गुण--- कहा जाता है कि महाराणा प्रताप ने वनों में भटकते हुए जिस घास की रोटियां खाई थीं, वह भी दूब घास से ही निर्मित थी। दूब या ‘दुर्वा’ वर्ष भर पाई जाने वाली घास है। हिन्दू संस्कारों एवं कर्मकाण्डों में इसका उपयोग होने के कारण इस घास का हिंदु धर्म में बहुत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। दूब घास संपूर्ण भारत में पाई जाती है। दूब घास पशुओं के लिए ही नहीं बल्कि मनुष्यों के लिए भी पूर्ण पौष्टिक आहार है। अनेक औषधीय गुणों की मौजूदगी के कारण आयुर्वेद में इसे ‘महाऔषधि’ में कहा गया है। दूब के पौधे की जड़ें, तना, पत्तियां सभी का चिकित्सा के क्षेत्र में विशिष्ट महत्व है। आयुर्वेद के अनुसार दूब का स्वाद कसैला-मीठा होता है। विभिन्न प्रकार के पित्‍त एवं कब्‍ज विकारों को दूर करने के लिए दूब का प्रयोग किया जाता है। दूब घास को पेट के रोगों, यौन रोगों, लीवर रोगों के लिए चमत्‍कारी माना जाता है। दूब में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। आइए इस स्‍लाइड शो के माध्‍यम से इसके औषधीय गुणों के बारे में जानते हैं। 


रोगों में इसे लेने के उपाय-----  दूब का रस - 10-20 मिलीलीटर  , जड़ का चूर्ण - 3-6 ग्राम , पानी - 40-80 मिलीलीटर,पत्तियों का चूर्ण - 1-3 ग्राम  सबको मिलाकर इसका काढ़ा बनाकर पीयें। 


प्रतिरोधक क्षमता बढ़ायें-----दूब घास शरीर में प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ने में मदद करती हैं। इसमें मौजूद एंटीवायरल और एंटीमाइक्रोबिल गुणों के कारण यह शरीर की किसी भी बीमारी से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है। इसके अलावा दूब घास पौष्टिकता से भरपूर होने के कारण शरीर को एक्टिव और एनर्जीयुक्‍त बनाये रखने में बहुत मदद करती है। यह अनिद्रा रोग, थकान, तनाव जैसे रोगों में भी प्रभावकारी है।

त्‍वचा संबंधी समस्‍याओं में लाभकारी---इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-सेप्टिक गुणों के कारण यह त्‍वचा संबंधी समस्‍याओं जैसे- खुजली, त्वचा पर चकत्‍ते ओर एक्जिमा आदि समस्‍याओं से राहत दिलाता है। दूब घास को हल्दी के साथ पीसकर पेस्ट बनाकर त्वचा पर लगाने से समस्‍या से राहत मिलती है। इसके अलावा यह कुष्ठ रोग और खुजली जैसी समस्याओं से राहत दिलाने में भी मदद करता है। दूब का रस पीने से बार-बार लगने वाली प्यास बूझ जाती है। इससे पेशाब खुलकर होने लगता है। इसके साथ ही ब्‍लड की अनावश्यक गर्मी शांत होकर त्‍वचा विकार दूर होने लगते हैं।

महिलाओं की समस्‍याओं से राहत दिलाये--दूब यू.टी.आई यानी यूरीन मार्ग के संक्रमण के उपचार में प्रभावकारी रूप से काम करती है। साथ ही प्रोलेक्टिन हॉर्मोन को उन्नत करने में मदद करने के कारण यह स्‍तनपान कराने वाली महिलाओं के भी लाभकारी होता है। इसके अलावा दूर्वा के प्रयोग से महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएं जैसे- ल्‍यूकोरिया, बवासीर आदि से राहत मिलती है। समस्‍या होने पर दही के साथ दूब घास को मिलाकर सेवन करें।

एनीमिया दूर करें--दूब के रस को हरा रक्त कहा जाता है, क्‍योंकि इसे पीने से एनीमिया की समस्‍या को ठीक किया जा सकता है। दूब ब्‍लड को शुद्ध करती है एवं लाल रक्त कोशिकाओं को बढ़ाने में मदद करती है जिसके कारण हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है। इसके अलावा यह आंखों के लिए भी अच्छा होता हैं क्‍योंकि इस पर नंगे पैर चलने से नेत्र ज्योति बढती है।

मानसिक रोगों में लाभकारी-- दूब ठंडी तासीर वाली औषधि है, इसलिए दूब का ताजा रस मिर्गी, हिस्टीरिया इत्यादि मानसिक रोगों में प्रयुक्त होता है। दूब के काढ़े से कुल्ले करने से मुंह के छाले मिट जाते हैं। दूब को पीसकर मस्तिष्‍क पर लेप करने से नकसीर भी बंद हो जाती है।

पाचन शक्ति बढ़ाये-- दूब घास के लगातार सेवन से पेट की बीमारी का खतरा काफी हद तक कम होता है और पाचन शक्ति भी बढ़ती है। यह कब्ज, एसिडटी से राहत दिलाने में भी मदद करती है। दूब का रस पीने से पित्त से होने वाली उल्टी ठीक हो जाता है

अन्‍य बीमारियों में लाभकारी--- दूब घास फ्लेवोनोइड्स का मुख्‍य स्रोत है, जिसके कारण यह अल्सर को रोकने में मदद करती है।दूब में ब्‍लड में ग्लूकोज के स्तर को कम करने की क्षमता होती है। जिससे डायबिटीज कंट्रोल में रहता है। दूब ब्‍लड में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम कर दिल को मजबूती प्रदान करती है। यह सर्दी-खांसी एवं कफ समस्‍याओं को दूर करने में मददगार है।

मधुमेह के मरीज घास पर नंगे पांव चलें, स्वस्थ रहें

 मधुमेह के मरीज अगर अपनी जीवनशैली को संतुलित नहीं बनाए रखते हैं ! यह कहने की जरूरत नहीं है कि तो इससे उन्हें कई किस्म की समस्या हो सकती है। खुद को स्वस्थ बनाए रखने के लिए न सिर्फ उन्हें डाक्टरों के निर्देशानुसार नियमित दवा खानी होती है बल्कि रेगुलर वाक भी करना होता है। जी, हां! वाकिंग यानी चहलकदमी मधुमेह के मरीजों के लिए एक लाभकारी उपचार है। इसके अलावा विशेषज्ञों का दावा है कि यदि मधुमेह के मरीज नंगे पांव घास पर चलते हैं, तो इसके उन्हें असरकारक फायदे देखने को मिलते हैं। सही मायनों में घास में नंगे पांव चलना सामान्य और स्वस्थ लोगों के लिए चलना भी लाभकारी है।

 नंगे पांव घास पर चलने के फायदे

बैलेंस इंप्रूव होता है---सामान्यतः हम अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त हैं कि बमुश्किल ही नंगे पांव चलते हैं। लेकिन शायद आप यह नहीं जानते हैं कि नंगे पांव चलने से हमारा बैलेंस बेहतर होता है। दरअसल घास पर नंगे पांव चलने से हमारा वस्टीबूलर सिस्टम बेहतर होता है, जिससे हमारा न्यूरल सर्किट्स रिमैप होता है। आमतौर पर देखने को मिलता है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ लोग बैलेंस बना पाने में असमर्थ हो जाते हैं, ऐसे में अगर हम नंगे पांव चलें तो हमारा बैलेंस बेहतर होगा और उम्र का परछावा उसमें देखने को नहीं मिलता।

रक्त प्रवाह बेहतर होता है---डायबिटीज के मरीजों में अकसर पांव से जुड़ी समस्या देखने को मिलती है। लेकिन अगर वे नियमित घास पर नंगे पांव चलें तो इससे उनके पांव के तलवे का रक्त संचार बेहतर होगा। इससे चहलकदमी करने में सहजता भी महसूस होगी। असल में जैसा कि हम जानते हैं कि धरती में गुरुत्वाकर्षण क्षमता होती है जो कि हर चीज को अपनी ओर खींचती है। इसी सिद्धांत के तहत हमारा रक्त प्रवाह नीचे की ओर होता है, लेकिन चूंकि रक्त प्रवाह इस गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के उलट काम करने की कोशिश करता है, इससे हमारे सोल में रक्त प्रवाह बेहतर होने लगता है। यह स्थिति सामान्य लोगों और डायबिटीज के मरीजों के लिए भी लाभकारी है।

हृदय संबंधी बीमारी में कमी---मधुमेह के मरीज किस कदर हृदय संबंधी बीमारी की चपेट में आने के खतरों से घिरे रहते हैं, यह बात जगजाहिर है। ऐसे में मधुमेह के मरीजों के चहलकदमी जीवनदायिनी की तरह होती है। चहलकदमी करने से हमारे पूरे शरीर में रक्त प्रवाह बेहतर होता है, जिससे शरीर में रक्त के थक्के जमने की आशंका में कमी आती है। इसी का नतीजा है कि हृदय संबंधी बीमारियों में भी कमतरी होती है।

हड्डियां और मसल्स मजबूत होते हैं---नंगे पांव घास पर चलने से विनस रिटर्न में वृद्धि होती है, जिससे हमारी हड्डियां और मसल्स मजबूत होती हैं। इसके अलावा नियमित चहलकदमी करने से मसल्स फ्लेक्सिबल होती है। वाकिंग का असर सिर्फ पांव के मसल्स पर ही देखने को नहीं मिलता बल्कि पीठ और शरीर के पिछली हिस्से की हड्डियों में भी इसका असर साफ दिखता है। इससे हड्डियों में कैल्शियम में इजाफा होता है और सूरज की किरणों से हमें प्रत्यक्ष रूप में विटामिन डी भी मिलता है।

पांव से जुड़ी समस्या कम होती है-- हम ज्यादातर समय पांव में जूते ही पहने होते हैं, नतीजतन पंाव में कई किस्म की समस्या होने लगती है। कुछ लोगों में पांव सूजन, जलन, छिलना जैसी कई बीमारी हो जाती है। ऐसे में जब हम बिना जूतों के घास पर नंगे पांव चलते हैं तो इससे हमारे पांव को काफी आराम मिलता है। ठीक इसी तरह डायबिटीज मरीजों को भी अगर हल्की फुल्की पांव से जुड़ी कोई समस्या है तो उसका समाधान हो सकता है। हालंाकि डायबिटीज के मरीजों को हमेशा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अगर उन्हें पांव से जुड़ी कोई परेशानी है तो तुरंत डाक्टर से संपर्क करें।

रक्त चाप संतुलित करता है-- मौजूदा समय में हमारी ऐसी लाइफस्टाइल हो चुकी है कि ज्यादातर लोग रक्तचाप से पीड़ित हैं। लेकिन अगर आप नियमित घास पर नंगे पांव चहलकदमी करते हैं तो इससे आपको रक्तचाव संतुलित होता है। नतीजतन आप स्ट्रोक, किडनी फेलियर जैसी बीमारी के खतरों से भी बाहर हो जाते हैं। डायबिटीज के मरीजों को भी यह लाभ पहुंचाता है क्योंकि इससे उनकी जीवनशैली काफी हद तक संतुलित हो जाती है !

