Sunday, 17 September 2017

त्वचा पर चर्बी की गांठ या लाइपोमा

अक्सर हमारे शरीर के किसी भी भाग में गांठे बन जाती हैं. जिन्हें सामान्य भाषा में गठान या रसौली कहा जाता हैं. किसी भी गांठ की शुरुआत एक बेहद ही छोटे से दाने से होती हैं. लेकिन जैसे ही ये बड़ी होती जाती हैं. इन गाठों की वजह से ही गंभीर बीमारियां भी हो जाती हैं. ये गांठे टी.बी से लेकर कैंसर की बीमारी की शुरुआत के चिन्ह होती हैं. अगर किसी व्यक्ति के शरीर के किसी भाग में कोई गाँठ हो गई हैं. जिसक कारण उस गाँठ से आंतरिक या बाह्य रक्तस्राव हो रहा हो. तो हो सकता हैं कि यह कैंसर की बीमारी के शुरुआती लक्षण हो. लेकिन इससे यह भी सुनिश्चित नहीं हो जाता कि ये कैंसर के रोग को उत्पन्न करने वाली गांठ हैं. कुछ गाँठ साधारण बिमारी उत्पन्न होने के कारण भी हो जाती हैं. किन्तु हमें किसी भी प्रकार की गांठों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए तथा उसका तुरंत ही उपचार करवाना चाहिए.

लाइपोमा क्या होता है?

लाइपोमा चर्बी की मुलायम गांठ होती है जो त्वचा के नीचे पायी जाती है। ये ज़्यादातर छोटी और पीड़ाहीन होती है और इससे स्वास्थ को कोई हानी नहीं पहुचती है। ये काफी आम परेशानी है और 100 में से 1 इंसान में पायी जाती है।

कारण:

इसका कोई निश्चित कारण नहीं होता है।
अगर परिवार में किसी को यह समस्या है तो और लोगों को भी हो सकती है।
कभी कभी चोट लगने के बाद भी लाइपोमा बन जाता है।

लक्षण:

गांठ इस प्रकार की हो सकती है:
  • त्वचा पर उठी हुई गांठ
  • ये एक या उससे ज़्यादा भी हो सकती है
  • छूने में मुलायम होती है और त्वचा के अंदर इधर उधर घूमती है
  • ये ज़्यादातर गर्दन, कंधों, हाथों और कमर पर होती है लेकिन ये शरीर के किसी भी हिस्से पर हो सकती है
  • गांठ के इलावा और कोई लक्षण नहीं होता। लेकिन कभी कभी दबाव डालने पर दर्द हो सकता है।
  • निदान:------
  • डॉक्टर गांठ की जांच करके बता देते हैं की यह लाइपोमा है।
    कभी कभी कैंसर की शंका दूर करने के लिए बायोप्सी कराई जाती है।

    उपचार:

    वैसे तो लाइपोमा को किसी उपचार की ज़रूरत नहीं होती है। लेकिन कभी कभी गांठ ऐसे हिस्से में हो जाती है की उसका इलाज करना पड़ता है जैसे:
    • सर्जरी: ऑपरेशन द्वारा गांठ को निकाला जाता है। ये सबसे आम उपचार है।
    • लिपोसक्षण: इसमें सुई के जरिये गांठ में से चर्बी निकाल दी जाती है।
    • स्कूइज़ टेक्निक: गांठ पर छोटा सा चीरा लगाके, गांठ को दबाया जाता है।

    रोकथाम:

    क्योंकि लाइपोमा का कोई स्पष्ट कारण पता नहीं है इसलिए इससे बचने का कोई तरीका नहीं है।

    जटिलताएँ:

    कभी कभी ये कैंसर में बदल सकता है। अगर गांठ किसी तंत्रिका के पास हो जाये तो दर्द हो सकता है।

    निष्कर्ष:

    अगर आपको लाइपोमा है और उसमें दर्द भी होता है तो डॉक्टर को अवश्य दिखाएँ

Saturday, 16 September 2017

अल्सर की असलियत

भागदौड़ भरे इस माहौल में न तो लोगों के खाने का समय तय है, न सोने का। एक्सर्साइज करना तो दूर, समय की दुहाई देकर वे दफ्तर की सीढि़यां चढ़ने से भी परहेज करते हैं। तनाव इस कदर हावी है कि सपने में भी या तो ड्राइविंग करते रहते हैं या दफ्तर की फाइलें पीछा नहीं छोड़तीं। ऐसे में कई बीमारियां चुपके से घर कर जाती हैं। ऐसी ही एक बीमारी है पेप्टिक अल्सर, जो शरीर में ज्यादा एसिडिटी की वजह से होती है ! 


