Sunday, 17 September 2017

टॉन्सिलाइटिस के लक्षण-उपचार

अक्सर बड़ी बीमारियों के डर से हम छोटी बीमारियों को नजरअंदाज करदेते हैं।  बड़ी बीमारियां न हों, इसकेलिए तो हम अपने खानपान का पूरा ध्यान रखते हैं, लेकिन छोटी-  सी दिखनेवाली बीमारी को बढ़ा लेते हैं।  ऐसी ही एक आम- सी लगने वाली बीमारी है टॉन्सिलाइटस।  इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है।  यह बादाम के आकार के ऐसे अंग हैं, जो हमारे मुंह के अंदर गले के दोनों तरफ होते हैं। टॉन्सिल्स हमारे शरीर के सिक्युरिटी गार्ड के रूप में काम करते हैं और बाहरी इन्फेक्शन सेहमारी हिफाजत करते हैं। ये बाहर से आने वाली किसी भी बीमारी को हमारे शरीर मेंदाखिल होने से रोकते हैं।  अगर हमारे टॉन्सिल मजबूत होंगे तो वे बीमारी को शरीर में जानेसे तो रोकेंगे ही, साथ ही खुद भी उस बीमारी या इन्फेक्शन से बच जाएंगे।अगर टॉन्सिल्सकमजोर होंगे तो वे बीमारी को शरीर में जाने से तो रोक लेंगे लेकिन खुद बीमार हो जाएंगेयानी उनमें सूजन आ जाएंगी, वे लाल हो जाएंगे, उनमें दर्द होगा जिससे बुखार हो जाएगा। इसके अलावा कुछ भी खाने-पीने या निगलने में दिक्कत होगी। अक्सर लोगों की शिकायत होती है कि कुछ भी ठंडा पीते ही उनके गले में दर्द शुरू हो जाता है। उसके बाद खाना-पीना मुश्किल हो जाता है। ऐसा टॉन्सिलाइटिस की वजह से होता है। टॉन्सिलाइटिस होने पर टॉन्सिल्स में यानी गले के दोनों ओर सूजन आ जाती है। शुरुआत में मुंह के अंदर गले के दोंनो ओर दर्द महसूस होता है, बार बार बुखार भी होता है। टॉन्सिल्स सामान्य से ज्यादा लाल हो जाते हैं। टॉन्सिल्स की परेशानी बच्चों में ज्यादा देखने को मिलती है। इसलिए जरूरी है कि सर्दियों में बच्चों का खास ख्याल रखा जाए।टॉन्सिल दो तरह के इन्फेक्शन के कारण होता है। वायरल इंफेक्शन के कारण हुए टॉन्सिल्स में खास इलाज की जरूरत नहीं होती। बैक्टीरियल इन्फेक्शन से हुए टॉन्सिल को दवाई के सेवन से ठीक किया जा सकता है। आम तौर पर ये एक हफ्ते में ठीक हो जाता है। लेकिन इंफेक्शन ज्यादा हो तो इसे ठीक होने में अधिक समय लगता है।
कुछ लोगों के साथ ऐसा भी होता है कि दवाईयां खाने के बाद कुछ दिनों के लिए तो टॉन्सिलाइटिस ठीक हो जाता है लेकिन वो पूरी तरह ठीक नहीं होता है। उन्हें बार-बार टॉन्सिलाइटिस होता है और सांस लेने में भी तकलीफ होती है। ऐसे में ऑपरेशन के जरिए टॉन्सिल्स को निकालने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा गले में हल्का दर्द होते हुए ठंडी या खट्टी चीजों के सेवन से भी टॉन्सिल की परेशानी हो सकती है। 
टॉन्सिलाइटिस होने पर गले में दर्द, खाना निगलने में तकलीफ, टॉन्सिल्स का सूज जाना और दर्द होना, बुखार आना, सिर में दर्द होना, जीभ पर सफेद परत का जम जाती है। 
डॉक्टर कहते हैं कि कई बार टॉसिलाइटिस के रोगी दवाईयां लेना शुरू तो करते हैं पर थोड़ा आराम मिलते ही दवाईयां बंद कर देते हैं। इससे फिर से तकलीफ बढ़ने का ख़तरा बना रहता है। टॉसिलाइटिस के रोगियों को तब तक दवाईयां लेनी चाहिए जब तक पूरा कोर्स न ख़त्म हो जाए। कई लोगों के साथ ऐसा होता है कि दवा लेने पर टॉन्सिलाइटिस कुछ दिनों के लिए दब तो जाता है पर वो दोबारा उभर जाता है। उनके साथ ऐसा बार-बार होता है। ऐसे में टॉन्सिलाइटिस का ऑपरेशन कराना पड़ता है !

त्वचा पर चर्बी की गांठ या लाइपोमा

अक्सर हमारे शरीर के किसी भी भाग में गांठे बन जाती हैं. जिन्हें सामान्य भाषा में गठान या रसौली कहा जाता हैं. किसी भी गांठ की शुरुआत एक बेहद ही छोटे से दाने से होती हैं. लेकिन जैसे ही ये बड़ी होती जाती हैं. इन गाठों की वजह से ही गंभीर बीमारियां भी हो जाती हैं. ये गांठे टी.बी से लेकर कैंसर की बीमारी की शुरुआत के चिन्ह होती हैं. अगर किसी व्यक्ति के शरीर के किसी भाग में कोई गाँठ हो गई हैं. जिसक कारण उस गाँठ से आंतरिक या बाह्य रक्तस्राव हो रहा हो. तो हो सकता हैं कि यह कैंसर की बीमारी के शुरुआती लक्षण हो. लेकिन इससे यह भी सुनिश्चित नहीं हो जाता कि ये कैंसर के रोग को उत्पन्न करने वाली गांठ हैं. कुछ गाँठ साधारण बिमारी उत्पन्न होने के कारण भी हो जाती हैं. किन्तु हमें किसी भी प्रकार की गांठों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए तथा उसका तुरंत ही उपचार करवाना चाहिए.