Sunday, 10 September 2017

आवला के फायदे

लाख दुखों की एक दवा साबित होता रहा है धातृ फल आंवला। पाचन तंत्र से लेकर स्मरण शक्ति तक को दुरुस्त रखता है। यहां तक कि यह बुढ़ापे को भी हमसे दूर रखता है। आंवले को सुखा कर उसे पिसवाकर घर ही में आंवला चूर्ण बनाया जा सकता है या बाज़ार में भी विभिन्न ब्रांड के आंवला चूर्ण मिलते है !
 चिरयौवन व दीर्घायुष्य प्रदान करने वाला, रसायन द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ, आयुर्वेद में 'अमृतफल' नाम से सम्बोधित व औषधियों में श्रेष्ठ फल है – आँवला। आँवला सभी ऋतुओं में, सभी जगह सभी के लिए लाभदायी है।  आँवला विटामिन सी का राजा होने के कारण शरीर को रोगाणुओं के आक्रमण से बचाता है, शारीरिक वृद्धि में आने वाली रूकावटों को दूर करता है, यकृत के कार्यों को सुचारू रूप से चलने में मदद करता है, जीवनीशक्ति को बढ़ाता है तथा दाँतों व मसूढ़ों को मृत्युपर्यन्त सुदृढ़ बनाये रखता है। आंवला के चूर्ण में मिश्री पीस कर मिला ले. इस मिश्रण का एक चम्मच एक गिलास पानी में घोलकर सुबह शाम शरबत की तरह पी ले. यह अत्यंत स्वादिष्ट, पुष्टिदायक व उत्तम पित्तशामक है। यह सप्तधातुओं की वृद्धि कर शरीर को बलवान व वीर्यवान बनाता है। इसके सेवन से पित्तजनित विकार जैसे – आँखों की जलन, आंतरिक गर्मी, सिरदर्द आदि तथा उच्च रक्तदाब, रक्त व त्वचा के विकार, मूत्र एवं वीर्य संबंधी विकार नष्ट हो जाते हैं। यह एक अत्यन्त सुलभ, सस्ता एवं गुणकारी प्रयोग है।
नवशक्ति की प्राप्तिः एक महीने तक आँवले का चूर्ण नियमित रूप से घी, शहद और तिल का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से मनुष्य की बोलने की शक्ति बढ़ती है, शरीर कांतिमान हो उठता है तथा चिरयौवन प्राप्त होता है।
- इन्द्रियों की कार्यक्षमता में वृद्धिः आँवले का चूर्ण पानी, घी या शहद के साथ सेवन करने से जठराग्नि बढ़ती है, सुनने, सूँघने, देखने की क्षमता में बढ़ोतरी होती है तथा दीर्घायुष्य प्राप्त होता है।
 हृदय की मजबूतीः सूखा आँवला एवं मिश्री चूर्ण सम मात्रा में एक-एक चम्मच सुबह शाम सेवन करने से हृदय मजबूत होता है। हृदय के वाल्व ठीक ढंग से कार्य करते हैं। हृदयरोगियों को यह प्रयोग कम से कम एक वर्ष तक नियंत्रित करना चाहिए।
 काले, घने, रेशम जैसे बालों के लिएः 20 सि 40 ग्राम सूखा आँवला 200 ग्राम पानी में रात को भिगो दें व सुबह उस पानी से बाल धो दें। आँवला-मिश्री का समभाग चूर्ण पानी के साथ सेवन करें। इस प्रयोग से बालों की सभी समस्याएँ खत्म हो जायेंगी व बाल चमचमाते नजर आयेंगे।
 गर्भवती स्त्रियों के लिएः नित्य 2 नग मुरब्बा सुबह खाली पेट गर्भवती महिला को खिलाने से प्रसव नैसर्गिक रूप से बिना किसी औषधि और चिकित्सकीय सहयोग के होता है तथा शिशु में तीव्र रोगप्रतिरोधक क्षमता पायी जाती है, जिसके प्रभाव से शिशु ओजस्वी व सुंदर होता है।
 समस्त यकृत रोगः आँवलों का 5 ग्राम चूर्ण सेवन करने से यकृत (लीवर) के दोष दूर हो जाते हैं।
 पेट के कीड़ेः ताजे आँवले का रस छः चम्मच और शुद्ध शहद 1 चम्मच मिलाकर एक सप्ताह तक सुबह शाम दें। इससे निश्चित रूप से कृमि मल के साथ बाहर आ जाते हैं।
 पेट के समस्त रोगः आँवला चूर्ण का सेवन करने से पेट के लगभग सभी रोगों में लाभ होता है। कब्ज दूर होती है. गोमूत्र के साथ करे तो और भी अधिक लाभ होता है.
 तेज व मेधा की वृद्धिः आँवला चूर्ण घी के साथ रोज सेवन करने से शरीर में तेज व मेधाशक्ति की वृद्धि होती है।
 दीर्घायु-प्राप्ति हेतुः 'गरूड़ पुराण' के अनुसार सौ वर्ष तक जीने के इच्छुक व्यक्ति को नित्य आँवला मिले जल से स्नान करना चाहिए।
 गर्मियों में त्वचा पर आंवले के चूर्ण को पानी में घोलकर लेप करने से शरीर की गर्मी निकल जाती है. त्वचा कांतिवान होती है.
बालों में भी यह लेप लगाने से बल चमकदार , काले होते है. रुसी दूर होती है.
- एडियों पर लेप लगाने से फटी एडियाँ ठीक होती है.
- आंवले के साथ हरा धनिया पीसकर खाने से भी आंखों के रोग में लाभ होता है.
- आंवला और चंदन का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर 1-1 चम्मच चूर्ण दिन में 3 बार शक्कर और शहद के साथ चाटने से गर्मी की वजह से होने वाली उल्टी बंद हो जाती है।
- लगभग 1 महीने तक प्रतिदिन सुबह और शाम को पीने से स्त्रियों को होने वाला श्वेतप्रदर नष्ट हो जाता है।
- आंवला चूर्ण से 2 गुनी मात्रा में गुड़ मिलाकर बेर के आकार की गोलियां बना लें। 3 गोलियां रोजाना लेने से जोड़ों का दर्द खत्म होता है।
- पिसा हुआ आंवला 1 चम्मच, 2 चम्मच शहद में मिला कर चाटें, ऊपर से दूध पीएं। इससे सदा स्वास्थ्य अच्छा रहता है। दिनभर प्रसन्नता का अनुभव होता है।
- यह दांतों , मसूढ़ों , हड्डियों को मज़बूत बनाता है.
- गर्मी से होने वाली शरीर की जलन दूर करता है.
- इतने सारे लाभ मिले इसलिए घर में अमृत फल आंवले का चूर्ण अवश्य रखे
-आंवला चूर्ण और हल्दी चूर्ण समान मात्र में लेकर भोजन के पश्चात ग्रहण करने से मधुमेह में लाभ प्राप्त होता है।
-हिचकी तथा उल्टी में आंवला रस, मिश्री के साथ दिन में दो-तीन बार सेवन करें।
-पीलिया से परेशान हैं तो आंवले को शहद के साथ चटनी बनाकर सुबह-शाम सेवन करें।
-आंवला, रीठा व शिकाकाई के चूर्ण से बाल धोने पर बाल स्वस्थ व चमकदार होते हैं।
-आंवले का मुरब्बा शक्तिदायक व शीतलता प्रदान करने वाला होता है।
-स्मरण शक्ति कमजोर पड़ गई हो तो सुबह उठकर गाय के दूध के साथ दो आंवले का मुरब्बा खाना चाहिए।
-एक गिलास ताजा पानी 25 ग्राम सूखे आंवले बारीक पिसे हुए व 25 ग्राम गुड़ मिलाकर 40 दिन तक दिन में 2 बार सेवन करने से गठिया रोग समाप्त हो जाता है।
-सूखे आंवले का चूर्ण मूली के रस में मिलाकर 40 दिन तक खाने से पथरी रोग से मुक्ति मिल जाएगी।
-आंवले के रस में थोड़ा कपूर मिलाकर उसका लेप मसूड़ों पर करने से दांत का दर्द ठीक हो जाए। दांतों के कीड़े भी मर जाएंगे।
-रात को सोते समय आंवले का चूर्ण एक गिलास गाय के दूध के साथ सेवन करने से कब्ज दूर हो जाएगी।
-सूखे आवले को पीसकर छलनी में छानकर आटे की भांति गूथकर रोज रात को सोते समय मुंह पर लेप करें और सुबह उठकर उसे धो दें। आपकाचेहरा चमक उठेगा।
-आंवले के रस में घी का छौंक देकर सेवन करने से ज्वर नष्ट हो जाता है।
-श्वेत प्रदर की समस्या में आंवले के चूर्ण में मधु मिलाकर सेवन करें, लाभ होगा।
-बूढ़े दिखते हैं तो सूखे आंवले का चूर्ण तथा तिल का चूर्ण सम भाग में मिलाकर घी व मधु के साथ 20 दिनों तक सेवन करें, लाभ होगा

