Tuesday, 26 September 2017

कलौंजी का तेल है अमृत के समान

कलौंजी का तेल हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, डाइबिटीज, अस्थमा, खांसी, नजला, जोड़ों के दर्द, बदन दर्द, कैंसर, किडनी, गुर्दे की पत्थरी, मूत्राशय के रोग, मर्दाना कमजोरी, बालों के रोगों, मोटापे, याद दाश्त बढाने, मुंहासे, सुंदर चेहरा, अजीर्ण, उल्टी, तेज़ाब, बवासीर, लयुकोरिया आदि  गंभीर बीमारियों से एक साथ निजात दिलाने में सक्षम है। 

यह अनमोल चमत्कारिक दवा ब्लैैक सीड ऑइल, जिसे कलौंजी का तेल भी कहा जाता है यह आसानी से उपलब्ध होने वाली बेहद प्रभावी और उपयोगी साबित हो सकती है। कलौंजी के तेल में मौजूद दो बेहद प्रभावकारी तत्व थाइमोक्विनोन और थाइमोहाइड्रोक्विनोन में विशेष हीलींग प्रभाव होते हैं। ये दोनों तत्व मिलकर इन सभी बीमारियों से लड़ने और शरीर को हील करने में मदद करते हैं।


कार्डियोवेस्कुलर डि‍सीज एवं अस्थमा, ब्लड कैंसर, फेफड़ों की समस्या, लिवर, प्रोस्टेट, ब्रेस्ट कैंसर, सर्विक्स और त्वचा रोगों में भी कारगर है। यह कोई नई दवा नहीं है, बल्कि इन गंभीर बीमारियों के लिए इसकी खोज हजारों वर्षों पूर्व हो चुकी थी। जिसके बाद इस दवा पर विज्ञान के अब तक कई शोध हो चुके हैं, जो विभिन्न बीमारियों के लिए ब्लैैक सीड ऑइल को बेहतरीन घरेलू दवा साबित करते हैं।
2012  में इजिप्ट में हुए एक शोध के अनुसार शहद और कलौंजी ब्लैैक सीड ऑइल ट्यूमर रोधी तत्व मौजूद हैं, जो कैंसर कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्ध‍ि को रोकने में सक्षम है। वहीं 2013 में मलेशिया में हुए रिसर्च के अनुसार ब्रेस्ट कैंसर के लिए थाइमोक्विनोन का प्रयोग एक दीर्घकालिक इलाज के रूप में किया गया।
इसमें मौजूद थाइमोक्विनोन एक बायोएक्टिव कंपाउंड है जो एंटीऑक्सीडेंट, एंटी इंफ्लेमेटरी और एंटी कैंसर कारक है। इसमें वे चुनिंदा साइटोटॉक्स‍िक प्रॉपर्टी मौजूद है जो कैंसर को‍शिकाओं के लिए घातक है, जबकि सामान्य कोशिकाओं को कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं डालती।
तो अब आपको इन बीमारियों के लिए महंगी दवाओं पर खर्च करने की जरुरत नहीं होगी, इस एक घरेलुु द्वारा आप कई बीमारियों को हल कर सकते हैं।

कलौंजी का तेल सेवन की विधि. – 

किसी भी बीमारी में आप कलौंजी के तेल को आप सुबह गर्म पानी में 2 बूँद डालकर रोजाना पी सकते हैं. इस से आपको उपरोक्त बिमारियों के होने की आशंका बहुत कम हो जाएगी. अगर गंभीर बिमारियों ने जकड रखा है तो जब भी पानी पियें तो उसमे 2 बूँद कलौंजी का तेल डालकर पीजिये. इसमें शहद भी मिलाया जा सकता है. kalonji ka tel
कलौंजी का तेल रात्रि को सोने से पहले दूध में भी 2 बूँद डाल कर रोजाना पिया जा सकता है.
जितने गुण कलौंजी में निहित है उतने ही गुण कलौंजी के तेल में भी हैं. कलौंजी के लिए एक कहावत भी मशहूर है के मौत को छोड़कर हर मर्ज की दवा है कलौंजी.
अगर आपको ये तेल ना मिले तो आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं.  नंबर -   8460783401 
ध्यान रखें कि इस दवा का प्रयोग गर्भावस्था में नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे गर्भ नष्ट हो सकता है
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डिप्रेशन का कारण बन सकती हैं ये पोषक तत्वों की कमी

          पोषक तत्वों की कमी से भी हो सकता है डिप्रेशन

डिप्रेशन आज के समय में एक प्रचलित मानसिक रोग है। इसे आज के समाज का रोग भी कह सकते हैं। समय के साथ बढ़ते घरेलू विवाद, अत्यधिक व्यस्तता, आगे निकलने की होड़, मन मुताबिक काम न होना, अधिकारी द्वारा तिरस्कृत किया जाना या अपनी क्षमता पर संदेह जैसे कई कारण हैं जो अवसाद में ले जाते हैं। लेकिन, अवसाद सिर्फ इन्ही चीज़ों की देन नहीं है। कुछ पोषक तत्वों की कमी होने की वजह से भी हम अवसाद की चपेट में आ जाते हैं। आइये जानते हैं वो कौन से 7 पोषक तत्व हैं जिनकी कमी आपको डिप्रेशन का शिकार बना सकती है।
मैग्नीशियम---मैग्नीशियम एक रासायनिक तत्व है जो हमारे लिए बहुत उपयोगी है। शरीर का आधे से ज्यादा मैग्नीशियम हमारी हड्डियों में पाया जाता है जबकि बाकी शरीर में हाने वाली जैविक कियाओं में सहयोग करता है। मैग्नीशियम मस्तिष्क सहित शरीर के अनेक ऊतकों के सही ढंग से काम करने के लिए अनिवार्य है। मैग्‍नीशियम की भरपूर मात्रा न लेने से सिरदर्द, अनिद्रा, तनाव आदि की शिकायत हो सकती है।
आयरन--- आयरन की कमी की समस्या महिलाओं में आम है। लगभग 20 प्रतिशत महिलाओं, और 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को आयरन की कमी होती है। वहीं केवल तीन प्रतिशत पुरूषों में ये कमी पाई जाती है। आयरन की कमी से ऐनीमिया हो जाता है। इसके लक्षण डिप्रैशन के लक्षणों की तरह ही हैं - थकान, चिड़चिड़ापन, दिमागी धुंधलापन
विटामिन डी---विटामिन डी की कमी का संबंध डिप्रेशन, डीमेंटिया और ऑटिज्म से है। सर्दियों के महीनों में खासतौर पर हमारे शरीर में विटामिन डी की कमी हो जाती है। इसका कारण ये है कि इस समय सूर्य का प्रकाश नहीं मिल पाता, जो कि विटामिन डी का प्रमुख स्रोत है। इस कमी से बचने के लिए हमें विटामिन डी के विकल्प अपनाने की जरूरत है।
विटामिन बी समूह--- विटामिन बी समूह मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के सही से काम करने में मदद करता है। यह ब्रेन, स्पाइनल कोर्ड और नसों के कुछ तत्वों की रचना में भी सहायक होते हैं। विटामिन बी समूह की शरीर में अगर कमी हो जाए तो स्मरण शक्ति कमजोर हो सकती है। आप अचानक थकान महसूस कर सकते हैं, डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं।  
फोलेट--- जिन लोगों में फोलेट का स्तर निम्न होता है उन पर डिप्रेशन की दवाओं का केवल 7 प्रतिशत असर होता है। इस वजह से काफी मनोचिकित्सक डिप्रेशन के इलाज और डिप्रेशन की दवा का असर बढ़ाने के लिए, डेप्लिन नाम की फोलेट की दवा खाने की सलाह देते हैं। अगर आप इस समस्या से बचना चाहते हैं तो गहरे हरे रंग की पत्तेदार सब्जियां, बींस, सिट्रस फल व जूस लें  
ऐमीनो ऐसिड्स---प्रोटीन के बिल्डिंग ब्लॉक्स आपके दिमाक को सही ढंग से काम करने में मदद करते हैं। ऐमीनो ऐसिड्स की कमी से सुस्ती, एकाग्रता की कमी व डिप्रेशन जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं। ऐमीनो ऐसिड्स के अच्छे स्रोत बीफ, अंडे, मछली, बींस, सीड्स और नट्स हैं। रोजमर्रा की डाइट में इन्हें शामिल करने से शरीर में ऐमीनो ऐसिड्स की कमी धीरे धीरे दूर हो जाती है। 
 जिंक--- ज़िंक बायोकैमिकल रिएक्शन से बचाता है, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और श्वेत रुधिर कणिकाओं की संख्या बढ़ाकर एंटीबॉडीज़ के उत्पादन को सुगम बनाता है। ज़िंक की कोइ दैनिक खुराक तय नहीं है, और मीट, समुद्री भेजन और दूध-मेवे इसके प्रमुख स्रोत हैं