लाइपोमा क्या होता है?

लाइपोमा चर्बी की मुलायम गांठ होती है जो त्वचा के नीचे पायी जाती है। ये ज़्यादातर छोटी और पीड़ाहीन होती है और इससे स्वास्थ को कोई हानी नहीं पहुचती है। ये काफी आम परेशानी है और 100 में से 1 इंसान में पायी जाती है।

कारण:

इसका कोई निश्चित कारण नहीं होता है।
अगर परिवार में किसी को यह समस्या है तो और लोगों को भी हो सकती है।
कभी कभी चोट लगने के बाद भी लाइपोमा बन जाता है।

लक्षण:

गांठ इस प्रकार की हो सकती है:
  • त्वचा पर उठी हुई गांठ
  • ये एक या उससे ज़्यादा भी हो सकती है
  • छूने में मुलायम होती है और त्वचा के अंदर इधर उधर घूमती है
  • ये ज़्यादातर गर्दन, कंधों, हाथों और कमर पर होती है लेकिन ये शरीर के किसी भी हिस्से पर हो सकती है
  • गांठ के इलावा और कोई लक्षण नहीं होता। लेकिन कभी कभी दबाव डालने पर दर्द हो सकता है।
  • निदान:------
  • डॉक्टर गांठ की जांच करके बता देते हैं की यह लाइपोमा है।
    कभी कभी कैंसर की शंका दूर करने के लिए बायोप्सी कराई जाती है।

    उपचार:

    वैसे तो लाइपोमा को किसी उपचार की ज़रूरत नहीं होती है। लेकिन कभी कभी गांठ ऐसे हिस्से में हो जाती है की उसका इलाज करना पड़ता है जैसे:
    • सर्जरी: ऑपरेशन द्वारा गांठ को निकाला जाता है। ये सबसे आम उपचार है।
    • लिपोसक्षण: इसमें सुई के जरिये गांठ में से चर्बी निकाल दी जाती है।
    • स्कूइज़ टेक्निक: गांठ पर छोटा सा चीरा लगाके, गांठ को दबाया जाता है।

    रोकथाम:

    क्योंकि लाइपोमा का कोई स्पष्ट कारण पता नहीं है इसलिए इससे बचने का कोई तरीका नहीं है।

    जटिलताएँ:

    कभी कभी ये कैंसर में बदल सकता है। अगर गांठ किसी तंत्रिका के पास हो जाये तो दर्द हो सकता है।

    निष्कर्ष:

    अगर आपको लाइपोमा है और उसमें दर्द भी होता है तो डॉक्टर को अवश्य दिखाएँ

Saturday, 16 September 2017

अल्सर की असलियत

भागदौड़ भरे इस माहौल में न तो लोगों के खाने का समय तय है, न सोने का। एक्सर्साइज करना तो दूर, समय की दुहाई देकर वे दफ्तर की सीढि़यां चढ़ने से भी परहेज करते हैं। तनाव इस कदर हावी है कि सपने में भी या तो ड्राइविंग करते रहते हैं या दफ्तर की फाइलें पीछा नहीं छोड़तीं। ऐसे में कई बीमारियां चुपके से घर कर जाती हैं। ऐसी ही एक बीमारी है पेप्टिक अल्सर, जो शरीर में ज्यादा एसिडिटी की वजह से होती है ! 


पेप्टिक अल्सर की वजह, लक्षण और इलाज----
क्या होता है पेप्टिक अल्सर- पेप्टिक अल्सर एक ऐसी स्थिति है, जिसमें पेट की अंदरूनी दीवारों पर छाले पड़ जाते हैं। बीमारी बढ़ जाने पर ये छाले गहरे घाव में बदल जाते हैं और मरीजों को ज्यादा परेशानी होने लगती है। गलत खानपान की वजह से जब पेट में एसिड ज्यादा बनने लगता है तो यह स्थिति पैदा हो जाती है। यह बीमारी बैक्टिरिया के इंफेक्शन की वजह से भी होती है।

एसिड रिफ्लक्स डिजीज--- जब हम भोजन करते हैं तो आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक<relatedplaceholder/> एसिड बनता है, जिससे भोजन का पाचन होता है। बदहजमी की वजह से कभी-कभी एसिड ऊपर की ओर आहार नली में चला जाती है। इससे जलन महसूस होती है। इसका असर गले, दांत, सांस आदि पर पड़ने लगता है। इससे सांस लेने में तकलीफ बढ़ जाती है, आवाज भारी हो जाती है और मुंह में छाले पड़ जाते हैं। इस तरह की स्थितियों को एसिड रिफ्लक्स डिजीज कहा जाता है। 
कितनी तरह का अल्सर-- 
गैस्ट्रिक अल्सर - इसमें भोजन के बाद पेट में दर्द होने लगता है। डाइजीन जैसी दवाएं लेने के बाद आराम मिल जाता है।
ड्यूडिनल अल्सर-  खाली पेट रहने से दर्द होता है। भोजन करने के बाद दर्द ठीक हो जाता है। अगर 15 लोगों को ड्यूडेनल अल्सर होता है तो मुश्किल से 1 या 2 लोग गैस्ट्रिक अल्सर के शिकार होते हैं।
इसोफेगल अल्सर : इसमें आहार नली के निचले हिस्से में छाले पड़ जाते हैं या छिद्र हो जाते हैं। इससे आहार नली में तेज जलन होती है।

पेप्टिक अल्सर की वजह-- एसिड की अधिकता : पेट में ज्यादा मात्रा में एसिड बनना पेप्टिक अल्सर की मुख्य वजह है। इसके लिए ज्यादा मिर्च-मसाले वाला खाना और गलत खानपान जिम्मेदार है।