Saturday, 9 September 2017

अनियमित मासिक धर्म के कारण लक्षण और उपचार

10 से 15 साल की आयु की लड़की के अंडाशय हर महीने एक विकसित डिम्ब (अण्डा) उत्पन्न करना शुरू कर देते हैं। वह अण्डा अण्डवाहिका नली (फैलोपियन ट्यूव) के द्वारा नीचे जाता है जो कि अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। जब अण्डा गर्भाशय में पहुंचता है, उसका अस्तर रक्त और तरल पदार्थ से गाढ़ा हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि यदि अण्डा उर्वरित हो जाए, तो वह बढ़ सके और शिशु के जन्म के लिए उसके स्तर में विकसित हो सके। यदि उस डिम्ब का पुरूष के शुक्राणु से सम्मिलन न हो तो वह स्राव बन जाता है जो कि योनि से निष्कासित हो जाता है। इसी स्राव को मासिक धर्म, रजोधर्म या माहवारी (Menstural Cycle or MC) कहते हैं।
माहवारी चक्र महीने में एक बार होता है, सामान्यतः 28 से 32 दिनों में एक बार। हालांकि अधिकतर मासिक धर्म का समय तीन से पांच दिन रहता है परन्तु दो से सात दिन तक की अवधि को सामान्य माना जाता है
माहवारी सम्बन्धी समस्याएं—- ज्यादातर महिलाएं माहवारी (Menstrual cycle) की समस्याओं से परेशान रहती है लेकिन अज्ञानतावश या फिर शर्म या झिझक के कारण लगातार इस समस्या से जूझती रहती है। यहां समस्या बताने से पहले यह भी बता दें कि माहवारी है क्या. दरअसल दस से पन्द्रह साल की लड़की के अण्डाशय हर महीने एक परिपक्व अण्डा या अण्डाणु पैदा करने लगता है। वह अण्डा डिम्बवाही थैली (फेलोपियन ट्यूब) में संचरण करता है जो कि अण्डाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। जब अण्डा गर्भाशय में पहुंचता है तो रक्त एवं तरल पदाथॅ से मिलकर उसका अस्तर गाढ़ा होने लगता है। यह तभी होता है जब कि अण्डा उपजाऊ हो, वह बढ़ता है, अस्तर के अन्दर विकसित होकर बच्चा बन जाता है। गाढ़ा अस्तर उतर जाता है और वह माहवारी का रूधिर स्राव बन जाता है, जो कि योनि द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है। जिस दौरान रूधिर स्राव होता रहता है उसे माहवारी अवधि/पीरियड कहते हैं। औरत के प्रजनन अंगों में होने वाले बदलावों के आवर्तन चक्र को माहवारी चक्र कहते हैं। यह हॉरमोन तन्त्र के नियन्त्रण में रहता है एवं प्रजनन के लिए जरूरी है। माहवारी चक्र की गिनती रूधिर स्राव के पहले दिन से की जाती है क्योंकि रजोधर्म प्रारम्भ का हॉरमोन चक्र से घनिष्ट तालमेल रहता है। माहवारी का रूधिर स्राव हर महीने में एक बार 28 से 32 दिनों के अन्तराल पर होता है। परन्तु महिलाओं को यह याद करना चाहिए कि माहवारी चक्र के किसी भी समय गर्भ होने की सम्भावना है।
पीड़ा दायक माहवारी क्या होती है?
पीड़ा दायक माहवारी मे निचले उदर में ऐंठनभरी पीड़ा होती है। किसी औरत को तेज दर्द हो सकता है जो आता और जाता है या मन्द चुभने वाला दर्द हो सकता है। इन से पीठ में दर्द हो सकता है। दर्द कई दिन पहले भी शुरू हो सकता है और माहवारी के एकदम पहले भी हो सकता है। माहवारी का रक्त स्राव कम होते ही सामान्यतः यह खत्म हो जाता है।
पीड़ादायक माहवारी का आप घर पर क्या उपचार कर सकते हैं?
निम्नलिखित उपचार हो सकता है कि आपको पर्चे पर लिखी दवाओं से बचा सकें। (1) अपने उदर के निचले भाग (नाभि से नीचे) गर्म सेक करें। ध्यान रखें कि सेंकने वाले पैड को रखे-रखे सो मत जाएं। (2) गर्म जल से स्नान करें। (3) गर्म पेय ही पियें। (4) निचले उदर के आसपास अपनी अंगुलियों के पोरों से गोल गोल हल्की मालिश करें। (5) सैर करें या नियमित रूप से व्यायाम करें और उसमें श्रोणी को घुमाने वाले व्यायाम भी करें। (6) साबुत अनाज, फल और सब्जियों जैसे मिश्रित कार्बोहाइड्रेटस से भरपूर आहार लें पर उसमें नमक, चीनी, मदिरा एवं कैफीन की मात्रा कम हो। (7) हल्के परन्तु थोड़े-थोड़े अन्तराल पर भोजन करें। (8) ध्यान अथवा योग जैसी विश्राम परक तकनीकों का प्रयोग करें। (9) नीचे लेटने पर अपनी टांगे ऊंची करके रखें या घुटनों को मोड़कर किसी एक ओर सोयें।
पीड़ादायक माहवारी के लिए डाक्टर से कब परामर्श लेना चाहिए?
यदि स्व-उपचार से लगातार तीन महीने में दर्द ठीक न हो या रक्त के बड़े-बड़े थक्के निकलते हों तो डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए। यदि माहवारी होने के पांच से अधिक दिन पहले से दर्द होने लगे और माहवारी के बाद भी होती रहे तब भी डाक्टर के पास जाना जाहिए।
माहवारी से पहले की स्थिति के क्या लक्षण हैं?
माहवारी होने से पहले (पीएमएस) के लक्षणों का नाता माहवारी चक्र से ही होता है। सामान्यतः ये लक्षण माहवारी शुरू होने के 5 से 11 दिन पहले शुरू हो जाते हैं। माहवारी शुरू हो जाने पर सामान्यतः लक्षण बन्द हो जाते हैं या फिर कुछ समय बाद बन्द हो जाते हैं। इन लक्षणों में सिर दर्द, पैरों में सूजन, पीठ दर्द, पेट में मरोड़, स्तनों का ढीलापन अथवा फूल जाने की अनुभूति होती है।
पी.एम.एस. (माहवारी से पहले बीमारी) के कारण क्या हैं?
पी.एम.एस. का कारण जाना नहीं जा सका है। यह अधिकतर 20 से 40 वर्षों की औरतों में होता है, एक बच्चे की मां या जिनके परिवार में कभी कोई दबाव में रहा हो, या पहले बच्चे के होने के बाद दबाव के कारण कोई महिला बीमार रही हो- उन्हें होता है।
पी.एम.एस (माहवारी के पहले की बीमारी) का घर पर कैसे इलाज हो सकता है?
पी.एम.एस के स्व- उपचार में शामिल है-
  • (1) नियमित व्यायाम – प्रतिदिन 20 मिनट से आधे घंटे तक, जिसमें तेज चलना और साईकिल चलाना भी शामिल है।
  • (2) आहारपरक उपाय साबुत अनाज, सब्जियों और फलों को बढ़ाने तथा नमक, चीनी एवं कॉफी को घटाने या बिल्कुल बन्द करने से लाभ हो सकता है।
  • (3) दैनिक डायरी बनायें या रोज का रिकार्ड रखें कि लक्षण कैसे थे, कितने तेज थे और कितनी देर तक रहे। लक्षणों की डायरी कम से कम तीन महीने तक रखें। इससे डाक्टर को न केवल सही निदान ढ़ंढने मे मदद मिलेगी, उपचार की उचित विधि बताने में भी सहायता मिलेगी।
  • (4) उचित विश्राम भी महत्वपूर्ण है।
माहवारी के स्राव को कब भारी माना जाता है?
यदि लगातार छह घन्टे तक हर घंटे सैनेटरी पैड स्राव को सोख कर भर जाता है तो उसे भारी पीरियड कहा जाता है। भारी माहवारी के स्राव के सामाय कारण क्या हैं?
भारी माहवारी स्राव के कारणों में शामिल है –
(1) गर्भाषय के अस्तर में कुछ निकल आना।
(2) जिसे अपक्रियात्मक गर्भाषय रक्त स्राव कहा जाता है। जिस की व्याख्या नहीं हो पाई है।
(3) थायराइड ग्रन्थि की समस्याएं
(4) रक्त के थक्के बनने का रोग
(5) अंतरा गर्भाषय उपकरण
(6) दबाव।
लम्बा माहवारी पीरियड किसे कहते हैं?
लम्बा पीरियड वह है जो कि सात दिन से भी अधिक चले। लम्बेमाहवारी पीरियड के सामान्य के कारण क्या हैं?(1) अण्डकोष में पुटि (2) कई बार कारण पता नहीं चलता तो उसे अपक्रियात्मक गर्भाषय रक्त स्राव कहते हैं (3) रक्त स्राव में खराबी और थक्के रोकने के लिए ली जाने वाली दवाईयां (4) दबाव के कारण माहवारी पीरियड लम्बा हो सकता है।
अनियमित माहवारी पीरियड क्या होता है?
अनियमित माहवारी पीरियड वह होता है जिसमें अवधि एक चक्र से दूसरे चक्र तक लम्बी हो सकती है, या वे बहुत जल्दी-जल्दी होने लगते हैं या असामान्य रूप से लम्बी अवधि से बिल्कुल बिखर जाते हैं। किशोरावस्था के पहले कुछ वर्षों में अनियमित पीरियड़ होना क्या सामान्य बात है?हां, शुरू में पीरियड अनियमित ही होते हैं। हो सकता है कि लड़की को दो महीने में एक बार हो या एक महीने में दो बार हो जाए, समय के साथ-साथ वे नियमित होते जाते हैं।