    Sunday, 24 September 2017

    कुटज ( इन्द्रजौ ) के फायदे

     कुटज (संस्कृत), कूड़ा या कुरैया (हिन्दी), कुरजी (बंगला), कुड़ा (मराठी), कुड़ी (गुजराती), वेप्पलाई (तमिल), कछोडाइस (तेलुगु) तथा मोलेरीना एण्टी डिसेण्टीरिका (लैटिन) कहते हैं। इन्द्रजौ 5 से10 फुट ऊंचा जंगली पौधा होता है जिसके पत्ते बादाम के पत्तों की तरह लंबे होते हैं। कोंकण (महाराष्ट्र) में इन्द्रजौ ‌‌‌के पत्तों का बहुत उपयोग किया जाता है। इसके फूलों की सब्जी बनायी जाती है। इसमें फलियां पतली और लंबी होती हैं, इन फलियों का भी साग और अचार बनाया जाता है। फलियों के अंदर से जौ की तरह बीज निकलते हैं। इन्ही बीजों को इन्द्रजौ कहते हैं। सिरदर्द तथा साधारण प्रकृति वाले मनुष्यों के लिए यह नुकसानदायक है। इसके दोषों को दूर करने के लिए इसमें धनियां मिलाया जाता है। इसकी तुलना जायफल से भी की जा सकती है। इसके फूल भी कड़वे होते हैं। इनका एक पकवान भी बनाया जाता है। इन्द्रजौ के पेड़ की दो जातियां - काली ‌‌‌वसफेदइन्द्र जौ होती हैं और इन दोनों में ये कुछ अन्तर इस प्रकार होते हैं। कुटज का पेड़ मध्यम आकार का, कत्थई या पीलाई लिये कोमल छालवाला होता है। कुटज के पत्ते 6-12 इंच लम्बे, 1-1 इंच चौड़े होते हैं। कुटज के फूल सफेद, 1-1 इंच लम्बे, चमेली के फूल की तरह कुछ गन्धयुक्त होते हैं। कुटज के फल 8-16 इंच लम्बे, फली के समान होते हैं। दो फलियाँ डंठल तथा सिरों पर भी मिली-सी रहती हैं। बीज जौ (यव) के समान अनेक, पीलापन लिये कत्थई रंग के होते हैं। ऊपर से रूई चढ़ी रहती है। इसे ‘इन्द्रजौ‘ (इन्द्रयव) कहते हैं। इसकी जातियाँ दो होती हैं : (क) कृष्ण-कुटज (स्त्री-जाति का) और (ख) श्वेत-कुटज (पुरुष-जाति का) । यह हिमालय प्रदेश, बंगाल, असम, उड़ीसा, दक्षिण भारत तथा महाराष्ट्र में प्राप्त होता है।
    रासायनिक संघटन : इसकी छाल तथा बीज-अंगों में कुर्चिसिन तथा कुर्चीन तत्त्व पाये जाते हैं।
    कुटज के गुण : यह स्वाद में कड़वा, कसैला, पचने पर कटु तथा हल्का, रूखा और शीतल होता है। इसका मुख्य प्रभाव पाचन-संस्थान पर स्तम्भक रूप में पड़ता है। यह व्रण-रोपण (घाव भरनेवाला) अग्निदीपक, कृमिहर, रक्तशोधक, ज्वरहर, धातुशोषक तथा रक्त-स्तम्भक है।
    काली इन्द्र जौ: - ‌‌‌इसके पेड़ बड़े, पत्ते हल्के काले, फलियां सफेद ‌‌‌होती हैं, जो कि इन्द्रजौ के पेड़ की फलियों से दोगुनी बड़ी होती हैं। सफेद इन्द्र जौ की तुलना में यह ज्यादा गर्म होता है। काली इन्द्रजौ बवासीर, त्वचा के विकार और पित्त का नाश करती है। और खून की गंदगी, कुष्ठ, अतिसार (दस्त), कफ, पेट के कीड़े, बुखार और जलन को नाश (खत्म) करता है। बाकी काले इन्द्रजौ के सभी गुण सफेद इन्द्र जौ के गुण से मिलते जुलते हैं।
    सफेद इन्द्र जौ: ‌‌‌इसके पेड़ काले इन्द्र जौ से छोटे, पत्ते हल्के सफेद, फलियां थोड़ी छोटी होती हैं। यह काले इन्द्र जौ से हल्का गर्म होता है। यह कड़वा, तीखा, भूखवर्द्धक, पाचक और फीका होता है।
    ‌‌‌‌‌‌औषधीय गुण:---
    ‌‌‌अल्सर व फुंसीयां: पीसी हुई इन्द्रजौ की छाल को सेंधा नमक मिलाकर गोमूत्र के मिलाकर प्रभावित अंग पर लगाने से लाभ मिलता है।
    ‌‌‌अश्मरी: - इन्द्रजौ के पाउडर व सालमोनिक को दूध या चावल के धोवल के साथ ‌‌‌या पीसी हुई इन्द्रजौ की छाल को दही के साथ लेने से पत्थरी टूटकर बाहर आ जाती है।
    ‌‌‌गर्भनिरोधक: - 10-10 ग्राम पीसी हुई इन्द्रजौ, सुवा सुपारी, कबाबचीनी और सौंठ को छानकर 20 ग्राम मिश्री मिला लें। मासिक धर्म के बाद, 5-5 ग्राम, दिन में दो बार लेने से गर्भधारण नही होगा।
    ‌‌‌जलोदर: - इन्द्रजौ की जड़ को पानी के साथ पीसकर 14-21 दिन नियमित लेने से जलोदर समाप्त हो जाता है।
    पीलिया: पीलिया के रोग में इसका रस नियमित रूप से 3 दिन पीने से अच्छा लाभ मिलता है।
    ‌‌‌पुराना ज्वर ‌‌‌व बच्चों में दस्त: - इन्द्रजौ व टीनोस्पोरा की छाल को पानी में उबाल कर काढ़ा या इन्द्रजौ की छाल को रातभर पानी में भिगो कर रखने से व पानी को छान कर लेने से पुराना ज्वर लाभ प्रदान करता है।
    ‌‌‌पेट में एंठन: - गर्म किये हुए इन्द्रजौ के बीजों को पानी में भिगो कर लेने से पेट की एंठन में लाभ मिलता है।
    ‌‌‌बवासीर: - इन्द्रजौ को पानी के साथ पीस कर बाराबर मात्रा में जामुन के साथ मिला कर छोटी-छोटी गोलींयां बना लें। सोते समय दो गोलीयां ठण्डे पानी के साथ लेने से बवासीर में लाभ मिलता है।
    ‌‌‌मुंह के छाले: - 10 ग्राम इन्द्रजौ को 10 ग्राम काले जीरे के साथ पीसकर पाउडर बनाकर छान लें। इस पाउडर को मुंह के छालों पर दिन में दो बार लगाने से लाभ प्रदान करता है।
    ‌‌‌हैजा: - इन्‍द्रजौ की जड़ को अरंडी के साथ पीसकर हींग ​मिलाकर लेने से हैजे में आराम ​मिलता है।
     रक्त-पित्तातिसार : कुटज की छाल को पीसकर सोंठ के साथ देने से रक्त बन्द होता है। रक्त-पित्त में घी के साथ देने से रक्त आना रुकता है। कुटज के फल पीसकर देने से रक्तातिसार और पित्तातिसार में लाभ होता है।
     रक्तार्श : इसकी छाल पीसकर पानी में रात्रि को भिगोकर सुबह छानकर पीने से खूनी बवासीर में निश्चित लाभ होता है।
     प्रमेह : प्रमेह में उपर्युक्त विधि से फूलों को पीसकर दें।

    Thursday, 21 September 2017

    गठिया रोग ...

    संधि शोथ यानि "जोड़ों में दर्द" (: Arthritis / आर्थ्राइटिस) के रोगी के एक या कई जोड़ों में दर्द, अकड़न या सूजन आ जाती है। इस रोग में जोड़ों में गांठें बन जाती हैं और शूल चुभने जैसी पीड़ा होती है, इसलिए इस रोग को गठिया भी कहते हैं।
    संधिशोथ सौ से भी अधिक प्रकार के होते हैं। 
    अस्थिसंधिशोथ (osteoarthritis) इनमें सबसे व्यापक है। अन्य प्रकार के संधिशोथ हैं - आमवातिक संधिशोथ या 'रुमेटी संधिशोथ' (rheumatoid arthritis), सोरियासिस संधिशोथ (psoriatic arthritis)।
    संधिशोथ में रोगी को आक्रांत संधि में असह्य पीड़ा होती है, नाड़ी की गति तीव्र हो जाती है, ज्वर होता है, वेगानुसार संधिशूल में भी परिवर्तन होता रहता है। इसकी उग्रावस्था में रोगी एक ही आसन पर स्थित रहता है, स्थानपरिवर्तन तथा आक्रांत भाग को छूने में भी बहुत कष्ट का अनुभव होता है। यदि सामयिक उपचार न हुआ, तो रोगी खंज-लुंज होकर रह जाता है। संधिशोथ प्राय: उन व्यक्तियों में अधिक होता है जिनमें रोगरोधी क्षमता बहुत कम होती है। स्त्री और पुरुष दोनों को ही समान रूप से यह रोग आक्रांत करता है।
    संधिशोथ के कारणों को दूर करने तथा संधि की स्थानीय अवस्था ठीक करने के लिए चिकित्सा की जाती है। इनके अतिरिक्त रोगी के लिए पूर्ण शारीरिक और मानसिक विश्राम, पौष्टिक आहार का सेवन, धूप सेवन, हलकी मालिश तथा भौतिक चिकित्सा करना अत्यंत आवश्यक है।
    • संधि शोथ (आर्थराइटिस) की बीमारी की विवेकपूर्ण प्रबंधन और प्रभावी उपचार से अच्छी तरह जीवन-यापन किया जा सकता है।
    • संधि शोथ (आर्थराइटिस) बीमारी के विषय में जानकारी रखकर और उसके प्रबंधन से विकृति तथा अन्य जटिलताओं से निपटा जा सकता है।
    • रक्त परीक्षण और एक्स-रे की सहायता से संधि शोथ (आर्थराइटिस) की देखरेख की जा सकती है।
    • डॉक्टर के परामर्श के अनुसार दवाइयां नियमित रूप से लें।
    • शारीरिक वजन पर नियंत्रण रखें।
    • स्वास्थ्यप्रद भोजन करें।
    • डॉक्टर द्वारा दिये गये निर्देशों के अनुसार नियमित व्यायाम करें।
    • नियमित व्यायाम करें तथा तनाव मुक्त रहने की तकनीक अपनाएं, समुचित विश्राम करें, अपने कार्यों को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करके तनाव से मुक्त रहें।
    • औषधियों के प्रयोग में अनुपूरक रूप में योग तथा अन्य वैकल्पिक रोग के उपचारों को वैज्ञानिक तरीके से लिपिबद्ध किया गया है।पैरों की हड्डीओं को सही संरेखण (एलाइनमेंट) में रखने के लिए और उन पर पड़ने वाले वजन को कम करने के लिए मजबूत मांसपेशियों की आवश्य्कता होती है। मजबूत मांसपेशियां व्यायाम के द्वारा बनाई जा सकती है। सप्ताह में कम से कम ३ बार व्यायाम जरूरी है। पैरों की हड्डीओं को सही संरेखण (एलाइनमेंट) में रखने के लिए और उन पर पड़ने वाले वजन को कम करने के लिए मजबूत मांसपेशियों की आवश्य्कता होती है। मजबूत मांसपेशियां व्यायाम के द्वारा बनाई जा सकती है। सप्ताह में कम से कम ३ बार व्यायाम जरूरी है। 
    • अर्थराइटिस ‘गठिया’ क्या है एवं कितने प्रकार की होती है?