एच-पायलोरी इंफेक्शन : 1980 में एक ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक ने एच-पायलोरी (हेलिकोबेक्टर पायलोरी) नामक बैक्टिरिया का पता लगाया था। उन्होंने माना था कि सिर्फ खान-पान और पेट में एसिड बनने से पेप्टिक अल्सर नहीं होते, बल्कि इसके लिए एक बैक्टिरिया भी दोषी है। इसका नाम एच-पायलोरी रखा गया। एंडोस्कोपी से इसकी स्थिति का पता चलता है। पेप्टिक अल्सर के लिए एच-पायलोरी बैक्टिरिया जिम्मेदार है, फिर भी 90 फीसदी लोगों के पेट में इस बैक्टिरिया के होने के बावजूद उनमें अल्सर नहीं होता। 10 फीसदी लोगों में इस बैक्टिरिया के होने के बावजूद अल्सर होता है।

पेनकिलर्स का इस्तेमाल : कई पेनकिलर्स और बुखार उतारने की दवाएं नॉन-स्टिरॉयडल एंटी इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (एनएसएआईडी) की कैटिगरी में आती हैं। इनमें एस्प्रिन, आइब्रुफेन और नेप्रेक्सिन समूह की दवाएं प्रमुख हैं। इन दवाओं को ज्यादा लेने से एसिड बनता है।

तनाव : तनाव की वजह से एसिड ज्यादा बनता है। बाद में यही पेप्टिक अल्सर का रूप ले लेता है।

स्मोकिंग : स्मोकिंग पेप्टिक अल्सर की एकमात्र वजह नहीं है, लेकिन यह अल्सर के जोखिम को बढ़ा देता है। स्मोकिंग की वजह से अल्सर की दवा का असर कम हो जाता है।

लक्षण---- पेट के ऊपरी हिस्से में तेज दर्द होना अल्सर का लक्षण हो सकता है।

भोजन के बाद जब पेट में दर्द हो और डाइजिन जैसी एंटी-एसिड दवाओं से राहत मिले तो इसे गैस्ट्रिक अल्सर का लक्षण माना जाता है। ड्यूडिनल अल्सर में खाली पेट दर्द होता है और भोजन के बाद दर्द से राहत मिलती है। अक्सर इसका दर्द रात को होता है। अगर दर्द छाती के पास हो तो इसे एसिडिटी रिफ्लेक्शन का असर समझना चाहिए। इससे दिल के दर्द का शक होता है। दिल का दर्द छाती के ऊपरी हिस्से में होता है और कभी-कभी एसिडिटी की वजह से भी उसी जगह दर्द होता है, इसलिए बिना जांच के अंतर समझ पाना आसान नहीं है। पेप्टिक अल्सर होने से मरीज को भूख कम लगती है। सामने खाना होने पर भी खाने की इच्छा नहीं होती।
उलटी होना या उलटी जैसा महसूस होना अल्सर का लक्षण माना जा सकता है। जब अल्सर बढ़ जाता है, तो खून की उलटी हो सकती है। ऐसे में स्टूल (मल) का रंग काला हो जाता है।

अल्सर से बचाव--रेशे वाला भोजन लें और मिर्च-मसाले का इस्तेमाल कम करें।चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, जंक फूड कम लें।खाना समय पर और तसल्ली से खाएं।टेलिविजन देखते हुए खाना न खाएं।रात के खाने और सोने के बीच कम-से-कम दो घंटे का अंतर होना चाहिए। जूस, लस्सी या मीठे तरल पदार्थ पीने में लोग जल्दबाजी करते हैं। यह गलत है। ऐसी चीजों को धीरे-धीरे पीना चाहिए। धीरे-धीरे पीने से मुंह का सलाइवा इसमें मिल जाता है, जिससे ये चीजें जल्दी पच जाती हैं। स्मोकिंग से परहेज करें।तनावमुक्त रहने की कोशिश करें।नियमित व्यायाम करें।दवाएं डॉक्टरों की सलाह से ही लें।अगर अल्सर हो जाए, तो एनएसएडी समूह की दवा न लें।पेनकिलर्स के रूप में क्रोसिन का इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्या है इलाज

1. एलोपैथी

एंटी-अल्सर किट : पेप्टिक अल्सर में 10 दिन की दवा दी जाती है। इसे एंटी-अल्सर किट कहते हैं। इसमें खासतौर से पीपीआई (प्रोटॉन पंप इनहिबिटर), क्लैरीथ्रोमाइसिन और एमॉक्सिस्लिन ग्रुप की दवाएं होती हैं। इनसे एसिड का असर कम हो जाता है। मरीज को ये दवाएं डॉक्टर द्वारा बताए गए परहेज के साथ लेनी चाहिए।
ऑपरेशन : पहले पेप्टिक अल्सर की वजह से ब्लड आने की स्थिति में ऑपरेशन करने की जरूरत पड़ती थी, लेकिन अब एंडोस्कोपी की मदद से इलाज किया जाता है।

क्या है एंडोस्कोपी-----
एंडोस्कोपी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें शरीर के अंदरूनी हिस्सों के बारे में एंडोस्कोप की मदद से पता लगाया जाता है। एंडोस्कोप पतला लचीला ट्यूब होता है, जिसके एक सिरे पर रोशनी की व्यवस्था होती है और इसमें विडियो कैमरा लगा होता है। इसकी मदद से कंप्यूटर स्क्रीन पर शरीर के भीतरी हिस्सों की तस्वीरें देखी जाती हैं। पेप्टिक अल्सर के मामले में इसे मुंह के रास्ते या मलद्वार से शरीर में प्रवेश कराया जाता है। इसका इस्तेमाल मरीज को बिना बेहोश किए किया जाता है। जब अल्सर फट जाता है या अल्सर के घाव गहरे होकर धमनी को डैमेज कर देते हैं, तो एंडोस्कोप की मदद से खून के बहाव को रोका जाता है। उसके बाद दवा से इलाज किया जाता है।