अनियमित माहवारी के कारण क्या है?
जब पीरियड असामान्य रूप में जल्दी-जल्दी होते हैं तो उनके कारण होते हैं-
(1) अज्ञात कारणों से इन्डोमिट्रोसिस हो जाता है जिससे जननेद्रिय में पीड़ा होती है और जल्दी-जल्दी रक्त स्राव होता है।
(2) कभी-कभी कारण स्पष्ट नहीं होता तब कहा जाता है कि महिला को अपक्रियात्मक गर्भाषय रक्तस्राव है।
(3) अण्डकोष की पुष्टि
(4) दबाव।
सामान्य पांच दिन की अपेक्षा अगर माहवारी रक्त स्राव दो या चार दिन के लिए चले तो चिन्ता का कोई कारण होता है?
नहीं, चिन्ता की कोई जरूरत नहीं। समय के साथ पीरियड का स्वरूप बदलता है, एक चक्र से दूसरे चक्र में भी बदल जाता है।
भारी, लम्बे और अनियमित पीरियड होने पर क्या करना चाहिए?
(1) माहवारी चक्र का रिकॉर्ड रखें- कब खत्म हुए, कितना स्राव हुआ (कितने पैड में काम में आए उनकी संख्या नोट करें और वे कितने भीगे थे) और अन्य कोई लक्षण आप ने महसूस किया हो तो उसे भी शामिल करें।
(2) यदि तीन महीने से ज्यादा समय तक समस्या चलती रहे तो डाक्टर से परामर्श करें।
माहवारी का अभाव क्या होता है?
यदि 16 वर्ष की आयु तक माहवारी न हो तो उसे माहवासी अभाव कहते हैं। कारण है-
(1) औरत के जनन तंत्र में जन्म से होने वाला विकास
(2) योनि (योनिच्छद) के प्रवेशद्वारा की झिल्ली में रास्ते की कमी
(3) मस्तिष्क की ग्रन्थियों में रोग।
मासिक धर्म अनियमित होने या बिलकुल न होने के कारण—–
Reasons for missed periods and irregular periods
पीरियड क्या है? मासिक धर्म के चक्र की अवधि आमतौर पर औसत रूप से निकाली जाती है। एक औसत के मुताबिक़ हर 28 दिनों के अंतराल में एक महिला के पीरियड्स (periods) होने चाहिए। इसमें 2 से 3 दिन आगे पीछे अवश्य हो सकते हैं, और ऐसा होना किसी ख़ास चिंता का विषय भी नहीं होता। पर अगर यह अंतराल इससे ज़्यादा बढ़ गया तो इसका मतलब हुआ कि आपके मासिक धर्म की प्रक्रिया अनियमित हो गयी है। ऐसा देखा गया है कि बच्चे के जन्म के समय के दौरान 30% महिलाओं के मासिक धर्म की प्रक्रिया अनियमित हुई है। यह आमतौर पर कोई समस्या नहीं है, पर यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य की दृष्टि से आपकी स्थिति गंभीर है। अगर आप अनियमित रूप से होने वाले मासिक धर्म से पीड़ित हैं तो ये साफ़ दर्शाता है कि आपके मासिक धर्म में संतुलन का अभाव है। असल में ज़्यादातर अनियमित मासिक धर्म कोई नुकसान नहीं पहुंचाते और शरीर के लिए कोई ज़्यादा घातक भी नहीं होते।
पीरियड टिप्स – आपके पीरियड्स अनियमित कैसे होते हैं? (How exactly is your periods irregular?)
• मासिक धर्म का चक्र तब अनियमित माना जाता है, जब यह 21 दिनों के अंतराल के पहले हो जाए।
• यह तब भी अनियमित माना जाता है, जब यह 8 दिनों से ज्यादा चले।
• चाहे आपके पीरियड्स छूटे हों, जल्दी हो गए हों या फिर देर से ही क्यों ना हो रहे हों, इन सबको अनियमित पीरियड्स की ही श्रेणी में रखा जाता है।
छूटे हुए और अनियमित पीरियड्स के कारण (Reason form missed and irregular periods)
गर्भावस्था (Pregnancy)
मासिक धर्म के अनियमित रूप से होने के पीछे गर्भावस्था भी एक कारण हो सकता है। आप निश्चित रूप से गर्भावस्था के समय मासिक धर्म कर ना होने का अनुभव करेंगी पर इसमें चिंता की कोई बात नहों होती और यह बिलकुल स्वास्थ्यवर्धक होता है। प्रसव काल के बाद का समय भी आपको चिंतित कर सकता है जब आप भारी मात्रा में रक्तपात या इस जैसी किसी अन्य समस्या का सामना करती हैं।
पीरियड की समस्या – गर्भनिरोधक गोलियां (Birth control pills)
गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन करने से आपके मासिक धर्म की प्रक्रिया अनियमित होती है। ऐसा करीब 2 महीनों तक हो सकता है, पर आपको कुछ समय के लिए ऐसी स्थिति से गुज़रना पड़ता है। कुछ समय के लिए आपका खून भी निकल सकता है,हालांकि यह सामान्य पीरियड्स की तरह बिलकुल नहीं होता। इन गोलियों की वजह से आपके पीरियड्स लम्बे समय तक छूट भी सकते हैं, परन्तु अंत में जाकर ये नियंत्रित हो जाता है।
मासिक धर्म का न आना – हॉर्मोन का असंतुलन (hormonal imbalance)
मासिक धर्म का अनियमित होना,रुक रुक क़र होना,भारी मात्रा में रक्तपात और खून के थक्के जमना शरीर के हॉर्मोन्स के असंतुलन की वजह से होता है और हॉर्मोन्स के इस असंतुलन को ठीक भी किया जा सकता है। मासिक धर्म की शुरुआत में हॉर्मोन्स को शरीर में हो रहे परिवर्तन के अनुसार खुद को ढालने में वर्षों लग जाते हैं और तब कहीं जाकर मासिक धर्म के होने की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती है। आप इसकी वजह से अपने मासिक धर्म के अंत में भी अनियमित मासिक धर्म का अनुभव कर सकती हैं। अतः अगर आपका मासिक धर्म अनियमित है तो आपको ज़्यादा चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
पीरियड की समस्या – पोलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (Polycystic ovary syndrome (PCOS)
यह एक डॉक्टरी समस्या है, जिसकी शिकार कोई भी महिला हो सकती है। यह उन महिलाओं के लिए काफी सामान्य है, जिनकी जीवनशैली अनियमित है तथा जिनका वज़न काफी ज़्यादा है। इस स्थिति के अंतर्गत महिलाओं के अंडाशय (ovary) में छोटे सिस्ट्स (cysts) पैदा हो जाते हैं और ये सामान्य अण्डोत्सर्ग की प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं। इस समस्या की शिकार महिलाओं का मासिक धर्म चक्र काफी अनियमित होता है। इससे बांझपन की समस्या तथा मधुमेह और दिल की अन्य बीमारियाँ भी हो सकती हैं।
पीरियड्स की समस्या – उम्र (Age)
जब महिलाएं पीरियड्स के शुरूआती महीनों में होती हैं, तो इसका नियमित रूप से ना होना बिलकुल सामान्य है। आपके शरीर को नए परिवर्तनों के अनुसार खुद को ढालने और संतुलन बनाने में थोड़ा सा समय लगता है। कुछ महिलाओं को इस परिवर्तन का आदि होने में कई साल लग जाते हैं। दूसरी तरफ ऐसी महिलाएं, जो रजोनिवृत्ति (menopause) के समय के करीब पहुँच गयी हैं, पीरियड्स के छूटने, हलके या भारी पीरियड्स का अनुभव कर सकती हैं।
मासिक धर्म जल्दी होने के तरीके (period regular karne ke tips)
मासिक धर्म में देरी – गर्भनिरोधक गोलियां (Contraceptive pills): गर्भनिरोधक गोलियों से ना सिर्फ गर्भवती होने के डर से छुटकारा मिलता है, बल्कि पीरियड्स भी जल्दी होते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि ये हमारे शरीर के हॉर्मोन्स को नियंत्रित करते हैं। 35 वर्ष से ज़्यादा की महिलाओं को इन दवाओं का सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह कर लेनी चाहिए। ऐसा करने से किसी भी समस्या को समय रहते दूर किया जा सकता है।
अनियमित मासिक धर्म – विटामिन सी (Vitamin C): इससे पीरियड्स जल्दी होते हैं, क्योंकि ये प्रोजेस्टेरोन (progesterone) की कमी कर देता है। इससे आप इन्हें अपने शरीर में प्राप्त नहीं कर पाती, क्योंकि इससे स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ सकती हैं।
माहवारी की जानकारी – जड़ीबूटी (Herbs): अदरक और अजवायन ऐसे दो तत्व हैं, जिनकी मदद से आपके पीरियड्स जल्दी होते हैं। ये गर्भाशय को फैलाने में मदद करते हैं, जिससे द्रव्य आसानी से निकलता है। यह आपके शरीर की हॉर्मोन की समस्याओं को भी नियंत्रित कर देते हैं, जो कि देर से पीरियड्स होने का कारण होते हैं। अपनी चाय में अदरक या अजवायन का मिश्रण करें। इसे सुबह एक बार और रात को एक बार पियें