      किसी भी जोड में सूजन, दर्द व जकडन को अर्थराइटिस गठिया कहा जाता है। अर्थराइटिस सामान्यतय: दो प्रकार की होती है। प्रथम ओस्टिायोअर्थराइटिस जिसमें बढती उम्र के साथ या किसी चोट के कारण एवं अत्यधिक दुरू पयोग से जोडों में अन्दर की मांसपेशियां का टूटना व मुलायम गद्दी की घिसावट का होनें के कारण जोड़ों में सूजन, दर्द और जकडऩ का होना।
      दूसरा रूहमेटिज्म बाय जिसमें 200 से अधिक विभिन्न प्रकार की गम्भीर ऑटोइम्यून बीमारियां होती है जिनसे जोड़ो में टेडापन होने व आन्तरिक अंगो पर दुष्प्रभाव पडऩें की सम्भवना होती है। विभिन्न महत्वपूर्ण आन्तरिक अंग जिन पे रू हमेटिज्म का दुष्प्रभाव पड़ सकता है वह है: हृदय, फेफडें, आंख, गुर्दा, चर्म आदि। सामान्यत: समाज में गठिया बाय रू हमेटोइड अर्थराइटिस सबसे व्यापक रू हमेटिज्म बीमारी है। 
      रूहमेटिज्म रोग से कौन-कौन प्रभावित हो सकते है? 
      बाय या रू हमेटिज्म आमतौर पर मध्यम आयु वर्ग, युवा व बच्चों का प्रभावित करती है। यद्यपि पुरू षों की तुलना में स्त्रियों में तीन गुना ज्यादा होने की सम्भावना होती है। बच्चों के रू हमेटिज्म को जुवेनाइल अर्थराइटिस के नाम से जाना जाता है। ओस्टियोअर्थराइटिस से बुजुर्ग ज्यादा प्रभावित होते है। घुटनें एवं कुल्हे के जोडों पर इसका ज्यादा प्रभाव पडता है। 
      ऑटोइम्यून बीमारी का क्या मतलब है? 
      ऑटोइम्यून बीमारी में शरीर का इम्यून सिस्टम प्रतिरोधक क्षमता, शरीर के अंगों के प्रति असंतुलित एवं आक्रामक हो जाता है जिससे शरीर के जोड, मांसपेशियां, हड्डी व महत्वपूर्ण आंतरिक अंगों को ही नुकसान पहुंचाने लगता है। 
      अर्थराइटिस होने के क्या क्या कारण हो सकते है? 
      घुटनें का दर्द या ओस्टयोअर्थराइटिस होने के सबसे बडें कारण- बढ़ती उम्र, बढता वजन मोटापा व जोड़ों का चोटिल होना। आनुवांशिकता, पर्यावरण प्रदुषण व धुम्रपान रू मेटिज्म बाय बीमारी के होने के सबसे बड़े कारण हो सकते है। 
      प्रमुख रूहमेटिज्म बाय बीमारियों के लक्षण एवं नाम क्या है? 
      रूहमेटॉइड अर्थराइटिस हाथ व पैरों के छोटे जोडों की गठिया, एन्काइलॉजिंग स्पोन्डिलाइटिस कमर की गठिया, एस.एल.ई. लूपस, सोरियेटिक अर्थराइटिस चर्म रोग सोरियसिस के कारण गठिया, गॉउट यूरिक एसिड के कारण गठिया, स्क्लेरोडरमा चमडी का केडापन, ठंड में अगुंलियों का सफेद व नीला होना, वेस्कुलाइटिस धमनियों में खून का रिसाव रू कना व गेंगरीन इत्यादि। 
      रूहमेटोइड अर्थराइटिस गठिया बाय के प्रारम्भिक लक्षण क्या होते है? 
      सुबह 30 मिनट से ज्यादा समय की जोड़ों में जकडऩ, एक से ज्यादा जोड़ों में सूजन रहना, खासतौर पर हाथों के जोड़, जोड़ों को दबाने पर जोड़ों में दर्द महसूस होना आदि रू हमेटोइड अर्थराइटिस गठिया बाय के प्रारम्भिक लक्षण हो सकते है। 
      रूहमेटोलॉजिस्ट गठिया रोग विशेषज्ञ कौन होते है? 
      जिस तरह से कैसर के लिए कैसर रोग विषेषज्ञ होते है, हृदय रोग के लिए हृदय रोग विषेषज्ञ होते है वैसे ही गम्भीर रू हमेटिज्म बीमारियों को प्रारम्भिक स्तर पर ही पहचान कर उपर्युक्त उपचार प्रदान कर बीमारी को जल्द से जल्द नियंत्रण के लिए रू हमेटोलॉजिस्ट गठिया रोग विशेषज्ञ विशे शिक्षित चिकित्सक होते है। समय पर एवं उपर्युक्त इलाज ना होने पर जोड़ों के विकृति होने की सम्भवना बढ़ जाती है। 
      क्या रूहमेटिज्म बाय बीमारियों के उपचार सम्भव है? 
      समाज में यह भ्रम देखा गया है कि गठिया बाय का कोइ उपचार नहीं है, जबकि यह गलत है। इलाज के लिए बीमारी रोकने के ताकत रखने वाली दवाईया उपलब्ध है। जिन्हें डिजिज मोडिफाइंग एन्टिरू हमेटिक डंग्स कहा जाता है। इन बीमारियों अर्थराइटिस ‘गठिया’ क्या है एवं कितने प्रकार की होती है? 
      जोड में सूजन, दर्द व जकडन को अर्थराइटिस गठिया कहा जाता है। अर्थराइटिस सामान्यतय: दो प्रकार की होती है। प्रथम ओस्टिायोअर्थराइटिस जिसमें बढती उम्र के साथ या किसी चोट के कारण एवं अत्यधिक दुरू पयोग से जोडों में अन्दर की मांसपेशियां का टूटना व मुलायम गद्दी की घिसावट का होनें के कारण जोड़ों में सूजन, दर्द और जकडऩ का होना।
      दूसरा रूहमेटिज्म बाय जिसमें 200 से अधिक विभिन्न प्रकार की गम्भीर ऑटोइम्यून बीमारियां होती है जिनसे जोड़ो में टेडापन होने व आन्तरिक अंगो पर दुष्प्रभाव पडऩें की सम्भवना होती है। विभिन्न महत्वपूर्ण आन्तरिक अंग जिन पे रू हमेटिज्म का दुष्प्रभाव पड़ सकता है वह है: हृदय, फेफडें, आंख, गुर्दा, चर्म आदि। सामान्यत: समाज में गठिया बाय रू हमेटोइड अर्थराइटिस सबसे व्यापक रू हमेटिज्म बीमारी है। 
      रूहमेटिज्म रोग से कौन-कौन प्रभावित हो सकते है? 
      बाय या रूहमेटिज्म आमतौर पर मध्यम आयु वर्ग, युवा व बच्चों का प्रभावित करती है। यद्यपि पुरू षों की तुलना में स्त्रियों में तीन गुना ज्यादा होने की सम्भावना होती है। बच्चों के रू हमेटिज्म को जुवेनाइल अर्थराइटिस के नाम से जाना जाता है। ओस्टियोअर्थराइटिस से बुजुर्ग ज्यादा प्रभावित होते है। घुटनें एवं कुल्हे के जोडों पर इसका ज्यादा प्रभाव पडता है। 
      ऑटोइम्यून बीमारी का क्या मतलब है? 
      ऑटोइम्यून बीमारी में शरीर का इम्यून सिस्टम प्रतिरोधक क्षमता, शरीर के अंगों के प्रति असंतुलित एवं आक्रामक हो जाता है जिससे शरीर के जोड, मांसपेशियां, हड्डी व महत्वपूर्ण आंतरिक अंगों को ही नुकसान पहुंचाने लगता है। 
      अर्थराइटिस होने के क्या क्या कारण हो सकते है? 
      घुटनें का दर्द या ओस्टयोअर्थराइटिस होने के सबसे बडें कारण- बढ़ती उम्र, बढता वजन मोटापा व जोड़ों का चोटिल होना। आनुवांशिकता, पर्यावरण प्रदुषण व धुम्रपान रू मेटिज्म बाय बीमारी के होने के सबसे बड़े कारण हो सकते है। 
      प्रमुख रूहमेटिज्म बाय बीमारियों के लक्षण एवं नाम क्या है? 
      रू हमेटॉइड अर्थराइटिस हाथ व पैरों के छोटे जोडों की गठिया, एन्काइलॉजिंग स्पोन्डिलाइटिस कमर की गठिया, एस.एल.ई. लूपस, सोरियेटिक अर्थराइटिस चर्म रोग सोरियसिस के कारण गठिया, गॉउट यूरिक एसिड के कारण गठिया, स्क्लेरोडरमा चमडी का केडापन, ठंड में अगुंलियों का सफेद व नीला होना, वेस्कुलाइटिस धमनियों में खून का रिसाव रू कना व गेंगरीन इत्यादि। 
      रूहमेटोइड अर्थराइटिस गठिया बाय के प्रारम्भिक लक्षण क्या होते है? 
      सुबह 30 मिनट से ज्यादा समय की जोड़ों में जकडऩ, एक से ज्यादा जोड़ों में सूजन रहना, खासतौर पर हाथों के जोड़, जोड़ों को दबाने पर जोड़ों में दर्द महसूस होना आदि रू हमेटोइड अर्थराइटिस गठिया बाय के प्रारम्भिक लक्षण हो सकते है। 
      रूहमेटोलॉजिस्ट गठिया रोग विशेषज्ञ कौन होते है? 
      जिस तरह से कैसर के लिए कैसर रोग विषेषज्ञ होते है, हृदय रोग के लिए हृदय रोग विषेषज्ञ होते है वैसे ही गम्भीर रू हमेटिज्म बीमारियों को प्रारम्भिक स्तर पर ही पहचान कर उपर्युक्त उपचार प्रदान कर बीमारी को जल्द से जल्द नियंत्रण के लिए रू हमेटोलॉजिस्ट गठिया रोग विशेषज्ञ विशे शिक्षित चिकित्सक होते है। समय पर एवं उपर्युक्त इलाज ना होने पर जोड़ों के विकृति होने की सम्भवना बढ़ जाती है। 
      क्या रूहमेटिज्म बाय बीमारियों के उपचार सम्भव है? 
      समाज में यह भ्रम देखा गया है कि गठिया बाय का कोइ उपचार नहीं है, जबकि यह गलत है। इलाज के लिए बीमारी रोकने के ताकत रखने वाली दवाईया उपलब्ध है। जिन्हें डिजिज मोडिफाइंग एन्टिरू हमेटिक ड्रग्स कहा जाता है। इन बीमारियों को दवाईयों के माध्यम से ही प्रारम्भिक स्तर पर ही नियंत्रण किया जा सकता है।
       