2. होम्योपैथी----
अर्सेनिकल एल्बम, फॉस्फोरस, सल्फर, आयरिस वर्सिकोलर, कैली बायक्रोमिकम, आर्जेंटम नाइट्र्किम, ग्राफिक आदी हैं।इन दवाओं का चयन होम्योपैथी डॉक्टर की सलाह पर करना चाहिए। मरीज और मर्ज के इतिहास को बेहतर जानने के बाद ही डॉक्टर दवाओं का चयन करते हैं। 

3. आयुर्वेद---
सतशेखर रस की 2 टैब्लेट दिन में तीन बार लें।

कामदूध रस की 2 टैब्लेट दिन में तीन बार लें।

4. घरेलू उपचार----
पोहा (बिटन राइस) और सौंफ को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। 20 ग्राम चूर्ण को 2 लीटर पानी में सुबह घोलकर रख लें और रात में पूरा पी जाएं। रोज सुबह तैयार करें और दोपहर बाद या शाम से पीना शुरू कर दें। इस घोल को 24 घंटे में खत्म कर देना है।

दूध गैस्ट्रिक एसिड बनाता है, लेकिन आधा कप ठंडे दूध में आधा नीबू निचोड़कर पिया जाए तो वह पेट को आराम देता है। जलन का असर कम हो जाता है।

पत्ता गोभी और गाजर को बराबर मात्रा में लेकर जूस बना लें। सुबह-शाम एक-एक कप पीने से पेप्टिक अल्सर के मरीजों को आराम मिलता है।गाय के दूध से बने कच्चे घी का इस्तेमाल फायदेमंद होता है।बादाम पीसकर बनाए गए दूध से मरीज को काफी लाभ पहुंचता है। ड्रम स्टिक (सहजन) के पत्ते को पीसकर दही के साथ पेस्ट बनाकर लें। 

5. यौगिक क्रियाएं--- पेप्टिक अल्सर को दूर करने के लिए योगासन नहीं हैं, लेकिन एसिड की अधिकता को कम करने के लिए योग कारगर है।वज्रासन, उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, भुजंगासन करने से एसिड का असर कम होता है।जलनेति जैसी यौगिक क्रियाएं भी उपयोगी हैं।अनुलोम-विलोम, शीतली और सीत्कारी जैसे प्राणायाम से फायदा मिलता है।पेप्टिक अल्सर ने अगर गंभीर रूप ले लिया हो तो योगासन नहीं करने चाहिए। यौगिक क्रियाएं किसी योगाचार्य की सलाह और देखरेख में ही करें।