Thursday, 7 September 2017

अस्थमा (दमा)

अस्थमा (दमा)  श्वसन मार्ग का एक आम जीर्ण सूजन disease वाला रोग है जिसे चर व आवर्ती लक्षणों, प्रतिवर्ती श्वसन बाधा और श्वसनी-आकर्ष से पहचाना जाता है। आम लक्षणों में घरघराहटखांसी, सीने में जकड़न और श्वसन में समस्याशामिल हैं।

दमा फेफड़ों को खासा प्रभावित करता है। दमा के कारण व्यक्ति को श्वसन संबंधी कई बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। दमा सिर्फ युवाओं और वयस्कों को ही नहीं बल्कि बच्चों को भी अपनी चपेट में ले लेता है। हालांकि अस्‍थमा के इलाज के लिए इनहेलर दिया जाता है लेकिन इनहेलर के दुष्‍प्रभाव भी होते हैं। इन सबके अलावा सवाल ये उठता है कि क्या दमा के प्रकार अलग-अलग होते हैं। बच्चों और बड़ों में होने वाला अस्थमा एक ही प्रकार का होता है। ये आपके लिए जानना बहुत जरूरी हैं। 
 जाने दमा के तमाम प्रकारों के बारे में----  
  • एलर्जिक अस्थमा – एलर्जिक अस्थमा के दौरान आपको किसी चीज से एलर्जी है जैसे धूल-मिट्टी के संपर्क में आते ही आपको दमा हो जाता है या फिर मौसम परिवर्तन के साथ ही आप दमा के शिकार हो जाते हैं।
  • नॉनएलर्जिक अस्थमा- इस तरह के अस्थमा का कारण किसी एक चीज का एक्सिक्ट्रीम पर जाने से ऐसा होता है। जब आप बहुत अधिक तनाव में हो  या बहुत तेज-तेज हंस रहे हो, आपको बहुत अधिक सर्दी लग गई हो या बहुत अधिक खांसी-जुकाम हो। 
  • मिक्सड अस्थमा- इस प्रकार का अस्थमा किन्हीं भी कारणों से हो सकता है। कई बार ये अस्थमा एलर्जिक कारणों से तो है तो कई बार नॉन एलर्जिक कारणों से। इतना ही नहीं इस प्रकार के अस्थमा के होने के कारणों को पता लगाना भी थोड़ा मुश्किल होता है।
  • एक्सरसाइज इनड्यूस अस्थमा- कई लोगों को एक्सरसाइज या फिर अधिक शारीरिक सक्रियता के कारण अस्थमा हो जाता है तो कई लोग जब अपनी क्षमता से अधिक काम करने लगते हैं तो वे अस्थमा के शिकार हो जाते हैं।
  • कफ वेरिएंट अस्थमा- कई बार अस्थमा का कारण कफ होता है। जब आपको लगातार कफ की शिकायत होती है या खांसी के दौरान अधिक कफ आता है तो आपको अस्थमा अटैक पड़ जाता है।
  • ऑक्यूपेशनल अस्थमा- ये अस्थमा अटैक अचानक काम के दौरान पड़ता है। नियमित रूप से लगातार आप एक ही तरह का काम करते हैं तो अकसर आपको इस दौरान अस्थमा अटैक पड़ने लगते हैं या फिर आपको अपने कार्यस्थल का वातावरण सूट नहीं करता जिससे आप अस्थमा के शिकार हो जाते हैं।
  • नॉक्टेर्नल यानी नाइटटाइम अस्थमा- ये अस्थमा का ऐसा प्रकार है जो रात के समय ही होता है यानी जब आपको अकसर रात के समय अस्थमा का अटैक पड़ने लगे तो आपको समझना चाहिए कि आप नॉक्टेर्नल अस्थमा के शिकार हैं।
  • मिमिक अस्थमा- जब आपको कोई स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी कोई बीमारी जैसे निमोनिया, कार्डियक जैसी बीमारियां होती हैं तो आपको मिमिक अस्थमा हो सकता है। आमतौर पर मिमिक अस्थमा तबियत अधिक खराब होने पर होता है।
  • चाइल्ड ऑनसेट अस्थमा- ये अस्थमा का वो प्रकार है जो सिर्फ बच्चों को ही होता है। अस्‍थमैटिक बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है तो बच्चा इस प्रकार के अस्थमा से अपने आप ही बाहर आने लगता है। ये बहुत रिस्की नहीं होता लेकिन इसका सही समय पर उपचार जरूरी है।
  • एडल्ट ऑनसेट अस्थमा- ये अस्थमा युवाओं को होता है। यानी अकसर 20 वर्ष की उम्र के बाद ही ये अस्थमा होता है। इस प्रकार के अस्थमा के पीछे कई एलर्जिक कारण छुपे होते हैं। हालांकि इसका मुख्य कारण प्रदूषण, प्लास्टिक, अधिक धूल मिट्टी और जानवरों के साथ रहने पर होता है

अस्थमा के घरेलू उपचार (Home Remedies For Asthma)


  • लहसुन दमा के इलाज में काफी कारगर साबित होता है। 30 मिली दूध में लहसुन की पांच कलियां उबालें और इस मिश्रण का हर रोज सेवन करने से दमे में शुरुआती अवस्था में काफी फायदा मिलता है।
  • अदरक की गरम चाय में लहसुन की दो पिसी कलियां मिलाकर पीने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है। सबेरे और शाम इस चाय का सेवन करने से मरीज को फायदा होता है।
  • अदरक का एक चम्मच ताजा रस, एक कप मैथी के काढ़े और स्वादानुसार शहद इस मिश्रण में मिलाएं। दमे के मरीजों के लिए यह मिश्रण लाजवाब साबित होता है।
  • दमा रोगी पानी में अजवाइन मिलाकर इसे उबालें और पानी से उठती भाप लें, यह घरेलू उपाय काफी फायदेमंद होता है।
  • 4-5 लौंग लें और 125 मिली पानी में 5 मिनट तक उबालें। इस मिश्रण को छानकर इसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलाएँ और गरम-गरम पी लें। हर रोज दो से तीन बार यह काढ़ा बनाकर पीने से मरीज को निश्चित रूप से लाभ होता है।
  • 180 मिमी पानी में मुट्ठीभर सहजन की पत्तियां मिलाकर करीब 5 मिनट तक उबालें। मिश्रण को ठंडा होने दें, उसमें चुटकीभर नमक, कालीमिर्च और नीबू रस भी मिलाया जा सकता है। इस सूप का नियमित रूप से इस्तेमाल दमा उपचार में कारगर माना गया है।
  • मैथी का काढ़ा तैयार करने के लिए एक चम्मच मैथीदाना और एक कप पानी उबालें। हर रोज सबेरे-शाम इस मिश्रण का सेवन करने से निश्चित लाभ मिलता है।
  • एक पका केला छिलका लेकर चाकू से लम्बाई में चीरा लगाकर उसमें एक छोटा चम्मच दो ग्राम कपड़ा छान की हुई काली मिर्च भर दें। फिर उसे बगैर छीले ही, केले के वृक्ष के पत्ते में अच्छी तरह लपेट कर डोरे से बांध कर 2-3 घंटे रख दें। बाद में केले के पत्ते सहित उसे आग में इस प्रकार भूने की उपर का पत्ता जले। ठंडा होने पर केले का छिलका निकालकर केला खा लें।