पेप्टिक अल्सर की वजह, लक्षण और इलाज----
क्या होता है पेप्टिक अल्सर- पेप्टिक अल्सर एक ऐसी स्थिति है, जिसमें पेट की अंदरूनी दीवारों पर छाले पड़ जाते हैं। बीमारी बढ़ जाने पर ये छाले गहरे घाव में बदल जाते हैं और मरीजों को ज्यादा परेशानी होने लगती है। गलत खानपान की वजह से जब पेट में एसिड ज्यादा बनने लगता है तो यह स्थिति पैदा हो जाती है। यह बीमारी बैक्टिरिया के इंफेक्शन की वजह से भी होती है।

एसिड रिफ्लक्स डिजीज--- जब हम भोजन करते हैं तो आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक<relatedplaceholder/> एसिड बनता है, जिससे भोजन का पाचन होता है। बदहजमी की वजह से कभी-कभी एसिड ऊपर की ओर आहार नली में चला जाती है। इससे जलन महसूस होती है। इसका असर गले, दांत, सांस आदि पर पड़ने लगता है। इससे सांस लेने में तकलीफ बढ़ जाती है, आवाज भारी हो जाती है और मुंह में छाले पड़ जाते हैं। इस तरह की स्थितियों को एसिड रिफ्लक्स डिजीज कहा जाता है। 
कितनी तरह का अल्सर-- 
गैस्ट्रिक अल्सर - इसमें भोजन के बाद पेट में दर्द होने लगता है। डाइजीन जैसी दवाएं लेने के बाद आराम मिल जाता है।
ड्यूडिनल अल्सर-  खाली पेट रहने से दर्द होता है। भोजन करने के बाद दर्द ठीक हो जाता है। अगर 15 लोगों को ड्यूडेनल अल्सर होता है तो मुश्किल से 1 या 2 लोग गैस्ट्रिक अल्सर के शिकार होते हैं।
इसोफेगल अल्सर : इसमें आहार नली के निचले हिस्से में छाले पड़ जाते हैं या छिद्र हो जाते हैं। इससे आहार नली में तेज जलन होती है।

पेप्टिक अल्सर की वजह-- एसिड की अधिकता : पेट में ज्यादा मात्रा में एसिड बनना पेप्टिक अल्सर की मुख्य वजह है। इसके लिए ज्यादा मिर्च-मसाले वाला खाना और गलत खानपान जिम्मेदार है।

एच-पायलोरी इंफेक्शन : 1980 में एक ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक ने एच-पायलोरी (हेलिकोबेक्टर पायलोरी) नामक बैक्टिरिया का पता लगाया था। उन्होंने माना था कि सिर्फ खान-पान और पेट में एसिड बनने से पेप्टिक अल्सर नहीं होते, बल्कि इसके लिए एक बैक्टिरिया भी दोषी है। इसका नाम एच-पायलोरी रखा गया। एंडोस्कोपी से इसकी स्थिति का पता चलता है। पेप्टिक अल्सर के लिए एच-पायलोरी बैक्टिरिया जिम्मेदार है, फिर भी 90 फीसदी लोगों के पेट में इस बैक्टिरिया के होने के बावजूद उनमें अल्सर नहीं होता। 10 फीसदी लोगों में इस बैक्टिरिया के होने के बावजूद अल्सर होता है।

पेनकिलर्स का इस्तेमाल : कई पेनकिलर्स और बुखार उतारने की दवाएं नॉन-स्टिरॉयडल एंटी इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (एनएसएआईडी) की कैटिगरी में आती हैं। इनमें एस्प्रिन, आइब्रुफेन और नेप्रेक्सिन समूह की दवाएं प्रमुख हैं। इन दवाओं को ज्यादा लेने से एसिड बनता है।

तनाव : तनाव की वजह से एसिड ज्यादा बनता है। बाद में यही पेप्टिक अल्सर का रूप ले लेता है।

स्मोकिंग : स्मोकिंग पेप्टिक अल्सर की एकमात्र वजह नहीं है, लेकिन यह अल्सर के जोखिम को बढ़ा देता है। स्मोकिंग की वजह से अल्सर की दवा का असर कम हो जाता है।

लक्षण---- पेट के ऊपरी हिस्से में तेज दर्द होना अल्सर का लक्षण हो सकता है।

भोजन के बाद जब पेट में दर्द हो और डाइजिन जैसी एंटी-एसिड दवाओं से राहत मिले तो इसे गैस्ट्रिक अल्सर का लक्षण माना जाता है। ड्यूडिनल अल्सर में खाली पेट दर्द होता है और भोजन के बाद दर्द से राहत मिलती है। अक्सर इसका दर्द रात को होता है। अगर दर्द छाती के पास हो तो इसे एसिडिटी रिफ्लेक्शन का असर समझना चाहिए। इससे दिल के दर्द का शक होता है। दिल का दर्द छाती के ऊपरी हिस्से में होता है और कभी-कभी एसिडिटी की वजह से भी उसी जगह दर्द होता है, इसलिए बिना जांच के अंतर समझ पाना आसान नहीं है। पेप्टिक अल्सर होने से मरीज को भूख कम लगती है। सामने खाना होने पर भी खाने की इच्छा नहीं होती।
उलटी होना या उलटी जैसा महसूस होना अल्सर का लक्षण माना जा सकता है। जब अल्सर बढ़ जाता है, तो खून की उलटी हो सकती है। ऐसे में स्टूल (मल) का रंग काला हो जाता है।