अलसी - एक चमत्कारी आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक


जब से परिष्कृत यानी “रिफाइन्ड तेल” (जो बनते समय उच्च तापमान, हेग्जेन, कास्टिक सोडा, फोस्फोरिक एसिड, ब्लीचिंग क्ले आदि घातक रसायनों के संपर्क से गुजरता है), ट्रांसफेट युक्त पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजिनेटेड वसा यानी वनस्पति घी (जिसका प्रयोग सभी पैकेट बंद खाद्य पदार्थों व बेकरी उत्पादनों में धड़ल्ले से किया जाता है), रासायनिक खाद, कीटनाशक, प्रिजर्वेटिव, रंग, रसायन आदि का प्रयोग बढ़ा है तभी से डायबिटीज के रोगियों की संख्या बढ़ी है। हलवाई और भोजनालय भी वनस्पति घी या रिफाइन्ड तेल का प्रयोग भरपूर प्रयोग करते हैं और व्यंजनों को तलने के लिए तेल को बार-बार गर्म करते हैं जिससे वह जहर से भी बदतर हो जाता है। शोधकर्ता इन्ही को डायबिटीज का प्रमुख कारण मानते हैं। पिछले तीन-चार दशकों से हमारे भोजन में ओमेगा-3 वसा अम्ल की मात्रा बहुत ही कम हो गई है और इस कारण हमारे शरीर में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 वसा अम्ल यानी हिंदी में कहें तो ॐ-3 और ॐ-6 वसा अम्लों का अनुपात 1:40 या 1:80 हो गया है जबकि यह 1:1 होना चाहिये। यह भी डायबिटीज का एक बड़ा कारण है। डायबिटीज के नियंत्रण हेतु आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक व दैविक भोजन अलसी को “अमृत“ तुल्य माना गया है।
अलसी शरीर को स्वस्थ रखती है व आयु बढ़ाती है। अलसी में 23 प्रतिशत ओमेगा-3 फेटी एसिड, 20 प्रतिशत प्रोटीन, 27 प्रतिशत फाइबर, लिगनेन, विटामिन बी ग्रुप, सेलेनियम, पोटेशियम, मेगनीशियम, जिंक आदि होते हैं। सम्पूर्ण विश्व ने अलसी को सुपर स्टार फूड के रूप में स्वीकार कर लिया है और इसे आहार का अंग बना लिया है, लेकिन हमारे देश की स्थिति बिलकुल विपरीत है । अलसी को अतसी, उमा, क्षुमा, पार्वती, नीलपुष्पी, तीसी आदि नामों से भी पुकारा जाता है। अलसी दुर्गा का पांचवा स्वरूप है। प्राचीनकाल में नवरात्री के पांचवे दिन स्कंदमाता यानी अलसी की पूजा की जाती थी और इसे प्रसाद के रूप में खाया जाता था। जिससे वात, पित्त और कफ तीनों रोग दूर होते है।
- ओमेगा-3 हमारे शरीर की सारी कोशिकाओं, उनके न्युक्लियस, माइटोकोन्ड्रिया आदि संरचनाओं के बाहरी खोल या झिल्लियों का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यही इन झिल्लियों को वांछित तरलता, कोमलता और पारगम्यता प्रदान करता है। ओमेगा-3 का अभाव होने पर शरीर में जब हमारे शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाती है तो ये भित्तियां मुलायम व लचीले ओमेगा-3 के स्थान पर कठोर व कुरुप ओमेगा-6 फैट या ट्रांस फैट से बनती है, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 का संतुलन बिगड़ जाता है, प्रदाहकारी प्रोस्टाग्लेंडिन्स बनने लगते हैं, हमारी कोशिकाएं इन्फ्लेम हो जाती हैं, सुलगने लगती हैं और यहीं से ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, डिप्रेशन, आर्थ्राइटिस और कैंसर आदि रोगों की शुरूवात हो जाती है।
- आयुर्वेद के अनुसार हर रोग की जड़ पेट है और पेट साफ रखने में यह इसबगोल से भी ज्यादा प्रभावशाली है। आई.बी.एस., अल्सरेटिव कोलाइटिस, अपच, बवासीर, मस्से आदि का भी उपचार करती है अलसी।
- अलसी शर्करा ही नियंत्रित नहीं रखती, बल्कि मधुमेह के दुष्प्रभावों से सुरक्षा और उपचार भी करती है। अलसी में रेशे भरपूर 27% पर शर्करा 1.8% यानी नगण्य होती है। इसलिए यह शून्य-शर्करा आहार कहलाती है और मधुमेह के लिए आदर्श आहार है। अलसी बी.एम.आर. बढ़ाती है, खाने की ललक कम करती है, चर्बी कम करती है, शक्ति व स्टेमिना बढ़ाती है, आलस्य दूर करती है और वजन कम करने में सहायता करती है। चूँकि ओमेगा-3 और प्रोटीन मांस-पेशियों का विकास करते हैं अतः बॉडी बिल्डिंग के लिये भी नम्बर वन सप्लीमेन्ट है अलसी।
- अलसी कॉलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और हृदयगति को सही रखती है। रक्त को पतला बनाये रखती है अलसी। रक्तवाहिकाओं को साफ करती रहती है अलसी।
- अलसी एक फीलगुड फूड है, क्योंकि अलसी से मन प्रसन्न रहता है, झुंझलाहट या क्रोध नहीं आता है, पॉजिटिव एटिट्यूड बना रहता है यह आपके तन, मन और आत्मा को शांत और सौम्य कर देती है। अलसी के सेवन से मनुष्य लालच, ईर्ष्या, द्वेश और अहंकार छोड़ देता है। इच्छाशक्ति, धैर्य, विवेकशीलता बढ़ने लगती है, पूर्वाभास जैसी शक्तियाँ विकसित होने लगती हैं। इसीलिए अलसी देवताओं का प्रिय भोजन थी। यह एक प्राकृतिक वातानुकूलित भोजन है।
- सिम का मतलब सेरीन या शांति, इमेजिनेशन या कल्पनाशीलता और मेमोरी या स्मरणशक्ति तथा कार्ड का मतलब कन्सन्ट्रेशन या एकाग्रता, क्रियेटिविटी या सृजनशीलता, अलर्टनेट या सतर्कता, रीडिंग या राईटिंग थिंकिंग एबिलिटी या शैक्षणिक क्षमता और डिवाइन या दिव्य है।
- त्वचा, केश और नाखुनों का नवीनीकरण या जीर्णोद्धार करती है अलसी। अलसी के शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट ओमेगा-3 व लिगनेन त्वचा के कोलेजन की रक्षा करते हैं और त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनाते हैं। अलसी सुरक्षित, स्थाई और उत्कृष्ट भोज्य सौंदर्य प्रसाधन है जो त्वचा में अंदर से निखार लाता है। त्वचा, केश और नाखून के हर रोग जैसे मुहांसे, एग्ज़ीमा, दाद, खाज, खुजली, सूखी त्वचा, सोरायसिस, ल्यूपस, डेन्ड्रफ, बालों का सूखा, पतला या दोमुंहा होना, बाल झड़ना आदि का उपचार है अलसी। चिर यौवन का स्रोता है अलसी। बालों का काला हो जाना या नये बाल आ जाना जैसे चमत्कार भी कर देती है अलसी। किशोरावस्था में अलसी के सेवन करने से कद बढ़ता है।
- लिगनेन का सबसे बड़ा स्रोत अलसी ही है जो जीवाणुरोधी, विषाणुरोधी, फफूंदरोधी और कैंसररोधी है। अलसी शरीर की रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ कर शरीर को बाहरी संक्रमण या आघात से लड़ने में मदद करती हैं और शक्तिशाली एंटी-आक्सीडेंट है। लिगनेन वनस्पति जगत में पाये जाने वाला एक उभरता हुआ सात सितारा पोषक तत्व है जो स्त्री हार्मोन ईस्ट्रोजन का वानस्पतिक प्रतिरूप है और नारी जीवन की विभिन्न अवस्थाओं जैसे रजस्वला, गर्भावस्था, प्रसव, मातृत्व और रजोनिवृत्ति में विभिन्न हार्मोन्स् का समुचित संतुलन रखता है। लिगनेन मासिकधर्म को नियमित और संतुलित रखता है। लिगनेन रजोनिवृत्ति जनित-कष्ट और अभ्यस्त गर्भपात का प्राकृतिक उपचार है। लिगनेन दुग्धवर्धक है। लिगनेन स्तन, बच्चेदानी, आंत, प्रोस्टेट, त्वचा व अन्य सभी कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू तथा एंलार्ज प्रोस्टेट आदि बीमारियों से बचाव व उपचार करता है।
- जोड़ की हर तकलीफ का तोड़ है अलसी। जॉइन्ट रिप्लेसमेन्ट सर्जरी का सस्ता और बढ़िया उपचार है अलसी। ¬¬ आर्थ्राइटिस, शियेटिका, ल्युपस, गाउट, ओस्टियोआर्थ्राइटिस आदि का उपचार है अलसी।