    Wednesday, 20 September 2017

    युवाओं में बढ़ता मानसिक तनाव

    मानव जीवन की भूमिका बचपन है तो वृद्धावस्था उपसंहार है। युवावस्था जीवन की सर्वाधिक मादक व ऊर्जावान अवस्था होती है। इस अवस्था में किसी किशोर या किशोरी को उचित अनुचित का भलीभांति ज्ञान नहीं हो पाता है और शनै: शनै: यह मानसिक तनाव का कारण बनता है। मानसिक तनाव का अर्थ है मन संबंधी द्वंद्व की स्थिति। आज का किशोर, युवावस्था में कदम रखते ही मानसिक तनाव से घिर जाता है। आंखों में सुनहरे सपने होते हैं, लेकिन जमाने की ठोकर उन सपनों को साकार होने से पूर्व ही तोड़ देती है। युवा बनना कुछ चाहते हैं पर कुछ पर विवश हो जाते हैं। यहीं से मानसिक तनाव की शुरुआत होती है।
    युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करके डॉक्टर, इंजीनियर बनकर धनोपार्जन कर सुख-सुविधा युक्त जीवन निर्वाह करना चाहते हैं, परंतु जब उनका उद्देश्य पूर्ण नहीं हो पाता तो उनका मन असंतुष्ट हो उठता है और मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है। शिक्षा से प्राप्त उपलब्धियां उन्हें निर्थक प्रतीत होती हैं।
    वर्तमान युग में लड़का हो या लड़की, सभी स्वावलंबी होना चाहते हैं, मगर बेरोजगारी की समस्या हर वर्ग के लिए अभिशाप सा बन चुकी है। मध्यम वर्ग के लिए तो यह स्थिति अत्यंत कष्टदायी होती है। जब इस प्रकार की स्थिति हो जाती है तो जीवन में आए तनाव से मुक्ति पाने के लिए वे आत्महत्या जैसे कदम उठाने को बाध्य हो जाते हैं। महिलाओं की स्थिति तो पुरुषों की तुलना में ज्यादा ही खतरनाक है।
    वर्ष 2012 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की तकरीबन 57 फीसद महिलाएं मानसिक विकारों की शिकार बनीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक आंकड़े पर गौर करें तो हम पाते हैं कि हर पांच में एक महिला और हर 12 में एक पुरुष मानसिक व्याधि का शिकार है। देश में लगभग 50 प्रतिशत लोग किसी न किसी गंभीर मानसिक विकार से जूझ रहे हैं। सामान्य मानसिक विकार के मामले में तो आंकड़ा और भी भयावह है। इनमें महिलाओं के आंकड़े सबसे अधिक हैं।
    हमारा पारिवारिक और सामाजिक ढांचा ही ऐसा है कि मानसिक अवसाद या तनाव को बीमारी नहीं माना जाता, जबकि अवसाद जैसी समस्या को स्वीकारना और उसका हल खोजना छुपाने वाली बात नहीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट की मानें तो भारत अवसाद के मरीजों के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में से शुमार है। यहां तकरीबन 36 फीसद लोग गंभीर अवसाद से ग्रस्त हैं।
    आमतौर पर माना जाता है कि गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और असफलता जैसी समस्याओं से जूझने वाले युवा अवसाद और तनाव झेलते हैं और इसके चलते आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लेते हैं। ऐसे में कुछ समय पहले आये एक सर्वे के परिणाम थोड़ा हैरान करने वाले हैं।
    इस शोध के मुताबिक, उत्तर भारत के बजाय दक्षिण भारत में आत्महत्या करने वाले युवाओं की संख्या अधिक है। आत्महत्या से होने वाली मौतों में 40 फीसद अकेले चार बड़े दक्षिणी राज्यों में होती है। यह बात किसी से छिपी ही नहीं है कि शिक्षा का प्रतिशत दक्षिण में उत्तर से कहीं ज्यादा है। वहां रोजगार के भी बेहतर विकल्प रहे हैं, बावजूद इसके यहां तनाव और अवसाद के चलते आत्महत्या जैसे समाचार सुर्खियां बनते हैं। इनमें बड़ा प्रतिशत ऐसे युवाओं का है जो सफल हैं, शिक्षित हैं और धन दौलत तो इस पीढ़ी ने उम्र से पहले ही बटोर ली है।
    मौजूदा दौर में समाज में आगे बढ़ने और सफल होने के जो मापदंड हैं, वे सिर्फ आर्थिक सफलता को ही सफलता मानते हैं। यह बात फिल्म से लेकर कारपोरेट वल्र्ड और सामान्य जन तक बर बराबर लागू होती है। पढ़ाई मोटी तनख्वाह वाली नौकरी पाने का जरिया भर बन कर रह गई। इस दौड़ में शामिल युवा परिवार व समाज से दूर होते जा रहे हैं। उनके जीवन में न रचनात्मकता बची है और न आपसी लगाव का कोई स्थान रहा है, परिणाम सामने है।
    आज जिस आयु वर्ग के युवा तनाव व अवसाद झेल रहे हैं, वे परिवार और समाज के सपोर्ट सिस्टम से दूर ही रहे हैं। इस पीढ़ी का लंबा समय घर से दूर पढ़ाई में बीतता है और नौकरी के लिए भी उन्हें परिवार से दूर रहना पड़ता है। युवा घर से दूर रहकर करियर के शिखर पर तो पहुंच जाते हैं, पर मन और जीवन दोनों सूनापन लिए होता है।
    उम्र के इस पड़ाव पर उनके पास भौतिक स्तर पर सब कुछ पा लेने का सुख तो है पर कुछ छूट जाने की टीस भी है। कभी-कभी यही अवसाद और अकेलापन असहनीय हो जाता है तो वे जाने-अनजाने जीवन के अंत की राह चुन लेते हैं या बीमारी में इतना घिर जाते हैं कि सुध-बुध खो जाती है। अवसाद के बढ़ते आंकड़े सोचने को विवश करते हैं कि क्या यह पीढ़ी इतना आगे बढ़ गयी है कि जीवन पीछे छूट गया है?
    अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका लांसेट का सर्वे कहता है कि भारत में आत्महत्या युवाओं की मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। आत्महत्या जैसा कदम उठाने की सबसे बड़ी वजह है अवसाद है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2020 तक मौत का सबसे बड़ा कारण अपंगता व अवसाद होगा। जिस युवा पीढ़ी के भरोसे भारत वैश्विक शक्ति बनने की आशाएं संजोए है, उसका यूं उलझना समाज व राष्ट्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा।
    इन मानसिक तनाव से मुक्ति का सबसे महत्वपूर्ण उपाय उसका अपना विवेक है। संस्कारवान शिक्षा दीक्षा तथा नैतिकता के माध्यम से उसका रास्ता प्रशस्त होता है। इसके लिए दृढ़संकल्प, अदम्य साहस, अथक परिश्रम, धैर्य, यथार्थ को ज्ञान, सहनशीलता और सबसे अधिक स्वावलंबन, आत्म निर्णय एवं आत्मविश्वास की भी आवश्यकता होती है। यह जीवन एक साधना है। इसे आप एक नियमित दिनचर्या बनाकर, एक उद्देश्य को सामने रख कर जिएं। अपने अंदर अच्छे गुण पैदा करें। पुण्य कार्य करें।
    धर्म के रास्ते पर चलते हुए अपने दुख के दिनों को धीरज के रास्ते बीतते हुए देखें। जीवन अवधि, सुख-दुख, धन, विद्या मनुष्य के जन्म से पहले ही निश्चित होता है। इसलिए न तो इनके बारे में चिंता करनी चाहिए और न भटकना चाहिए। फिर भी सब कुछ भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ देना चाहिए।
    ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ को ध्यान में रखते हुए सदा कर्म करते रहना चाहिए। परेशानियों को हमेशा सबक की तरह लें, प्रकृति आपको सिखाना चाहती है। परीक्षा लेती है। कितने खरे उतरते हो। इस रोल के लिए आपको चुना गया है। आप चाहें तो टूटकर बिखर जाएं, आप चाहें तो निखर जाएं। अपनी ऊर्जा को सही दिशा दें। जब आप इस अहसास से भरे होंगे कि आपके आस-पास इतने सारे लोग, सब उस सर्व-शक्तिमान के अंश हैं, सिर्फ शरीर रूपी आवरण की वजह से भटके हुए हैं। तब आप किसी के साथ अन्याय नहीं कर पायेंगे।
    मन की नकेल अपने हाथ रखिए, चिंता और डर को हावी न होने दें। भाव और बुद्धि का सामंजस्य बिठाते हुए चलें। भाव के बिना सब नीरस है, बुद्धि के बिना सब आफत है। जो छूट गया है, जिसका आप दुख मना रहे हैं, चाहे वह महत्वाकांक्षाएं थीं या इच्छाएं, सुख-सुविधाएं या बड़े प्रिय अपने या मान-सम्मान या फिर सपने; वह तो महज बैसाखियां थीं जो आपने अपने जीने के लिए सहारे या कहिये बहाने की तरह खोज लिए थे।
    आप अपने सहारे या अपने नूर के साथ चले ही कहां? आपने अपनी दुनिया भी इतनी सीमित कर ली थी, जरा अपनी दुनिया का दायरा बड़ा कीजिए, दूसरों का दुख नजर आएगा तो अपना दुख छोटा नजर आएगा। सकारात्मक चिंतन ही सही दिशा दे सकता है। जिंदगी एक तपस्या है, जीवन को साधकर एक साधक की तरह जिएं। ।