मिर्गी (अपस्मार ) की विशेष जानकारी ओर सलाह

(    
मिर्गी (अपस्मार )  अंग्रेजीEpilepsy) एक तंत्रिकातंत्रीय विकार (न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर) है जिसमें रोगी को बार-बार दौरे पड़ते है। मस्तिष्क में किसी गड़बड़ी के कारण बार-बार दौरे पड़ने की समस्या हो जाती है। दौरे के समय व्यक्ति का दिमागी संतुलन पूरी तरह से गड़बड़ा जाता है और उसका शरीर लड़खड़ाने लगता है। इसका प्रभाव शरीर के किसी एक हिस्से पर देखने को मिल सकता है, जैसे चेहरे, हाथ या पैर पर। इन दौरों में तरह-तरह के लक्षण होते हैं, जैसे कि बेहोशी आना, गिर पड़ना, हाथ-पांव में झटके आना। मिर्गी किसी एक बीमारी का नाम नहीं है। अनेक बीमारियों में मिर्गी जैसे दौरे आ सकते हैं। मिर्गी के सभी मरीज एक जैसे भी नहीं होते। किसी की बीमारी मध्यम होती है, किसी की तेज। यह एक आम बीमारी है जो लगभग सौ लोगों में से एक को होती है। इनमें से आधों के दौरे रूके होते हैं और शेष आधों में दौरे आते हैं, उपचार जारी रहता है। अधिकतर लोगों में भ्रम होता है कि ये रोग आनुवांशिक होता है पर सिर्फ एक प्रतिशत लोगों में ही ये रोग आनुवांशिक होता है। विश्व में पाँच करोड़ लोग और भारत में लगभग एक करोड़ लोग मिर्गी के रोगी हैं। विश्व की कुल जनसँख्या के ८-१० प्रतिशत लोगों को अपने जीवनकाल में एक बार इसका दौरा पड़ने की संभावना रहती है। १७ नवम्बर को विश्व भर में विश्व मिरगी दिवस का आयोजन होता है। इस दिन तरह-तरह के जागरुकता अभियान और उपचार कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता हैमानव मस्तिष्क कई खरब तंत्रिका कोशिकाओं से निर्मित होता है। इन कोशिकाओं की क्रियाशीलता कार्य-कलापों को नियंत्रित करती है। मस्तिष्क के समस्त कोषों में एक विद्युतीय प्रवाह होता है जो नाड़ियों द्वारा प्रवाहित होता है। ये सारे कोष विद्युतीय नाड़ियों के माध्यम से आपस में संपर्क बनाये रखते हैं, लेकिन कभी मस्तिष्क में असामान्य रूप से विद्युत का संचार होने से व्यक्ति को एक विशेष प्रकार के झटके लगते हैं और वह मूर्छित हो जाता है। ये मूर्छा कुछ सेकिंड से लेकर ४-५ मिनट तक चल सकती है। मिर्गी रोग दो प्रकार का हो सकता है आंशिक तथा पूर्ण। आंशिक मिर्गी में मस्तिष्क का एक भाग अधिक प्रभावित होता है। पूर्ण मिर्गी में मस्तिष्क के दोनों भाग प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार अनेक रोगियों में इसके लक्षण भी भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रायः रोगी व्यक्ति कुछ समय के लिए चेतना खो देता है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार सूअर की आंतों में मिलने वाले फीताकृमि के संक्रमण से भी मिर्गी की संभावना रहती है। इस कृमि का सिस्ट यदि किसी प्रकार मस्तिष्क में पहुँच जाए तो उसके क्रियाकलापों को प्रभावित कर सकता है, जिससे मिर्गी की आशंका बढ़ जाती है।दौरों की अवधि कुछ सेकेंड से लेकर दो-तीन मिनट तक होती है। और यदि यह दौरे लंबी अवधि तक के हों तो चिकित्सक से तत्काल परामर्श लेना चाहिये। कई मामलों में मिरगी की स्थिति पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अलग होती है। दोनों की स्थिति में अंतर का प्रमुख कारण महिलाओं और पुरुषों में शारीरिक और सामाजिक अंतर का होना होता है। जब रोगी को दौरे आ रहे हों, या बेहोश पडा हो, झटके आ रहे हों तो उसे साफ, नरम जगह पर करवट से लिटाकर सिर के नीचे तकिया लगाकर कपडे ढीले करके उसके मुंह में जमा लार या थूक को साफ रुमाल से पोंछ देना चाहिये। दौरे का काल और अंतराल समय ध्यान रखना चाहिये। ये दौरे दिखने में भले ही भयानक होते हों, पर असल में खतरनाक नहीं होते। दौरे के समय इसके अलावा कुछ और नहीं करना होता है, व दौरा अपने आप कुछ मिनटों में समाप्त हो जाता है। उसमें जितना समय लगना है, वह लगेगा ही। ये ध्यान-योग्य है कि रोगी को जूते या प्याज नहीं सुंघाना चाहिये। ये गन्दे अंधविश्वास हैं व बदबू व कीटाणु फैलाते हैं। इस समय हाथ पांव नहीं दबाने चाहिये न ही हथेली व पंजे की मालिश करें क्योंकि दबाने से दौरा नहीं रुकता बल्कि चोट व रगड़ लगने का डर रहता है। रोगी के मुंह में कुछ नहीं फंसाना चाहिये। यदि दांतों के बीच जीभ फंसी हो तो उसे अंगुली से अंदर कर दें अन्यथा दांतों के बीच कटने का डर रहता है।
मिरगी के रोगी सामान्य खाना खा सकते हैं अतएव उन्हें भोजन का परहेज नहीं रखना चाहिये। इस अवस्था में व्रत, उपवास, रोजे आदि रखने से कुछ रोगियों में दौरे बड़ सकते हैं अतः इनसे बचना चाहिये। यदि अन्न न लेना हो तो दूध या फलाहार द्वारा पेट आवश्यक रूप से भरा रखना चाहिये।
वस्तुत: अपस्मार या मिर्गी तंत्रिकातंत्रीय विकार (neurological disorder) के कारण होता है। ये बीमारी मस्तिष्क के विकार के कारण होती है। यानि मिर्गी का दौरा पड़ने पर शरीर अकड़ जाता है जिसको अंग्रेजी में सीज़र डिसॉर्डर ( seizure disorder) भी कहते हैं।वैसे तो इस बीमारी का पता 3000 साल पहले लग चुका था लेकिन इस बीमारी को लेकर लोगों के मन में जो गलत धारणाएं हैं उसके कारण इसका सही तरह से इलाज की बात करने की बात लोग सोचते बहुत कम हैं। ग्रामीण इलाकों में लोग इस बीमारी को भूत-प्रेत का साया समझते हैं और उसका सही तरह से इलाज करवाने के जगह पर झाड़-फूंक करवाने ले जाते हैं। यहां कि तक लोग मिर्गी के मरीज़ को पागल ही समझ लेते हैं। जिन महिलाओं को मिर्गी का रोग होता है उनकी शादी होनी मुश्किल होती है क्योंकि लोग मानते हैं कि मिर्गी के मरीज़ को बच्चा नहीं हो सकता है या बच्चे भी माँ के कारण इस बीमारी का शिकार हो जाते हैं। मिर्गी का मरीज़ पागल नहीं होता है वह आम लोगों के तरह ही होता है। उसकी शारीरिक प्रक्रिया भी सामान्य होती है। मिर्गी का मरीज़ शादी करने के योग्य होता/होती है और वे बच्चे को जन्म देने की भी पूर्ण क्षमता रखते हैं सिर्फ उनको डॉक्टर के तत्वाधान में रहना पड़ता है।
कारण--- मस्तिष्क का काम न्यूरॉन्स के सही तरह से सिग्नल देने पर निर्भर करता है। लेकिन जब इस काम में बाधा उत्पन्न होने लगता है तब मस्तिष्क के काम में प्रॉबल्म आना शुरू हो जाता है। इसके कारण मिर्गी के मरीज़ को जब दौरा पड़ता है तब उसका शरीर अकड़ जाता है, बेहोश हो जाते हैं, कुछ वक्त के लिए शरीर के विशेष अंग निष्क्रिय हो जाता है आदि। वैसे तो इसके रोग के होने के सही कारण के बारे में बताना कुछ मुश्किल है। कुछ कारणों के मस्तिष्क पर पड़ सकता है असर, जैसे-
• सिर पर किसी प्रकार का चोट लगने के कारण।
• जन्म के समय मस्तिष्क में पूर्ण रूप से ऑक्सिजन का आवागमन न होने पर।
• ब्रेन ट्यूमर।
• दिमागी बुखार (meningitis) और इन्सेफेलाइटिस (encephalitis) के इंफेक्शन से मस्तिष्क पर पड़ता है प्रभाव।
• ब्रेन स्ट्रोक होने पर ब्लड वेसल्स को क्षति पहुँचती है।
• न्यूरोलॉजिकल डिज़ीज जैसे अल्जाइमर रोग।
• जेनेटिक कंडिशन।
• कार्बन मोनोऑक्साइड के विषाक्तता के कारण भी मिर्गी का रोग होता है।
• ड्रग एडिक्शन और एन्टीडिप्रेसेन्ट के ज्यादा इस्तेमाल होने पर भी मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ सकता है।
डॉ. अर्जुन श्रीवास्तव, न्यूरोसर्जन और स्पाइन ट्रस्ट इंडिया के ट्रस्टी के अनुसार बच्चों में लगभग तीस प्रतिशत मामलों में पांच वर्षों से पहले इस बीमारी के होने की संभावना नजर आती है।
लक्षण---वैसे तो मिर्गी का दौरा पड़ने पर बहुत तरह के शारीरिक लक्षण नजर आते हैं। मिर्गी का दौरा पड़ने पर मरीज़ के अलग-अलग लक्षण हो सकते हैं। लेकिन कुछ आम लक्षण मिर्गी के दौरा पड़ने पर नजर आते हैं, वे हैं-
• अचानक हाथ,पैर और चेहरे के मांसपेशियों में खिंचाव उत्पन्न होने लगता है।
• सर और आंख की पुतलियों में लगातार मूवमेंट होने लगता है।
• मरीज़ या तो पूर्ण रूप से बेहोश हो जाता है या आंशिक रूप से मुर्छित होता है।
• पेट में गड़बड़ी।
• जीभ काटने और असंयम की प्रवृत्ति।
• मिर्गी के दौरे के बाद मरीज़ उलझन में होता है, नींद से बोझिल और थका हुआ महसूस करता है।
विज्ञान के अनुसार मिर्गी रोग का निर्धारण मरीज़ के मेडिकल हिस्ट्री को देखकर ही पता लगाया जा सकता है। मरीज़ के घर के लोग या दोस्त परिजन मरीज़ के दौरे के समय ही हालत और शारीरिक प्रक्रिया में बदलाव के बारे में सही तरह से बयान कर सकते हैं। डॉक्टर मरीज़ के पल्स रेट और ब्लड प्रेशर को चेक करने के साथ-साथ न्यूरोलॉजिकल साइन को भी एक्जामीन करते हैं। इसके अलावा डॉक्टर इस रोग का पता ई.ई.जी (electroencephalogram (EEG), सी.टी.स्कैन या एम.आर.आई (CT scan or MRI) और पेट (positron emission tomography (PET) scan) के द्वारा लगाते हैं।
उपचार-----मिर्गी के रोग का एक ही उपचार हो सकता है, वह है दौरे के समय सीज़र को कंट्रोल में करना। इसके लिए एन्टी एपिलेप्टिक ड्रग (anti-epileptic drug (AED) थेरपी और सर्जरी होती है। र जिन लोगों पर ये ड्रग काम नहीं करता है उन्हें सर्जरी करने की सलाह दी जाती है।
खानपान- रिसर्च के अनुसार मिर्गी के रोगी को ज्यादा फैट वाला और कम कार्बोहाइड्रेड वाला डायट लेना चाहिए। इससे सीज़र पड़ने के अंतराल में कमी आती है।
रोकथाम---मिर्गी रोग होने का कारण सही तरह से पता नहीं होने के वजह से रोकथाम का भी पता सही तरह से चल नहीं पाया है। प्रेगनेंसी के दौरान सही तरह से देखभाल करने पर शिशुओं में होने की संभावना को कम किया जा सकता है। जेनेटिक स्क्रीनिंग होने से माँ को बच्चे में इसके होने का पता चल जाता है। सिर में चोट लगने की संभावना को कम करने से कुछ हद तक इस रोग के होने की खतरे को कम किया जा सकता है।
मिर्गी का दौरा बार-बार पड़ने की संभावना को कम करने के लिए-
• डॉक्टर द्वारा दिए गए दवा का सही तरह सेवन करनाः
• पर्याप्त नींद और एक ही समय में सोने की आदत का पालन करना।
• तनाव से दूर रहें।
• संतुलित आहार।
• नियमित रूप से चेक-अप करवाते रहें।
मिर्गी का प्राथमिक उपचार  -
प्राकृतिक उपचार की दृष्टि से देखा जाए तो मिर्गी का दौरा तब पड़ता है जब शरीर में खान पान की वजह से विषैला पदार्थ इक्कठा हो जाता है. अगर आपके सामने किसी व्यक्ति को दौरा पड़ जाए तो सबसे पहले उसके आसपास की हवा को ना रुकने दें, फिर उसे दाई या फिर बायीं करवट में लिटा दें, इसके बाद उसके मुहँ पर पानी के छीटें मारते रहें, किसी तरह उसका मुहँ खोलें और उसके दांतों के नीचे कोई कपड़ा या कुछ रख दें, इससे रोगी की जीभ काटने से बचती है. ध्यान रहें कि ना तो उसे कुछ खिलाने का प्रयास करें और ना ही कुछ पिलाने का.
मिर्गी के रोगी के लिए उपचार ( Home Treatment for Epilepsy Attack ) :
·     तुलसी और सीताफल ( Basil and Pumpkin ) : मिर्गी का दौरा आने पर रोगी की नाक में तुलसी के रस और सेंधा नमक के मिश्रण को टपकायें. अगर आसपास तुलसी का पौधा ना हो तो उसकी नाक में सीताफल के पत्तों का रस डालें.
·     करौंदे ( Gooseberry ) : मिर्गी से पीड़ित रोगियों को समय समय पर करौंदे के पत्तों से बनी चटनी का सेवन करना चाहियें. अगर वे रोग इसे खा सके तो ये उनके लिए अधिक बेहतर रहेगा.
·     सफ़ेद प्याज ( White Onion ) : साथ ही रोगियों को रोजाना 1 चम्मच सफ़ेद प्याज का रस पानी के साथ पीना चाहियेंइससे उनको दौरे आने बंद हो जाते है.
·     शहतूत ( Mulberry ) : रोगी को होश में आने के बाद शहतूत और सेब का रस निकालकर उसमें थोड़ी हिंग मिलाकर खिलानी चाहियें ताकि दौरे का प्रभाव शीघ्र खत्म हो सके और वो जल्द ही सामान्य हो जाए.
·     सुंघायें ( Smell These ) : रोगी को पानी में पीसी हुई राईकपूरतुलसी रसलहसुन रसआक की जड़ की छाल का रसनीम्बू रस व हिंग में से किसी भी चीज को सुंघाया जा सकता है.
 व्यायाम : नित्य प्रतिदिन घुमने और व्यायाम करने से आपके मन को शान्ति मिलेगी और आपका शरीर भी स्वस्थ व रोगमुक्त रहेगा. आसनों में शीर्षासन और सर्वांगासन आपके लिए सर्वोताम है किन्तु ध्यान रहे कि आसन खाली पेट करने है. हल्के व्यायाम के बाद आपको बाथटब में नहाना चाहियें. नहाने के बाद ढीले और आरामदेह कपड़ों पहने ताकि शरीर में हवा आती जाती रहे और आपको घुटन महसूस ना हो
 दिनचर्या : कहीं भी अकेले ना जाएँ,सीढ़ी भी ना चढ़ें और चढ़ें तो किसी को साथ लेकर चढ़ें,आग और पानी से दूर रहेंसाइकिल या गाडी ना चलायें,गुस्सा या झगडा ना करेंअधिक ऊँचे स्थान पर ना जाएँअगर मल या मूत्र त्याग के लिए जाना है तो तुरंत चले जाएँ इन्हें रोकने की कोशिश ना करेंकरवट लेकर सोयेंसोते वक़्त ध्यान रखें कि आपका सिर उत्तर दिशा में हो.