- कई असाध्य रोग जैसे अस्थमा, एल्ज़ीमर्स, मल्टीपल स्कीरोसिस, डिप्रेशन, पार्किनसन्स, ल्यूपस नेफ्राइटिस, एड्स, स्वाइन फ्लू आदि का भी उपचार करती है अलसी। कभी-कभी चश्में से भी मुक्ति दिला देती है अलसी। दृष्टि को स्पष्ट और सतरंगी बना देती है अलसी।
- अलसी बांझपन, पुरूषहीनता, शीघ्रस्खलन व स्थम्भन दोष में बहुत लाभदायक है।
- 1952 में डॉ. योहाना बुडविग ने ठंडी विधि से निकले अलसी के तेल, पनीर, कैंसररोधी फलों और सब्ज़ियों से कैंसर के उपचार का तरीका विकसित किया था जो बुडविग प्रोटोकोल के नाम से जाना जाता है। यह कर्करोग का सस्ता, सरल, सुलभ, संपूर्ण और सुरक्षित समाधान है। उन्हें 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता मिलती थी। इसके इलाज से वे रोगी भी ठीक हो जाते थे जिन्हें अस्पताल में यह कहकर डिस्चार्ज कर दिया जाता था कि अब कोई इलाज नहीं बचा है, वे एक या दो धंटे ही जी पायेंगे सिर्फ दुआ ही काम आयेगी। उन्होंने सशर्त दिये जाने वाले नोबल पुरस्कार को एक नहीं सात बार ठुकराया।
अलसी सेवन का तरीकाः- हमें प्रतिदिन 30 – 60 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। 30 ग्राम आदर्श मात्रा है। अलसी को रोज मिक्सी के ड्राई ग्राइंडर में पीसकर आटे में मिलाकर रोटी, पराँठा आदि बनाकर खाना चाहिये। डायबिटीज के रोगी सुबह शाम अलसी की रोटी खायें। कैंसर में बुडविग आहार-विहार की पालना पूरी श्रद्धा और पूर्णता से करना चाहिये। इससे ब्रेड, केक, कुकीज, आइसक्रीम, चटनियाँ, लड्डू आदि स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाये जाते हैं।
अलसी को सूखी कढ़ाई में डालिये, रोस्ट कीजिये (अलसी रोस्ट करते समय चट चट की आवाज करती है) और मिक्सी से पीस लीजिये. इन्हें थोड़े दरदरे पीसिये, एकदम बारीक मत कीजिये. भोजन के बाद सौंफ की तरह इसे खाया जा सकता है .
अलसी की पुल्टिस का प्रयोग गले एवं छाती के दर्द, सूजन तथा निमोनिया और पसलियों के दर्द में लगाकर किया जाता है। इसके साथ यह चोट, मोच, जोड़ों की सूजन, शरीर में कहीं गांठ या फोड़ा उठने पर लगाने से शीघ्र लाभ पहुंचाती है। यह श्वास नलियों और फेफड़ों में जमे कफ को निकाल कर दमा और खांसी में राहत देती है।
इसकी बड़ी मात्रा विरेचक तथा छोटी मात्रा गुर्दो को उत्तेजना प्रदान कर मूत्र निष्कासक है। यह पथरी, मूत्र शर्करा और कष्ट से मूत्र आने पर गुणकारी है। अलसी के तेल का धुआं सूंघने से नाक में जमा कफ निकल आता है और पुराने जुकाम में लाभ होता है। यह धुआं हिस्टीरिया रोग में भी गुण दर्शाता है। अलसी के काढ़े से एनिमा देकर मलाशय की शुद्धि की जाती है। उदर रोगों में इसका तेल पिलाया जाता हैं।
अलसी के तेल और चूने के पानी का इमल्सन आग से जलने के घाव पर लगाने से घाव बिगड़ता नहीं और जल्दी भरता है। पथरी, सुजाक एवं पेशाब की जलन में अलसी का फांट पीने से रोग में लाभ मिलता है। अलसी के कोल्हू से दबाकर निकाले गए (कोल्ड प्रोसेस्ड) तेल को फ्रिज में एयर टाइट बोतल में रखें। स्नायु रोगों, कमर एवं घुटनों के दर्द में यह तेल पंद्रह मि.ली. मात्रा में सुबह-शाम पीने से काफी लाभ मिलेगा।
इसी कार्य के लिए इसके बीजों का ताजा चूर्ण भी दस-दस ग्राम की मात्रा में दूध के साथ प्रयोग में लिया जा सकता है। यह नाश्ते के साथ लें।
बवासीर, भगदर, फिशर आदि रोगों में अलसी का तेल (एरंडी के तेल की तरह) लेने से पेट साफ हो मल चिकना और ढीला निकलता है। इससे इन रोगों की वेदना शांत होती है।
अलसी के बीजों का मिक्सी में बनाया गया दरदरा चूर्ण पंद्रह ग्राम, मुलेठी पांच ग्राम, मिश्री बीस ग्राम, आधे नींबू के रस को उबलते हुए तीन सौ ग्राम पानी में डालकर बर्तन को ढक दें। तीन घंटे बाद छानकर पीएं। इससे गले व श्वास नली का कफ पिघल कर जल्दी बाहर निकल जाएगा। मूत्र भी खुलकर आने लगेगा।
इसकी पुल्टिस हल्की गर्म कर फोड़ा, गांठ, गठिया, संधिवात, सूजन आदि में लाभ मिलता है।
डायबिटीज के रोगी को कम शर्करा व ज्यादा फाइबर खाने की सलाह दी जाती है। अलसी व गैहूं के मिश्रित आटे में (जहां अलसी और गैहूं बराबर मात्रा में हो)|
सुपर फुड अलसी में ओमेगा थ्री व सबसे अधिक फाइबर होता है। यह डब्लयू एच ओ ने इसे सुपर फुड माना है। यह रोगों के उपचार में लाभप्रद है। लेकिन इसका सेवन अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग तरह से किया जाता है।  स्वस्थ व्यक्ति को रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच अलसी का पाउडर पानी के साथ ,सब्जी, दाल या सलाद मंे मिलाकर लेना चाहिए । अलसी के पाउडर को ज्यूस, दूध या दही में मिलाकर भी लिया जा सकता है। इसकी मात्रा 30 से 60 ग्राम प्रतिदिन तक ली जा सकती है। 100-500 ग्राम अलसी को मिक्सर में दरदरा पीस कर किसी एयर टाइट डिब्बे में भर कर रख लें। अलसी को अधिक मात्रा मंे पीस कर न रखें, यह पाउडर के रूप में खराब होने लगती है। सात दिन से ज्यादा पुराना पीसा हुआ पाउडर प्रयोग न करें। इसको एक साथ पीसने से तिलहन होने के कारण खराब हो जाता है।
  • खाँसी होेने पर अलसी की चाय पीएं। पानी को  उबालकर उसमें अलसी पाउडर मिलाकर चाय तैयार करें।एक चम्मच अलसी पावडर को दो कप (360 मिलीलीटर) पानी में तब तक धीमी आँच पर पकाएँ जब तक यह पानी एक कप न रह जाए। थोड़ा ठंडा होने पर शहद, गुड़ या शकर मिलाकर पीएँ। सर्दी, खाँसी, जुकाम, दमा आदि में यह चाय दिन में दो-तीन बार सेवन की जा सकती है। दमा रोगी एक चम्मच अलसी का पाउडर केा आधा गिलास पानी में 12 घंटे तक भिगो दे और उसका सुबह-शाम छानकर सेवन करे तो काफी लाभ होता है। गिलास काँच या चाँदी को होना चाहिए।
  • समान मात्रा में अलसी पाउडर, शहद, खोपराचूरा, मिल्क पाउडर व सूखे मेवे मिलाकर नील मधु तैयार करें।  कमजोरी में व बच्चों के स्वास्थ्य के लिए नील मधु उपयोगी है।
  • डायबीटिज के मरीज को आटा गुन्धते वक्त प्रति व्यक्ति 25 ग्राम अलसी काॅफी ग्राईन्डर में ताजा पीसकर आटे में मिलाकर इसका सेवन करना चाहिए। अलसी मिलाकर रोटियाँ बनाकर खाई जा सकती हैं। अलसी एक जीरो-कार फूड है अर्थात् इसमें कार्बोहाइट्रेट अधिक होता है।शक्कर की मात्रा न्यूनतम है।
  • कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से निकला तीन चम्मच तेल, छः चम्मच पनीर में मिलाकर उसमें सूखे मेवे मिलाकर देने चाहिए। कैंसर की स्थिति मेें डाॅक्टर बुजविड के आहार-विहार की पालना श्रद्धा भाव से व पूर्णता से करनी  चाहिए। कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से  निकले तेल की मालिश भी करनी चाहिए।
  • साफ बीनी हुई और पोंछी हुई अलसी  को धीमी आंच पर तिल की तरह भून लें।मुखवास की तरह इसका सेवन करें। इसमें संेधा नमक भी मिलाया जा सकता है। ज्यादा पुरानी भुनी हुई अलसी प्रयोग में न लें।
  • बेसन में 25 प्रतिशत मिलाकर अलसी मिलाकर व्यंजन बनाएं। बाटी बनाते वक्त भी उसमें भी अलसी पाउडर मिलाया जा सकता है। सब्जी की ग्रेवी में भी अलसी पाउडर का प्रयोग करें।
  • अलसी सेवन के दौरान खूब पानी पीना चाहिए। इसमें अधिक फाइबर होता है, जो खूब पानी माँगता है