    Tuesday, 19 September 2017

    कलौंजी – मौत को छोड़कर बड़ी से बड़ी बीमारी का इलाज कर सकती है

    कलयुग में धरती पर संजीवनी है कलौंजी, अनगिनत रोगों को चुटकियों में ठीक करता है
    कलौंजी का इतिहास बहुत पुराना है। सदियों से कलौंजी का प्रयोग एशिया, उत्तरी अफ्रीका और अरब देशों में मसाले व दवा के रूप में होता आया है। आयुर्वेद और पुराने इसाई ग्रंथों में इसका वर्णन है। ईस्टन के बाइबल शब्दकोश में हेब्र्यू शब्द का मतलब कलौंजी लिखा गया है। पहली शताब्दी में दीस्कोरेडीज नामक यूनानी चिकित्सक कलौंजी से जुकाम, सरदर्द और पेट के कीड़ों का उपचार करते थे। उन्होंने इसे दुग्ध वर्धक और मूत्र वर्धक के रूप में भी प्रयोग किया। रोम में इसे 'पेनासिया’ यानी हर मर्ज की रामबाण दवा माना जाता है।कलौंजी के बीजों का सीधा सेवन किया जा सकता है।एक छोटा चम्मच कलौंजी को शहद में मिश्रित करके इसका सेवन कर सकते हैं।पानी में कलौंजी उबालकर छान लें और इसे पीएं।दूध में कलौंजी उबालें। ठंडा होने दें फिर इस मिश्रण को पीएं।कलौंजी को ग्राइंड करें तथा पानी तथा दूध के साथ इसका सेवन करें।कलौंजी को ब्रैड, पनीर तथा पेस्ट्रियों पर छिड़क कर इसका सेवन करें ! 
    रोगो मे सहायक -----
    टाइप-2 डायबिटीज--प्रतिदिन 2 ग्राम कलौंजी के सेवन के परिणामस्वरूप तेज हो रहा ग्लूकोज कम होता है। इंसुलिन रैजिस्टैंस घटती है,बीटा सैल की कार्यप्रणाली में वृद्धि होती है तथा ग्लाइकोसिलेटिड हीमोग्लोबिन में कमी आती है।

    क्रम रोग का नामउपचार
    1कैंसरकैंसर के उपचार में कलौंजी के तेल की आधी बड़ी चम्मच को एक गिलास अंगूर के रस में मिलाकर दिन में तीन बार लें। लहसुन भी खुब खाएं। 2 किलो गेहूँ और 1 किलो जौ के मिश्रित आटे की रोटी 40 दिन तक खिलाएं। आलू, अरबी और बैंगन से परहेज़ करें।
    2खाँसी व दमाछाती और पीठ पर कलौंजी के तेल की मालिश करें, तीन बड़ी चम्मच तेल रोज पीयें और पानी में तेल डाल कर उसकी भाप लें।
    3अवसाद और सुस्तीएक गिलास संतरे के रस में एक बड़ी चम्मच तेल डाल कर 10 दिन तक सेवन करें। आप को बहुत फर्क महसूस होगा।
    4स्मरणशक्ति और मानसिक चेतनाएक छोटी चम्मच तेल 100 ग्राम उबले हुए पुदीने के साथ सेवन करें।
    5मधुमेहएक कप कलौंजी के बीज, एक कप राई, आधा कप अनार के छिलके और आधा कप पितपाप्र को पीस कर चूर्ण बना लें। आधी छोटी चम्मच कलौंजी के तेल के साथ रोज नाश्ते के पहले एक महीने तक लें।
    6गुर्दे की पथरी और मूत्राशय की पथरीपाव भर कलौंजी को महीन पीस कर पाव भर शहद में अच्छी तरह मिला कर रख दें। इस मिश्रण की दो बड़ी चम्मच को एक कप गर्म पानी में एक छोटी चम्मच तेल के साथ अच्छी तरह मिला कर रोज नाश्ते के पहले पियें।
    7उल्टी और उबकाईएक छोटी चम्मच कार्नेशन और एक बड़ी चम्मच तेल को उबले पुदीने के साथ दिन में तीन बार लें।
    8हृदय रोग, रक्त चाप और हृदय की धमनियों का अवरोधजब भी कोई गर्म पेय लें, उसमें एक छोटी चम्मच तेल मिला कर लें, रोज सुबह लहसुन की दो कलियां नाश्ते के पहले लें और तीन दिन में एक बार पूरे शरीर पर तेल की मालिश करके आधा घंटा धूप का सेवन करें। यह उपचार एक महीने तक लें।
    9सफेद दाग और कुष्ठ रोग15 दिन तक रोज पहले सेब का सिरका मलें, फिर कलौंजी का तेल मलें।
    10कमर दर्द और गठियाहल्का गर्म करके जहां दर्द हो वहां मालिश करें और एक बड़ी चम्मच तेल दिन में तीन बार लें। 15 दिन में बहुत आराम मिलेगा।
    11सिर दर्दमाथे और सिर के दोनों तरफ कनपटी के आस-पास कलौंजी का तेल लगायें और नाश्ते के पहले एक चम्मच तेल तीन बार लें कुछ सप्ताह बाद सर दर्द पूर्णतः खत्म हो जायेगा।
    12अम्लता और आमाशय शोथएक बड़ी चम्मच कलौंजी का तेल एक प्याला दूध में मिलाकर रोज पांच दिन तक सेवन करने से आमाशय की सब तकलीफें दूर हो जाती है।
    13बाल झड़नाबालों में नीबू का रस अच्छी तरह लगाये, 15 मिनट बाद बालों को शैंपू कर लें व अच्छी तरह धोकर सुखा लें, सूखे बालों में कलौंजी का तेल लगायें एक सप्ताह के उपचार के बाद बालों का झड़ना बन्द हो जायेगा।
    14नेत्र रोग और कमजोर नजररोज सोने के पहले पलकों ओर आँखो के आस-पास कलौंजी का तेल लगायें और एक बड़ी चम्मच तेल को एक प्याला गाजर के रस के साथ एक महीने तक लें।
    15दस्त या पेचिशएक बड़ी चम्मच कलौंजी के तेल को एक चम्मच दही के साथ दिन में तीन बार लें दस्त ठीक हो जायेगा।
    16रूसी10 ग्राम कलौंजी का तेल, 30 ग्राम जैतून का तेल और 30 ग्राम पिसी मेहंदी को मिला कर गर्म करें। ठंडा होने पर बालों में लगाएं और एक घंटे बाद बालों को धो कर शैंपू कर लें।
    17मानसिक तनावएक चाय की प्याली में एक बड़ी चम्मच कलौंजी का तेल डाल कर लेने से मन शांत हो जाता है और तनाव के सारे लक्षण ठीक हो जाते हैं।
    18स्त्री गुप्त रोगस्त्रियों के रोगों जैसे श्वेत प्रदर, रक्त प्रदर, प्रसवोपरांत दुर्बलता व रक्त स्त्राव आदि के लिए कलौंजी गुणकारी है। थोड़े से पुदीने की पत्तियों को दो गिलास पानी में डाल कर उबालें, आधा चम्मच कलौंजी का तेल डाल कर दिन में दो बार पियें। बैंगन, आचार, अंडा और मछली से परहेज रखें।
    19पुरूष गुप्त रोगस्वप्नदोष, स्तंभन दोष, पुरुषहीनता आदि रोगों में एक प्याला सेब के रस में आधी छोटी चम्मच तेल मिला कर दिन में दो बार 21 दिन तक पियें। थोड़ा सा तेल गुप्तांग पर रोज मलें। तेज मसालेदार चीजों से परहेज करें।

    गेहूँ के ज्वारे उगाने की की विधि

    इस लिंक को क्लिक करे गेहु के ज्वारे का फायदा ... 


    उगाने की की विधि--घर पर गेहूँ के ज्वारे बनाना के लिए इन चीजों की आवश्यकता होगी।

    आवश्यक सामान------

    1-अच्छी किस्म के जैविक गेहूँ के बीज।

    2-अच्छी उपजाऊ मिट्टी और उम्दा जैविक या गोबर की खाद।

    3-मिट्टी के 10-12” व्यास के 3-4” गहरे सात गोलाकार गमले जिसमें भी नीचे छेद हों। आप अच्छे प्लास्टिक की 20”x10”x2” नाप की गार्डनिंग ट्रे, जिसमें नीचे कुछ छेद हो, भी ले सकते है। गेहूँ भिगोने के लिए कोई पात्र या जग।

    4-मिक्सी या ज्यूसर।5-पानी देने के लिए स्प्रे-बोटल या पौधों को पानी पिलाने वाला झारा व कैंची।

    विधि----

    1- हमेशा जैविक बीज ही काम में लें, ताकि आपको हमेशा मधुर व उत्कृष्ट रस प्राप्त हो जो विटामिन और खनिज से भरपूर हो। रात को सोते समय लगभग 100 ग्राम गेहूँ एक जग में भिगो कर रख दें।

    2- सभी गमलों के छेद को एक पतले पत्थर के टुकड़े से ढक दें। अब मिट्टी और खाद को अच्छी तरह मिलाएं। गमलों में मिटटी की डेढ़ दो इंच मोटी परत बिछा दें और पानी छिड़क दें। ध्यान रहे मिट्टी में रासायनिक खाद या कीटनाषक के अवशेष न हों और हमेशा जैविक खाद का ही उपयोग करें। पहले गमले पर रविवार, दूसरे गमले पर सोमवार, इस प्रकार सातों गमलो पर सातों दिनों के नाम लिख दें।

    3- अगले दिन गेहुंओं को धोकर निथार लें। मानलो आज रविवार है तो उस गमले में, जिस पर आपने रविवार लिखा था, गेहूँ एक परत के रूप में बिछा दें। गेहुंओं के ऊपर थोड़ी मिट्टी डाल दें और पानी से सींच दें। गमले को किसी छायादार स्थान जैसे बरामदे या खिड़की के पास रख दें, जहां पर्याप्त हवा और प्रकाश आता हो पर धूप की सीधी किरणे गमलों पर नहीं पड़ती हो। अगले दिन सोमवार वाले गमले में गेहूँ बो दीजिये और इस तरह रोज एक गमले में गेहूँ बोते रहें।