Wednesday, 6 September 2017

किडनी रोग - लक्षण - आहार

हमारे शरीर के हानिकारक पदार्थो को शरीर से छानकर बाहर निकलने का काम किडनी का ही होता है! किडनी हमारे शरीर के लिए रक्त शोधक का काम करती है, हम जो कुछ भी खाते है उसमे से विषैले तत्वों और नुकसान पहुचने वाले पदार्थो को यूरिनरी सिस्टम (मूत्राशय) के जरिये बाहर निकाल देती है जिससे के शरीर ठीक तरीके से काम कर सके और जहरीले तत्व कोई हानि नहीं पंहुचा सके!
हमें देश में दिन प्रति दिन ये बीमारी विकराल रूप से बड रही हैऔर इस बीमारी की वजह से लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते है! दुख की बात तो ये है के इस बीमारी का बहुत देर से पता चलता  है जब तक किडनी 60-65% तक ख़राब हो चुकी होती है! इस रोग में बहूत सावधानी बरतनी पड़ती है!

किडनी रोग के लक्षण क्या है ?

इस रोग का पता वैसे तो जल्दी नहीं लग पता लेकिन अगर सावधानी रखी जाए और लक्षणों पर गौर किया जाए तो निम्न लक्षण के जरिये इसका पता चलता है-
Although It is hard to know kidney disease in early stage, but if we keep awareness and look on its symptoms then we can know about this disease.
  • हाथ पैर व आँखों के नीचे का भाग में सुजन आ जाती है!- Swelling on hand and under eye.
  • रोगी को भूख नहीं लगती है और शरीर में खून की कमी होने लगती है!- Patient will not feel hungry and he or she may suffer with anemia disease.
  • शरीर में खुजली होना, बार बार मूत्र आना, कमजोरी महसूस होती है!- patient feels itching and feels to pass urine many times.
  • शरीर पीला पड़ जाता है व उलटी होने के साथ जी मचलाता है!
  • सांसे फूलने लगती है और हाजमा भी खराब रहता है! Patient feels constipation and his digestion system do not works well.

किडनी के रोग को 4 भागो (4 stages )में बाटा गया है ! 

इस रोज के चरणों को पहचानने के लिए इसे विभिन्न भागो में बांटा गया है, जिसके जरिये रोगी की स्थिति का पता चलता है और उसी के हिसाब से उसका इलाज सही प्रकार से किया जा सकता है!-

किडनी रोग का पहला चरण (Kidney Disease First Stage)

नार्मल क्रीयेटीनिन, एक पुरुष के 1 डेसिलीटर खून में .6-1.2 मिलीग्राम और एक महिला के खून में 0.5-1.1 मिलीग्राम EGFR (Estimated Glomerular Filtration rate) सामान्यत: ९० या उससे ज्यादा होता है!

दूसरा चरण ( Second Stage):

इस stage में EGFR कम हो जाता है जो 90% - 60% तक हो जाता है, लेकिन फिर भी क्रीयेटीनिन सामान्य ही रहता है! लेकिन मूत्र में प्रोटीन ज्यादा आने लगता है!

तीसरा चरण (Third Stage):

इस stage में EGFR और घट जाता है जो 60-30 के बीच हो जाता है और क्रीयेटीनिन बढ़ जाता है! इस चरण में ही किडनी रोग के लक्षण दिखाई पड़ने लगते है, पेशाब में यूरिया बढ़ने से खुजली होने लगती है, मरीज एनेमिया से भी ग्रसित हो सकता है!

चौथा चरण (Forth Stage): 

इस चरण में EGFR 30-50 तक आ जाता है और थोरी सी भी लापरवाही खतरनाक हो सकती है इसमे क्रीयेटीनिन भी 2-4 के बीच हो जाता है! अगर सावधानी नहीं बरती गई तो डायलेसिस या फिर ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है!

पाचवां चरण (Fifth Stage):

इसमे EGFR 15 से नीचे (कम ) हो जाता है तथा क्रीयेटीनिन 4-5 या अधिक होता है  इसमे मरीज को डायलेसिस या ट्रांसप्लांट तक करानी पड़ जाती है!

किडनी रोग का इलाज क्या है? Kidney Disease Treatment

इसके इलाज में रोगी को रीनल रिप्लेसमेंट की जरूरत पड़ती है, वैसे तो पूर्णता: इलाज किडनी ट्रांसप्लांट के द्वारा ही हो सकता है! परन्तु जब तक मरीज का ट्रांसप्लांट नहीं हो जाता है तब तक डायलेसिस के जरिये ही काम लिया जा सकता है! वैसे तो डॉक्टर्स का कहना है के खाने पिने में लापरवाही ना की जाए और खाना ठीक प्रकार से लिया जाए तो डायलेसिस से भी काम चल जाता है! इसमे रोगी को अपना खाना डाइट चार्ट के हिसाब से लेना चाहिए और रोजाना बिना किसी प्रकार के लापरवाही किये नियमित तरीके से रूटीन फॉलो करते हुए डायलेसिस समय समय पर करवाता रहे तो वो काफी लम्बे समय तक (कई सालो तक) जीवित रह सकता है!

किडनी ट्रांसप्लांट स्थाई इलाज व उपाय है (Kidney Transplant is Permanent Solution):

डायलेसिस तो अस्थाई इलाज है इस बीमारी का पूर्णता: ठीक होने ले लिए किडनी ट्रांसप्लांट जरूरी होता है इस रोग में! इसके लिए मरीज को किडनी प्रदान करने वाले किसी डोंनर (Donner) की जरूरत होती है जिसका ब्लड ग्रुप मरीज के साथ मिलना जरूरी होता है! इसमे ट्रांसप्लांट के वक़्त दोनों व्यक्तियों का (मरीज और किडनी डोंनर) के शरीर से टिश्यू लेकर उसका मिलान किया जाता है!
इस बीच कई दुसरे जरूरी टेस्ट भी किये जाते है! जिससे ये पता चलता है के ट्रांसप्लांट के लिए डोंनर और मरीज दोनों के लिए सब ठीक है के नहीं! ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया के बाद किडनी प्रदान करने वाला यक्ति तो केवल कुछ दिन में ही अपनी जिंदगी सामान्य तरीके से जीना शुरू कर देता है, लेकिन रोगी को फिर भी कुछ समय तक सावधानी की जरूरत पड़ती है!

किडनी रोगों में आहार----- 

किडनी रोगों में प्रोटीन, सोडियम और पोटैशियम की मात्रा कम लेनी चाहिए. ये तत्व अधिक मात्रा में लेने पर हानिकारक हैं, जबकि शरीर के लिए जरूरी भी हैं. इस कारण इन्हें पूरी तरह से लेना बंद भी नहीं किया जा सकता है. अत: इस रोग में डायट के मामले में काफी परहेज रखना पड़ता है ! किडनी शरीर से अनावश्यक और जहरीले पदार्थों को बाहर निकाल कर डिटॉक्सीफिकेशन का कार्य करता है. किडनी की विभिन्न बीमारियों और विभिन्न अवस्थाओं में खान-पान का परहेज अलग-अलग होता है. यह कई बातों पर निर्भर करता है. खान-पान में परहेज करके किडनी के कई रोगों से बचा जा सकता है. इसके परहेज में मुख्यत: प्रोटीन, पोटैशियम, सोडियम, फॉस्फोरस व तरल पदार्थों की मात्रा आती है. सामान्यत: जानकारी के अभाव में मरीज अनावश्यक परहेज करने लगते हैं, जिससे भोजन स्वादहीन, रंगहीन और पौष्टिकता विहीन हो जाता है. लगातार ऐसा भोजन करने से मरीज शिकायत करने लगते हैं कि धीरे-धीरे जीभ का स्वाद जा रहा है.
 
ये सावधानियां बरतें- 
प्रोटीन : प्रोटीन की मात्रा संयमित की जाती है. ज्यादा प्रोटीन बीमारी बढ़ा सकता है. चूंकि प्रोटीन कोशिकाओं और शारीरिक क्रियाकलापों के लिए जरूरी है. अत: इसे बंद करने के बजाय कम किया जाता है. सामान्यत: किडनी रोग में 0.5-0.8 मिग्रा/ किलोग्राम रोज के हिसाब से प्रोटीन युक्त फूड दिया जाता है.
 