Friday, 15 September 2017

मेथीदाना (fenugreek) – बुढ़ापे तक स्वास्थय का खजाना

जो व्यक्ति बुढ़ापे तक स्वस्थ और हट्टा कट्टा रहना चाहता हैं, और चाहता हैं के उसको मधुमेह, रक्तचाप, हृदय रोग, joint pain जैसी बीमारिया ना लगे तो उसको मेथी दाने  का रोज़ाना सेवन बताई गयी विधि द्वारा करना चाहिए।

मेथीदाने के फायदे--मैथीदाना, जितने साल जिसकी आयु हो उतने दाने लेकर धीरे-धीरे खूब चबा-चबाकर रोजाना प्रात: खाली पेट, या शाम को पानी की सहायता से  सेवन करने चाहिए, अगर चबाने में दिक्कत हो तो पानी की सहायता से निगल सकते हैं। ऐसा करने से व्यक्ति सदैव निरोग और चुस्त बना रहेगा और मधुमेह, जोड़ों के दर्द, शोथ(सूजन), रक्तचाप, बलगमी बीमारियां, अपचन आदि अनेकानेक रोगों से बचाव होगा। वृध्दावस्था की व्याधियां जैसे सायटिका, घुटने का दर्द, हाथ-पैरों का सुन्न पड़ जाना, मांसपेशियों का खिचाव, भूख न लगना, बार-बार मूत्र आना, चक्कर आना आदि, उसके पास नही फटकेगी। ओज, कान्ति और स्फूर्ति में वृद्धि होकर व्यक्ति दीर्घायु होगा।