    4- गमलों में रोजाना कम से कम दो बार पानी दें ताकि मिट्टी नम और हल्की गीली बनी रहे। शुरू के दो-तीन दिन गमलों को गीले अखबार से भी ढक सकते हैं। जब गैहूँ के ज्वारे एक इंच से बड़े हो जाये तो एक बार ही पानी देना प्रयाप्त रहता है। पानी देने के लिए स्प्रे बोटल का प्रयोग करे। गर्मी के मौसम में ज्यादा पानी की आवश्यकता रहती है। पर हमेशा ध्यान रखे कि मिट्टी नम और गीली बनी रहे और पानी की मात्रा ज्यादा भी न हो।

    5- सात दिन बाद 5-6 पत्तियों वाला 6-8 इन्च लम्बा ज्वारा निकल आयेगा। इस ज्वारे को जड़ सहित उखाड़ ले और पानी से अच्छी तरह धो लीजिए। इस तरह आप रोज एक गमले से ज्वारे तोड़ते जाइये और रोज एक गमले में ज्वारे बोते भी जाइये ताकि आपको निरन्तर ज्वारे मिलते रहे।

    6- अब धुले हुए ज्वारों की जड़ काट कर अलग कर दें तथा मिक्सी के छोटे जार में थोड़ा पानी डालकर पीस लें और चलनी से गिलास में छानकर प्रयोग करे। ज्वारों के बचे हुए गुदे को आप त्वचा पर निखार लाने के लिए मल सकते हैं। आप हाथ से घुमाने वाले ज्यूसर से भी ज्यूस निकाल सकते हैं।

    सेवन का तरीका----ज्वारे का रस सामान्यतः 60-120 एमएल प्रति दिन या प्रति दूसरे दिन खाली पेट सेवन करना चाहिये। यदि आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं तो 30-60 एमएल रस दिन मे तीन चार बार तक ले सकते हैं। इसे आप सप्ताह में 5 दिन सेवन करें। कुछ लोगों को शुरू में रस पीने से उबकाई सी आती है, तो कम मात्रा से शुरू करें और धीरे-धीरे मात्रा बढ़ायें। ज्वारे के रस में फलों और सब्जियों के रस जैसे सेब फल, अन्नानास आदि के रस को मिलाया जा सकता है। हां इसे कभी भी खट्टे रसों जैसे नीबू, संतरा आदि के रस में नहीं मिलाएं क्योंकि खटाई ज्वारे के रस में विद्यमान एंजाइम्स को निष्क्रिय कर देती है। इसमें नमक, चीनी या कोई अन्य मसाला भी नहीं मिलाना चाहिये। ज्वारे के रस की 120 एम एल मात्रा बड़ी उपयुक्त मात्रा है और एक सप्ताह में इसके परिणाम दिखने लगते हैं। डॉ॰ एन विग्मोर ज्वारे के रस के साथ अपक्व आहार लेने की सलाह भी देती थी।गेहूँ के ज्वारे चबाने से गले की खारिश और मुंह की दुर्गंध दूर होती है। इसके रस के गरारे करने से दांत और मसूड़ों के इन्फेक्शन में लाभ मिलता है। स्त्रियों को ज्वारे के रस का डूश लेने से मूत्राशय और योनि के इन्फेक्शन, दुर्गंध और खुजली में भी आराम मिलता है। त्वचा पर ज्वारे का रस लगाने से त्वचा का ढीलापन कम होता है और त्वचा में चमक आती है।


    गेहूँ के ज्वारे... शरीर के लिए अमृत केन्सर जेसी असाध्य बीमारी से भी मुक्त हो सकते है

    प्राचीन काल से ही हिन्दुस्तान के चिकित्सक गेहूँ के ज्वारों को विभिन्न रोगों जैसे अस्थि-संध शोथ, कैंसर, त्वचा रोग, मोटापा, डायबिटीज आदि के उपचार में प्रयोग कर रहे हैं। हमारे कई त्योहारों पर गेहूँ के ज्वारों को उगाने, पूजा करने के रिवाज सदियों से चले आ रहे हैं। जब गेहूं के बीज को अच्छी उपजाऊ जमीन में बोया जाता है तो कुछ ही दिनों में वह अंकुरित होकर बढ़ने लगता है और उसमें पत्तियां निकलने लगती है। जब यह अंकुरण पांच-छह पत्तों का हो जाता है तो अंकुरित बीज का यह भाग गेहूं का ज्वारा कहलाता है। औषधीय विज्ञान में गेहूं का यह ज्वारा काफी उपयोगी सिद्ध हुआ है। गेहूं के ज्वारे का रस कैंसर जैसे कई रोगों से लड़ने की क्षमता रखता है।
    प्रकृति ने हमें स्वस्थ, ऊर्जावान, निरोगी और आयुष्मान रहने के लिए हमें अनेक प्रकार के पौष्टिक फल, फूल, मेवे, तरकारियां, जड़ी-बूटियां, मसाले, शहद और अन्य खाद्यान्न दिये हैं। ऐसा ही एक संजीवनी का बूटा है गेहूँ का ज्वारा। इसका वानस्पतिक नाम “ट्रिटिकम वेस्टिकम” है। डॉ॰ एन विग्मोर ज्वारे के रस को “हरित रक्त” कहती है। इसे गेहूँ का ज्वारा या घास कहना ठीक नहीं होगा। यह वास्तव में अंकुरित गेहूँ है।
    गेहूँ का ज्वारा एक सजीव, सुपाच्य, पौष्टिक और संपूर्ण आहार है। इसमें भरपूर क्लोरोफिल, किण्वक (एंजाइम्स), अमाइनो एसिड्स, शर्करा, वसा, विटामिन और खनिज होते हैं। क्लोरोफिल सूर्यप्रकाश का पहला उत्पाद है अतः इसमें सबसे ज्यादा सूर्य की ऊर्जा  और भरपूर ऑक्सीजन भी होती है ! 
    पोषक तत्व -- गेहूँ के ज्वारे क्लोरोफिल का सर्वश्रेष्ठ स्रोत हैं। इसमें सभी विटामिन्स प्रचुर मात्रा में होते हैं जैसे विटामिन ए, बी1, 2, 3, 5, 6, 8, 12 और 17 (लेट्रियल); सी, ई तथा के। इसमें केल्शियम, मेग्नीशियम, आयोडीन, सेलेनियम, लौह, जिंक और अन्य कई खनिज होते हैं। लेट्रियल या विटामिन बी-17 बलवान कैंसररोधी है और मेक्सिको के ओएसिस ऑफ होप चिकित्सालय में पिछले पचास वर्ष से लेट्रियल के इंजेक्शन, गोलियों और आहार चिकित्सा से कैंसर के रोगियों का उपचार होता आ रहा है।
    पश्चिमी देशों में गेहूँ के ज्वारों से उपचार की पद्धति डॉ॰ एन. विग्मोर ने प्रारम्भ की थी। बचपन में उनकी दादी प्रथम विश्व युद्ध में घायल हुए जवानों का उपचार जड़ी-बूटियों, पैड़-पौधों और विभिन्न प्रकार की घासों से किया करती थी। तभी से उन्होंने जड़ी-बूटियों और विभिन्न घास के रस द्वारा बीमारियों के उपचार और अनुसंधान करना अपना शौक बना लिया। 50 वर्ष की उम्र में डॉ॰ एन. विग्मोर को आंत में कैंसर हो गया था। जिसके लिए उन्होंने गेहूँ के ज्वारों का रस और अपक्व आहार लिया और प्रसन्नता की बात थी कि एक वर्ष में वे कैंसर मुक्त हो गई। उन्होंने बोस्टन में एन विगमोर इन्स्टिट्यूट खोला जो आज भी काम कर रहा है। तब से लेकर अपनी मृत्यु तक वह गेहूँ के ज्वारे और अपक्व आहार द्वारा रोगियों का उपचार करती रही। उन्होंने इस विषय पर 35 पुस्तकें भी लिखी हैं ! 