सोडियम : एक चम्मच नमक दिन भर के लिए काफी है. प्रोस्सड फूड, जंक फूड आदि में ज्यादा मात्रा में सोडियम और प्रिजर्वेटिव होते हैं. अत: इनसे बचना चाहिए. दो ग्राम नमक में 400 मिग्रा सोडियम होता है.
 
पोटैशियम : गुरदे की कुछ बीमारियों में पोटैशियम की मात्रा बढ़ने लगती है, जो खतरनाक है. भोजन में पोटैशियम की मात्रा का निर्धारण बीमारी के स्तर को देख कर किया जाता है.
 
फॉस्फोरस : ज्यादा मात्रा में फॉस्फोरस किडनी फेल्योर के साथ-साथ हड्डी रोग या हृदय रोग के लिए भी जिम्मेदार हो सकता है. इसकी मात्रा भी संतुलित होनी चाहिए.
 
पेय-पदार्थ : पानी तभी पीएं जब ज्यादा प्यास लगी हो. 500-700 मिली पानी रोज अन्य पेय पदार्थों के अलावा दिया जाता है. नमक ज्यादा खाने से प्यास भी ज्यादा लगती है. ज्यादा प्यास लगने पर मुंह पोंछने से लाभ होता है.
 
भोजन में स्वाद बढ़ाने के लिए नीबू, शिमला मिर्च, लहसुन, प्याज का प्रयोग करें. इनमें पोटैशियम कम और विटामिन सी, ए , बी 6, फॉलिक एसिड, फाइबर इत्यादि अच्छी मात्रा में होता है, जो लाभदायक है.
 
बाजरा, ज्वार, मकई, चना, चना दाल, मटर, खेसारी दाल, लाल चना, धनिया पत्ती, अरबी, शक्करकंद, मूली, बैगन, कटहल, धनिया, जीरा, गाय व बकरी का दूध, फूलगोभी, चुकंदर, कटहल मीटर, शरबत, आइसक्रीम, मिल्क शेक, आचार, पापड़, चटनी, बेकिंग पाउडर इत्यादि. स्किम्ड मिल्क, छाछ, कद्दू, खीरा, भिंडी, हरा पपीता, झिंगनी, कुम्हरा, परवल, करेला, आलू, गाजर, सेब, अंगूर, पपीता (हल्का उबाल कर पानी हटा देने से सोडियम-पोटािशयम की मात्रा में कमी आ जाती है) अत: इन्हें किडनी रोग में दे सकते हैं

Tuesday, 5 September 2017

वात रोग – आयुर्वेद

आयुर्वेदिक ग्रन्थों के अनुसार वात 80 प्रकार का होता है एवं इसी से सामंजस्य रखता हुआ एक और रोग है जिसे बाय या वायु कहते हैं। यह 84 प्रकार का होता है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि जब वात एवं वायु के इतने प्रकार हैं, तो, यह कैसे पता लगाया जाय कि यह वात रोग है या बाय एवं यह किस प्रकार का है ? यह कठिन समस्या है और यही कारण है कि इस रोग की उपयुक्त चिकित्सा नहीं हो पाती है, जिससे इस रोग से पीड़ित 50 प्रतिशत व्यक्ति सदैव परेशान रहते हैं। उन्हें कुछ दिन के लिए इस रोग में राहत तो जरूर मिलती है, परन्तु पूर्णतया सही नहीं हो पाता है। इस रोग की चिकित्सा एलोपैथी के माध्यम से पूर्णतया सम्भव नहीं है, जबकि आयुर्वेद के माध्यम से इसे आज कल 90 प्रतिशत तक जरूर सही किया जा सकता है,
वात रोग लक्षण एवं परेशानी- इस रोग के कारण शरीर के सभी छोटे-बडे़ जोडो़ं व मांसपेशियों में दर्द व सूजन हो जाती है। गठिया में शरीर के एकाध जोड़ में प्रचण्ड पीड़ा के साथ लालिमायुक्त सूजन एवं बुखार तक आ जाता है। यह रोग शराब व मांस प्रेमियों को सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा जल्दी पकड़ता है। यह धीरे-धीरे शरीर के सभी जोड़ों तक पहुँचता है। संधिवात उम्र बढ़ने के साथ मुख्यतः घुटनों एवं पैरों के मुख्य जोड़ों को क्रमशः अपनी गिरफ्त में लेता हैं।
वात रोग की शुरूआत धीरे-धीरे होती है। शुरू में सुबह उठने पर हाथ पैरों के जोडा़ें में कड़ापन महसूस होता है और अंगुलियाँ चलाने में परेशानी होती है। फिर इनमें सूजन व दर्द होने लगता है और अंग-अंग दर्द से ऐंठने लगता है जिससे शरीर में थकावट व कमजोरी महसूस होती है। साथ ही रोगी चिड़चिड़ा हो जाता है। इस रोग की वजह सेे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम पड़ जाती है। इसी के साथ छाती में इन्फेक्शन, खांसी, बुखार तथा अन्य समस्यायें उत्पन्न हो जाती है। साथ ही चलना फिरना रुक जाता है।
इन सबसे खतरनाक कुलंग वात होता है। यह रोग कुल्हे, जंघा प्रदेश एवं समस्त कमर को पकड़ता है एवं रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करता है। इस रोग में तीव्र चिलकन (फाटन) जैसा तीव्र दर्द होता है और रोगी बेचैन हो जाता है, यहाँ तक कि इसमें मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। यह रोग की सबसे खतरनाक स्टेज होती हैै। इस का रोगी दिन-रात दर्द से तड़पता रहता है और कुछ समय पश्चात् चलने-फिरने के काबिल भी नहीं रह जाता है। वह पूर्णतया बिस्तर पकड़ लेता है और चिड़चिड़ा हो जाता है।
लक्षण --- हाइपरयूरीसेमिया, वात रोग का मूल कारण होता है। यह कई कारणों से हो सकता है, जिनमें आहार, आनुवंशिक गड़बड़ी, या यूरेट, यूरिक एसिड के लवणों का कम उत्सर्जन शामिल हैं। लगभग 90% मामलों में हाइपरयूरीसेमिया का मुख्य कारण गुर्दों में यूरिक एसिड का कम उत्सर्जन होता है, जब कि ज़रुरत से अधिक उत्पादन 10% के कम मामलों में कारण होता है। हाइपरयूरीसेमिया वाले लगभग 10% लोगों में उनके जीवन काल में किसी न किसी बिंदु पर वात रोग विकसित हो जाता है। लेकिन, हाइपरयूरीसेमिया के स्तर के आधार पर, जोखिम अलग-अलग हो सकता है। जब स्तर 415 और 530 माइक्रोमोल/लीटर (7 और 8.9 मिलीग्राम/डेसीलीटर) के बीच हों, तो जोखिम 0.5% प्रति वर्ष होता है, जब कि 535 माइक्रोमोल/लीटर (9 मिलीग्राम/डेसीलीटर) से ऊपर के स्तरों वाले लोगों में यह जोखिम 4.5% प्रति वर्ष होता है

जीवन शैली---- लगभग 12% वात रोग का कारण आहार से संबंधित होता है और इसमें अल्कोहल, फ्रक्टोज-से मीठे किये गये पेय, मीट और समुद्री भोजन के उपभोग के साथ मज़बूत संबंध होता है। अन्य ट्रिगरों में शारीरिक बड़ी चोट और सर्जरी शामिल हैं। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि आहार से संबंधित कारक जिन्हें कभी संबंधित समझा जाता था, वास्तव में संबंधित नहीं हैं, जिनमें प्यूरीन-से भरपूर सब्जियों (जैसे, सेम, मटर, मसूर और पालक) और कुल प्रोटीन का सेवन शामिल है। कॉफी, विटामिन Cऔर डेयरी उत्पादों का सेवन और साथ ही शारीरिक तंदरुस्ती, जोखिम को कम करते प्रतीत होते हैं। माना जाता है कि यह आंशिक रूप से इंसुलिन प्रतिरोध को कम करने में उनके प्रभाव के कारण है !

वात रोग प्यूरीन चयापचय का एक विकार है, और उस समय होता है जब इसका अंतिम मेटाबोलाइट, यूरिक एसिड, मोनोसोडियम यूरेट के रूप में क्रिस्टलीकृत हो कर जोड़ों में, स्नायुओं पर और आसपास के ऊतकों में नीचे बैठ जाता है। उसके बाद यह क्रिस्टल एक स्थानीय प्रतिरक्षा-कीमध्यस्थता वाली सूजन वाली प्रतिक्रिया शुरू करता है, जिसमें सूजन प्रवाह के मुख्य प्रोटीनों में से एक इंटरल्यूकिन 1β होता है। मनुष्यों में विकास के साथ-साथ यूरीकेस, जो कि यूरिक एसिड को तोड़ता है और प्राइमेट्स की कमी ने इस समस्या को आम बना दिया है।
इस बात को अच्छी तरह से समझा नहीं गया है कि क्या चीज़ यूरिक एसिड का अवक्षेपण शुरू करती है। जब कि यह सामान्य स्तरों पर क्रिस्टलों में परिवर्तित हो सकता है, स्तरों के बढ़ने पर ऐसा होने की अधिक संभावना होती है। गठिया का एक तीव्र प्रकरण शुरू करने में महत्वपूर्ण माने जाते अन्य कारकों में ठंडे तापमान, यूरिक एसिड के स्तरों में तेजी से बदलाव, एसिडोसिस, जोड़ जलयोजन और बाह्य मैट्रिक्स प्रोटीन, जैसे कि प्रोटियोग्लाईकैन्स, कोलेजन औरचोन्ड्रोयटिन सल्फेट शामिल है। कम तापमानों पर क्रिस्टलों के अवक्षेपण की बढ़ी हुई क्रिया आंशिक रूप से इस बात की व्याख्या करती है कि पैरों के जोड़ सबसे अधिक क्यों प्रभावित होते हैं। यूरिक एसिड में तेजी से बदलाव, कई कारणों से हो सकते हैं जिनमे आघात, शल्य चिकित्सा, कीमोथेरेपी, मूत्रवर्धक दवाइयां और एलोप्यूरिनॉल को रोकना या शुरू करना शामिल हैं।उच्च रक्तचाप के लिए अन्य दवाओं की तुलना में कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स और लोसार्टन को वात रोग के कम जोखिम के साथ जोड़ा जाता है !