मेथीदाना सेवन के तरीके-यद्यपि अलग-अलग बिमारियों के इलाज के लिए मैथीदाना का प्रयोग कई प्रकार से किया जाता है जैसे मैथीदाना भिगोकर उसका पानी पीना या भिगोये मैथीदाना को घोट छानकर पीना, उसे अंकुरित करके चबाना या रस निकालकर पीना, उसे उबालकर उसका पानी पीना या सब्जी बनाकर खाना, खिचड़ी या कढी पकाते समय उसमे डालकर सेवन करना, सबूत मैथीदाना प्रात: चबाकर खाना और रात्रि में पानी संग निगलना, भूनकर या वैसे ही उसका दलिया या चूर्ण बनाकर ताजा पानी के साथ फक्की लेना, मैथीदाना के लड्डू बनाकर खाना आदि परन्तु मैथी के सेवन का निरापद और सबसे अच्छा तरीका है उसका काढ़ा या चाय बनाकर पीना।

विशेष-गर्मियों में इसकी फक्की लेने की बजाये रात में इसको एक गिलास पानी में भिगो कर रख दे, सुबह मेथीदाना चबा चबा कर खा ले और ऊपर से यही भिगोया हुआ पानी पी ले।

अंकुरित मूंग रहना है फिट तो जरुर खाएं

मूंग को रात को भिगो कर सुबह उबाल कर उसे मसाले का छोंक लगा कर या अंकुरित मूंग खाये स्वाद मे तो अच्छे लगेगे ही मगर शरीर मे बहुत फायदा करेगा मे इस पोस्ट मे आपको इसके फायदे की जानकारी प्रदान कर रहा हु ! जैन धर्म मे उपवास के बाद पारने मे मूंग खाते है इसका मुख्य कारण क्या है अगर आप पूरे मेरे विचार आप पढ़ोगे त समझ जाओगे !    जरूरी नहीं कि स्‍वाद में जो अच्‍छा हो, वो स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक भी हो। अक्‍सर ऐसा ही होता है, जो चीज खाने में बिल्‍कुल अच्‍छी नहीं लगती है वो गुणों से भरपूर ही होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण करेला है, स्‍वाद में कितना कड़वा और बेकार लगता है लेकिन सारी सब्जियों में सबसे ज्‍यादा गुण करेले में ही होते हैं। स्‍वादिष्‍ट भोजन करने से पहले आपको इस बात को हमेशा ध्‍यान में रखना चाहिए कि शरीर के विकास के लिए विटामिन और खनिज की जरूरत होती है दालों में सबसे पौष्टिक दाल, मूंग की होती है, इसमें विटामिन ए, बी, सी और ई की भरपूर मात्रा होती है। साथ ही पौटेशियम, आयरन, कैल्शियम की मात्रा भी मूंग में बहुत होती है। इसके सेवन से शरीर में कैलोरी भी बहुत नहीं बढ़ती है। अगर अंकुरित मूंग दाल खाएं तो शरीर में कुल 30 कैलोरी और 1 ग्राम फैट ही पहुंचता है।अंकुरित मूंग दाल में मैग्‍नीशियम, कॉपर, फोलेट, राइबोफ्लेविन, विटामिन, विटामिन सी, फाइबर, पोटेशियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, आयरन, विटामिन बी -6, नियासिन, थायमिन और प्रोटीन होता है। मूंग की दाल के स्‍प्राउट ऐसे ही कुछ लाभकारी गुण निम्‍न प्रकार हैं
मूंग की दाल के स्‍प्राउट में ग्‍लूकोज लेवल बहुत कम होता है इस वजह से मधुमेह रोगी इसे खा सकते हैं।
मूंग की दाल के स्‍प्राउट में ओलियोसाच्‍चाराइडस होता है जो पॉलीफिनॉल्‍स से आता है। ये दोनों की घटक, गंभीर रोगों से लड़ने की क्षमता को प्रबल करते हैं। कैंसर के रोगी भी इसका सेवन आराम से कर सकते हैं
मूंग की दाल में ऐसे गुण होते हैं जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देते हैं और उसे बीमारियों से लड़ने की ताकत देते हैं। इसमें एंटी-माइक्रोबियल और एंटी-इंफलामेट्री गुण होते हैं जो शरीर की इम्‍यूनिटी बढ़ाते हैं
मूंग की दाल के स्‍प्राउट में शरीर के टॉक्सिक को निकालने के गुण होते हैं। इसके सेवन से शरीर में विषाक्‍त तत्‍वों में कमी आती है ! इस बात को मजाक में न लें, मूंग की दाल के स्‍प्राउट के सेवन से पाचन क्रिया हमेशा सही बनी रहती है जिसके कारण, आपको पेट सम्‍बंधी समस्‍या नहीं होती है और जीवन खुशहाल रहता है। मूंग की दाल के स्‍प्राउट में साइट्रोजेन होता है जो शरीर में कोलेजन और एलास्टिन बनाएं रखता है जिससे उम्र का असर, जल्‍दी ही चेहरे पर दिखाई नहीं देता है। मूंग की दाल के स्‍प्राउट में फाइबर की भरपूर मात्रा होती है। जिससे फ्रेश होने में कोई समस्‍या नहीं होती है व पाचन क्रिया दुरूस्‍त बनी रहती है।मूंग की दाल के स्‍प्राउट में पेप्टिसाइड होता है जो बीपी को संतुलित रखता है और शरीर को फिट बनाएं रखने में कारगर होता है।अगर आप शाकाहारी हैं तो मूंग की दाल के स्‍प्राउट का सेवन अवश्‍य करें। यह शरीर में आवश्‍यक तत्‍वों की कमी हो पूरी करता है और शरीर को मजबूत बनाती है। इससे बेहतर शाकाहारी खाद्य सामग्री कोई नहीं होती है। यह सुपाच्‍य भी होता है।