    गेहूँ के ज्वारे का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है क्लोरोफिल। यह क्लोरोप्लास्ट नामक विशेष प्रकार के कोषों में होता है। क्लोरोप्लास्ट सूर्यकिरणों की सहायता से पोषक तत्वों का निर्माण करते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक डॉ॰ बर्शर क्लोरोफिल को “संकेन्द्रित सूर्यशक्ति” कहते हैं। वैसे तो हरे रंग की सभी वनस्पतियों में क्लोरोफिल होता है, किंतु गेहूँ के ज्वारे का क्लोरोफिल श्रेष्ट है, क्योंकि क्लोरोफिल के अलावा इनमें 100 अन्य पौष्टिक तत्व भी होते हैं।  सभी जानते हैं कि मानव रक्त में हीमोग्लोबिन होता है। इस हीमोग्लोबिन में एक लाल रंग का द्रव्य होता है जिसे हीम कहते हैं। हीम और क्लोरोफिल की रासायनिक संरचना में बहुत समानता होती है। दोनों में कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के परमाणुओं की संख्या तथा उनका विन्यास लगभग एक जैसा होता है। हीम और क्लोरोफिल की संरचना में केवल एक ही अंतर है, क्लोरोफिल के केन्द्र स्थान में मेग्नीशियम होता है, जबकि हीमोग्लोबिन के केन्द्र स्थान में लौहा होता है।
    हमारा रक्त हल्का क्षारीय है और उसका हाइड्रोजन अणु गुणांक pH 7.4 है। ज्वारे का रस भी हल्का क्षारीय है और उसका pH भी 7.4 है। इसलिए ज्वारे का रस शीघ्रता से रक्त में अवशोषित हो जाता है और शरीर के उपयोग में आने लगता है। गेहूँ के ज्वारे से मानव को संपूर्ण पोषण मिल जाता है। सावधानी पूर्वक चुनी हुई 23 किलो तरकारियों जितना पोषण 1 किलो गेहूँ के ज्वारे के रस से प्राप्त हो जाता है। सिर्फ ज्वारे का रस पीकर मानव पूरा जीवन बिता सकता है। 100 ग्राम ताजा रस में 90-100 मि.ग्राम क्लोरोफिल प्राप्त हो जाता है।
    क्लोरोफिल से हमें मेग्नीशियम प्राप्त होता है। हमारी प्रत्येक कोशिका में मेग्नीशियम सूक्ष्म मात्रा में होता है। परंतु यह शरीर के लिए है बहुत महत्वपूर्ण। संपूर्ण शरीर में लगभग 50 ग्राम मेग्नीशियम होता है। मेग्नीशियम हमारी अस्थियों के निर्माण के लिए आवश्यक खनिज है। यह नाड़ियों और मांसपेशियों को तनाव रहित अवस्था में रखता है। शरीर में कैल्शियम और विटामिन सी का संचालन, नाड़िओं और मांसपेशियों की उपयुक्त कार्यशीलता के लिये मैग्नेशियम आवश्यक है। कैल्शियम-मैग्नेशियम सन्तुलन में गड़बड़ी आने से स्नायु-तंत्र दुर्बल हो सकता है। मैग्नेशियम शरीर के भीतर लगभग तीन सौ ऍन्जाइम्स की सक्रियता के लिए आवश्यक है। मैग्नेशियम के निम्न स्तरों और उच्च रक्तचाप तथा मधुमेह में स्पष्ट अंतर्संबंध स्थापित हो चुका है। व्यायाम एवं शारीरिक मेहनत करने वाले लोगों को मैग्नेशियम सम्पूरकों की आवश्यकता है। मैग्नेशियम की कमी से महिलाओं में कई समस्याएं दिखाई देती हैं, जैसे पाँवों की मांसपेशियाँ कमजोर होना (जिससे रेस्टलेस लेग सिंड्रोम होता है), पाँवों में बिवाइयां फटना, पेट की गड़बड़ी, एकाग्रता में कमी, रजोनिवृत्ति संबंधी समस्याओं का बढ़ना, मासिक-धर्म पूर्व के तनाव में वृद्धि आदि।
    क्लोरोफिल से लाभ----- 
    क्लोरोफिल हमें तीन प्रकार से लाभ देता है।
    1. शोधन – घावों के लिए क्लोरोफिल अत्यंत प्रबल कीटाणुनाशक है। यह फंगसरोधी भी है और शरीर से टॉक्सिन्स को विसर्जन करता है।। यह कई रोग पैदा करने वाले जीवाणु को नष्ट करता है और उनके विकास को बाधित करता है। यकृत का शोधन करता है।
    2. एंटी-इन्फ्लेमेट्री – यह शरीर में इन्फ्लेमेशन को कम करता हैं। अतः आर्थ्राइटिस, आमाशय शोथ, आंत्र शोथ, गले की ख़राश आदि में अत्यंत लाभदायक हैं।
    3. पोषण – यह रक्त बनाता है, आंतों के लाभप्रद कीटाणुओं को भी पोषण देते हैं।   
    4. कैंसर गेहूँ के ज्वारे कैंसर पर कैसे असर दिखाते है???
      ऑक्सीजन को अनुसंधानकर्ता कैंसर कोशिकाओं को नेस्तनाबूत करने वाली 7.62x39 मि.मी. केलीबर की वो गोली मानते हैं, जो गेहूँ के ज्वारे रूपी ए.के. 47 बंदूक से निकल कर कैंसर कोशिकाओं को चुन-चुन कर मारती है। सर्व प्रथम तो इसमें भरपूर क्लोरोफिल होता है, जो शरीर को ऑक्सीजन से सराबोर कर देता है। क्लोरोफिल शरीर में हीमोग्लोबिन का निर्माण करता है, मतलब कैंसर कोशिकाओं को ज्यादा ऑक्सीजन मिलती है और ऑक्सीजन की उपस्थिति में कैंसर का दम घुटने कगता है।
      गेहूँ का ज्वारों में विटामिन बी-17 या लेट्रियल और सेलेनियम दोनों होते हैं। ये दोनों ही शक्तिशाली कैंसररोधी है। क्लोरोफिल और सेलेनियम शरीर की रक्षा प्रणाली को शक्तिशाली बनाते हैं। गेहूँ का ज्वारा भी रक्त के समान हल्का क्षारीय द्रव्य है। कैंसर अम्लीय माध्यम में ही फलता फूलता है।
      गेहूँ का ज्वारा में विटा-12 को मिला कर 13 विटामिन, कई खनिज जैसे सेलेनियम और 20 अमाइनो एसिड्स होते है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट किण्वक सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज और अन्य 30 किण्वक भी होते हैं। एस ओ डी सबसे खतरनाक फ्री-रेडिकल रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पिसीज को हाइड्रोजन परऑक्साइड (जिसमें कैंसर कोशिका का सफाया करने के लिए एक अतिरिक्त ऑक्सीजन का अणु होता है) और ऑक्सीजन के अणु में बदल देता है।
      सन् 1938 में महान अनुसंधानकर्ता डॉ॰ पॉल गेरहार्ड सीजर, एम.डी. ने बताया था कि कैंसर का वास्तविक कारण श्वसन क्रिया में सहायक एंजाइम साइटोक्रोम ऑक्सीडेज का नष्ट होना है। सरल शब्दों में जब कोशिका में ऑक्सीजन उपलब्ध न हो या सामान्य श्वसन क्रिया बाधित हो जाये तभी कैंसर जन्म लेता है। ज्वारों में एक हार्मोन एब्सीसिक एसिड (ए बी ए) होता है जो हमें अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है। डॉ॰ लिविंग्स्टन व्हीलर के अनुसार एब्सीसिक एसिड कोरियोनिक गोनेडोट्रोपिन हार्मोन को निष्क्रिय करता है और वे ए बी ए को कैंसर उपचार का महत्वपूर्ण पूरक तत्व मानती थी। डॉ॰ लिविंग्स्टन ने पता लगाया था कि कैंसर कोशिका कोरियोनिक गोनेडोट्रोपिन से मिलता जुलता हार्मोन बनाती हैं। उन्होंने यह भी पता लगाया था कि गेहूँ के ज्वारे को काटने के 4 घंटे बाद उसमें ए बी ए की मात्रा 40 गुना ज्यादा होती है। अतः उनके मतानुसार ज्वारे के रस को थोड़ा सा तुरंत और बचा हुआ 4 घंटे बाद पीना चाहिये।
      2- गेहूँ के ज्वारे में अन्य हरी तरकारियों की तरह IQ ऑक्सीजन होती है। मस्तिष्क और संपूर्ण शरीर ऊर्जावान तथा स्वस्थ रखने के लिए भरपूर ऑक्सीजन आवश्यक है।
      3- डॉ॰ बरनार्ड जेन्सन के अनुसार गेहूँ के ज्वारे का रस कुछ ही मिनटों में पच जाता है और इसके पाचन में बहुत कम ऊर्जा खर्च होती है।
      4- यह कीटाणुरोधी हैं, उन्हें नष्ट करता है और उनके विकास को बाधित करता है।
      5- यह शरीर से हानिकारक पदार्थों (टॉक्सिन्स), भारी धातुओं और शरीर में जमा दवाओं के अवशेष का विसर्जन करता है।
      6- यदि इसका सेवन 7-8 महीने तक किया जाये तो यह मुहाँसों और उनसे बने दाग, धब्बे और झाइयां सब साफ हो जाते हैं।
      7- यह त्वचा के लिए प्राकृतिक साबुन का कार्य करता हैं और शरीर को दुर्गंध रहित रखता है।
      8- यह दांतों को सड़न से बचाते है।
      9- यदि 5 मिनिट तक गेहूँ के ज्वारे का रस मुंह में तो दांत का दर्द ठीक करता है।
      10- इसके गरारे करने से गले की खारिश ठीक हो जाती है।
      11- गेहूँ के ज्वारे का रस नियमित पीने से एग्जीमा और सोरायसिस भी ठीक हो जाते हैं।
      12- ज्वारे का रस पीने से बाल समय से पहले सफेद नहीं होते हैं।
      13- ज्वारे का रस पीने से शरीर स्वस्थ, ऊर्जावान, सहनशील, आध्यात्मिक और प्रसन्नचित्त बना रहता है।
      14- यह पाचन शक्ति को बढ़ाता है।
      15- यह समस्त रक्त संबन्धी रोगों के लिए रामबाण औषधि है।
      16- ज्वारे का रस का एनीमा लेने से आंतों और पेट के अंगों का शोधन होता है।
      17- यह कब्जी ठीक करता है।
      18- यह उच्च रक्तचाप कम करता है और केशिकाओं (Fine blood vessels or capillaries) का विस्तारण करता है।
      19- यह स्थूलता या मोटापा कम करता है क्यों कि यह भूख कम करता है, बुनियादी चयापचय दर और शरीर में रक्त के संचार को बढ़ाता है।......  गेहु के ज्वारे आप घर पर भी उगाकर नित्य सेवन कर सकते है ॥  गेहु के ज्वारे उगाने की विधी जानने के लिए इस लिंक पर जाए 

    Monday, 18 September 2017

    आँख की पलक पर गुहेरी ( फुंसी )

    गुहेरी या होर्डेओलम (stye or hordeolum) या अंजनी एक छोटा, छूने पर दर्द करने वाला उभार है जो पलक पर विकसित होती है और इसके कारण सूजन आ जाती है | गुहेरी पीड़ादायक और कुरूप हो सकती है लेकिन सामान्यतः ये गंभीर नहीं होतीं और घर पर प्रभावशाली रूप से उपचारित की जा सकती हैं | अगर घर पर की जाने वाली विधियों जैसे ऑइंटमेंट या गर्म सेक से कोई लाभ न हो तो चिकित्सीय मदद की आवश्यकता हो सकती है | अगर गुहेरी के कारण आपकी दृष्टी में कोई परिवर्तन होता है या आपको उस समय चेहरे या आँख पर कोई चोट लगी हो तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ या नजदीकी आपातकाल कक्ष में जाएँ 
    अपनी पलक पर एक छूने पर दर्द करने वाले लाल उभार को देखें: गुहेरी मुंहासों के समान ही होती है जो पलक पर होते हैं | गुहेरी अक्सर स्किन की सतह पर रहने वाले बैक्टीरिया (सामान्यतः स्टेफ़ायलोकोकस या “स्टेफ” बैक्टीरिया) के कारण आँख में या आँख के पास संक्रमण उत्पन्न करने से होती है | सामान्यतः आप गुहेरी के रूप को देखकर उसकी पहचान कर सकते हैं-यह पलक पर छूने पर दर्द करने वाले लाल उभार होते हैं जो एक छोटे पस से भरे केंद्र को विकसित कर सकते हैं |गुहेरी पलक के अंदर की ओर बनती है और अंदर या बाहर की ओर बढती है | बाहरी गुहेरी में ज़ीस या मोल ग्लैंड्स शामिल होती हैं | आंतरिक गुहेरी में मिबोमियन ग्लैंड (meibomian gland) शामिल होती है और यह अंदर की ओर बढती है | एक आंतरिक गुहेरी सिर्फ एक संक्रमित चेलेज़ियन (chalazian) या पलकों की गिल्टी या ग्रंथि है 
    गुहेरी को पहचानना सीखें: गुहेरी को पहचानने में चेलेजियन के साथ भ्रम हो सकता है जो आँख के पास एक उभार के रूप में दिखती है | गुहेरी और चेलेज़ियन दोनों का इलाज़ एक समान है इसलिए अगर आप इसे अलग से नहीं बता पाते तो कोई चिंता की बात नहीं है |एक गुहेरी या होर्डेओलम बैक्टीरिया के संक्रमण के कारण होती है | ये लाल उभार एक मुहांसे के समान अक्सर पस से भर जाते हैं | गुहेरी के कारण पलक में दर्द और सूजन होती है ”चेलेजियन” एक सिस्ट या तरल पदार्थ से भरी हुई थैली है जो छोटी तेल ग्रंथियों (मेबोमियन ग्लैंड्स) में विकसित होती है | ये अधिकतर पलक के अंदर की साइड पायी जाती हैं परन्तु ये दर्दरहित होती हैं | ”ब्लेफेराइटिस (Blepharitis) या वर्त्मशोध” पलक की सूजन होती है | इसके कई कारण होते हैं जिनमे संक्रमण, एलर्जी और अनुपचारित चेलेज़ियन आते हैं | ब्लेफेराइटिस (blepharitis) आपकी पलकों के किनारों को लाल और सूजनयुक्त बना देती है | आपकी पलकें खुजलीयुक्त, परतदार और कठिनाई से खुलने वाली हो सकती हैं 
    सूजन देखें: सामान्यतः गुहेरी होने पर आपकी पलक सूज जाती है | कुछ केसेस में सूजन के कारण पलक पूरी तरह से बंद हो जाती है | यह सूजन लगभग तीन दिन तक बनी रहेगी जिसके बाद यह कभी-कभी अपने आप फूट कर बह जाती है | कभी-कभी, सूजन आँख के चारों ओर चेहरे के हिस्सों में फ़ैल जाती है, ऐसी स्थिति में आपको डॉक्टर को दिखाना चाहिए
    अन्य लक्षणों से सावधान रहें: सूजी हुई पलक आँख को उत्तेजित कर सकती है जिसके कारण दर्द हो सकता है और पानी निकल सकता है | आपकी आँख प्रकाश के प्रति भी संवेदनशील हो सकती है | सूजन के कारण पलक झपकने में असुविधा हो सकती है

    गुहेरी के लिए घरेलू उपचार--- 
    एक गर्म सेक लगायें: घर पर किये जाने वाले गुहेरी के उपचार के लिए आँख पर 10-15 मिनट के लिए दिन में दो से तीन बार गर्म सेक लगाने की सलाह दी जाती है |[८]इससे उस जगह संचरण बढ़ेगा और गुहेरी के फूटकर बह जाने को गति मिलेगी | यह ज़रूरी है कि जैसे ही आप गुहेरी की पहचान करें, जल्दी से जल्दी गर्म सेक लगाना शुरू कर दें | अनुपचारित गुहेरी कई सप्ताह तक बनी रह सकती है लेकिन उपचार से यह सिर्फ कुछ दिनों में ही ठीक हो जाती है |गर्म सेक हमेशा “बंद” पलक पर उपयोग करें | ध्यान रखें कि सेक बहुत गर्म नहीं होना चाहिए अन्यथा इसके कारण आप जल सकते हैं | इसका टेस्ट अपनी स्किन के साफ़ हिस्से जैसे अपनी भुजा पर कुछ कुछ मिनट के लिए करें | अगर ये बहुत गर्म हो तो इसे कुछ मिनटों के लिए ठंडा होने दें और अपने चेहरे पर लगाने के पहले फिर से टेस्ट करें |
    • एक गर्म सेक बनाने के लिए, एक साफ़ टॉवल को गर्म पानी (उबलता हुआ नहीं) में भिगोकर निचोड़ें | लेट जाएँ और टॉवल को अपनी बंद पलक पर 10-15 मिनट के लिए लगायें | ज़रूरत पड़ने पर टॉवल को फिर से गर्म पानी में डुबोकर निचोड़ें |
    • वैकल्पिक रूप से, आप गीली टॉवल को एक गर्म पानी की बोतल के चारों ओर लपेट सकते हैं | लेट जाएँ और अपनी आँखें बंद करके बोतल को अपने चेहरे पर लगायें | इस विधि से टॉवल लम्बे समय तक गर्म बनी रहेगी |
    • आप एक मेडिकल स्टोर से बैकपैन के लिए उपयोग किये जाने वाले माइक्रोवेवल हीटिंग पैक (microwaveable heating pack) का भी इस्तेमाल कर सकते हैं | इनसे गर्मी (heat) आती रहती है इसलिए छूने पर गर्म लगते हैं लेकिन पकड़ने में सुविधाजनक होते हैं | अगर आप इन्हें अपने हाथों में नहीं पकड़ सकते तो ये आपके चेहरे के लिए हैं बहुत गर्म हैं | ये लगभग 30 मिनट तक गर्म बने रहते हैं |
    • कुछ लोग अपनी पलकों पर गर्म नमीयुक्त टी बैग्स (tea bags) रखते हैं | ये छोटे होते हैं और अच्छी तरह से गर्म बने रहते हैं लेकिन किसी भीगे हुए कपडे की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली नहीं होते हैं
    • सामान्यतः मिलने वाली दवाइयाँ लें: मेडिकल स्टोर पर कई तरह की क्रीम, ऑइंटमेंट (ointment) और यहाँ तक कि मेडिकेटिड पैड्स (medicated pads) भी उपलब्ध होते हैं जो गुहेरी के कारण होने वाले आँख के संक्रमण को दूर करने में मदद करते हैं | ऐसा उपचार ढूंढें जिसकी सामग्री में पोलीमिक्सिन बी सल्फेट (polymyxin b sulfate) हो जो नेत्र संक्रमण को ठीक करने के लिए एक प्रभावशाली एंटीबायोटिक है सुनिश्चित करें कि ये आँखों के लिए सुरक्षित हैं | जब तक कोई इमरजेंसी न हो इस तरह बगैर प्रिशक्रिपशन के दवा (OTC) लेना टालें क्योंकि ज्यादातर ओप्थाल्मोलोजिस्ट्स इनकी सलाह नहीं देते क्योंकि ये सुरक्षित नहीं हैं, अगर इन्हें आँख में डालना ही पड़े तो हमेशा इनके ऑइंटमेंट (ointment) को डालें |ऐसे प्रोडक्ट से सावधान रहें जो दावा करते हैं कि वे तुरंत या रात भर में गुहेरी को हटा देंगे | ये सामान्यतः महंगे होते हैं और उतने जल्दी काम नहीं करते जिसका ये दावा करते हैं | सामान्यतः गुहेरी के ट्रीटमेंट में 2 से 4 दिन का समय लगता है 

    Sunday, 17 September 2017

    सात साल अधिक जी सकते हैं केवल 25 मिनट टहल कर

    • नियमित मॉर्निंग वॉक करके आप खुद को रख सकते हैं फिट।
    • वॉक के लिए ऐसी जगह का चयन करें जहां पर हरियाली हो।
    • वॉक करने से पहले खूब सारा पानी पियें और वॉर्मअप करें।
    • आप दिल के मरीज हैं तो चिकित्‍सक की सलाह जरूर लें।

    • कहते हैं सुबह सवेरे घूमने जाने से सारा दिन अच्‍छा गुजरता है और यह बात है भी पूरी तरह सही। मॉर्निंग वॉक से आप रसार दिन तरोताजा महसूस करते हैं। सुबह जल्दी उठना सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। और सुबह की सैर के फायदों का तो कहना ही क्या। मॉर्निंग वॉक अच्छी सेहत की संजीवनी कहा जाना गलत नहीं होगा। मॉर्निंग वॉक फिट रहने का बहुत सरल और सुविधाजनक तरीका है। मॉर्निंग वॉक को अपनी दिनचर्या में शामिल कर आप सेहतमंद रह सकते हैं।सुबह की स्वच्छ हवा में सैर शरीर को प्रचुर मात्रा में ऑक्सींजन मिलती है। लेकिन, क्या आप सैर करने का सही तरीका जानते हैं। चलिए, हमारे साथ और जानिए मॉर्निंग वॉक के कुछ ऐसे टिप्स जिन्हें अपनाकर आप दोगुना फायदा उठा सकते हैं। हाल ही में जारी हुई एक शोध ने 25 मिनट टहलने के फायदे बताएं हैं। 25 मिनट टहलकर आप अपने उम्र से सात साल अधिक जी सकते हैं। यूरोपियन सोसायटी ऑफ कार्डियोलॉजी में एक स्टडी जारी हुई है जिसके अनुसार रोज की कसरत से आपकी उम्र बढ़ सकती है। यह स्टडी जर्मनी के सारलैंड यूनिवर्सिटी में 30 से 60 साल के 69 स्वस्थ लोगों पर शोध करके किया गया, जो रोज कसरत नहीं करते थे। शोधकर्ताओं के अनुसार केवल 25 मिनट टहल कर आपकी उम्र सात साल तक बढ़ सकती है। साथ ही शोधकर्ताओं के अनुसार रोजाना थोड़ी सी कसरत कर दिल का दौरा पड़ने की संभावना को काफी कम किया जा सकता है।
    • 90 साल तक बढ़ सकती है उम्र----समय और बुढ़ापा को कोई नहीं रोक सकता। लेकिन कहा जाता है ना मेहनत कर समय को अच्छा किया जा सकता है। उसी तरह मेहनत कर बुढ़ापे को भी कम किया जा सकता है। रोजाना की कसरत से उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को कम किया जा सकता है। इस तरह लोग 70 की उम्र में भी जवान दिख सकते हैं और 90 साल तक भी जी सकते हैं।

    25 मिनट तक टहलें----इस शोध के अनुसार सभी को रोजाना कम से कम 25 मिनट तक टहलना चाहिए और अच्छा व स्वस्थ खान-पान लेना चाहिए।