अल्सर से बचाव--रेशे वाला भोजन लें और मिर्च-मसाले का इस्तेमाल कम करें।चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स, जंक फूड कम लें।खाना समय पर और तसल्ली से खाएं।टेलिविजन देखते हुए खाना न खाएं।रात के खाने और सोने के बीच कम-से-कम दो घंटे का अंतर होना चाहिए। जूस, लस्सी या मीठे तरल पदार्थ पीने में लोग जल्दबाजी करते हैं। यह गलत है। ऐसी चीजों को धीरे-धीरे पीना चाहिए। धीरे-धीरे पीने से मुंह का सलाइवा इसमें मिल जाता है, जिससे ये चीजें जल्दी पच जाती हैं। स्मोकिंग से परहेज करें।तनावमुक्त रहने की कोशिश करें।नियमित व्यायाम करें।दवाएं डॉक्टरों की सलाह से ही लें।अगर अल्सर हो जाए, तो एनएसएडी समूह की दवा न लें।पेनकिलर्स के रूप में क्रोसिन का इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्या है इलाज

1. एलोपैथी

एंटी-अल्सर किट : पेप्टिक अल्सर में 10 दिन की दवा दी जाती है। इसे एंटी-अल्सर किट कहते हैं। इसमें खासतौर से पीपीआई (प्रोटॉन पंप इनहिबिटर), क्लैरीथ्रोमाइसिन और एमॉक्सिस्लिन ग्रुप की दवाएं होती हैं। इनसे एसिड का असर कम हो जाता है। मरीज को ये दवाएं डॉक्टर द्वारा बताए गए परहेज के साथ लेनी चाहिए।
ऑपरेशन : पहले पेप्टिक अल्सर की वजह से ब्लड आने की स्थिति में ऑपरेशन करने की जरूरत पड़ती थी, लेकिन अब एंडोस्कोपी की मदद से इलाज किया जाता है।

क्या है एंडोस्कोपी-----
एंडोस्कोपी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें शरीर के अंदरूनी हिस्सों के बारे में एंडोस्कोप की मदद से पता लगाया जाता है। एंडोस्कोप पतला लचीला ट्यूब होता है, जिसके एक सिरे पर रोशनी की व्यवस्था होती है और इसमें विडियो कैमरा लगा होता है। इसकी मदद से कंप्यूटर स्क्रीन पर शरीर के भीतरी हिस्सों की तस्वीरें देखी जाती हैं। पेप्टिक अल्सर के मामले में इसे मुंह के रास्ते या मलद्वार से शरीर में प्रवेश कराया जाता है। इसका इस्तेमाल मरीज को बिना बेहोश किए किया जाता है। जब अल्सर फट जाता है या अल्सर के घाव गहरे होकर धमनी को डैमेज कर देते हैं, तो एंडोस्कोप की मदद से खून के बहाव को रोका जाता है। उसके बाद दवा से इलाज किया जाता है।

2. होम्योपैथी----
अर्सेनिकल एल्बम, फॉस्फोरस, सल्फर, आयरिस वर्सिकोलर, कैली बायक्रोमिकम, आर्जेंटम नाइट्र्किम, ग्राफिक आदी हैं।इन दवाओं का चयन होम्योपैथी डॉक्टर की सलाह पर करना चाहिए। मरीज और मर्ज के इतिहास को बेहतर जानने के बाद ही डॉक्टर दवाओं का चयन करते हैं। 

3. आयुर्वेद---
सतशेखर रस की 2 टैब्लेट दिन में तीन बार लें।

कामदूध रस की 2 टैब्लेट दिन में तीन बार लें।

4. घरेलू उपचार----
पोहा (बिटन राइस) और सौंफ को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। 20 ग्राम चूर्ण को 2 लीटर पानी में सुबह घोलकर रख लें और रात में पूरा पी जाएं। रोज सुबह तैयार करें और दोपहर बाद या शाम से पीना शुरू कर दें। इस घोल को 24 घंटे में खत्म कर देना है।

दूध गैस्ट्रिक एसिड बनाता है, लेकिन आधा कप ठंडे दूध में आधा नीबू निचोड़कर पिया जाए तो वह पेट को आराम देता है। जलन का असर कम हो जाता है।

पत्ता गोभी और गाजर को बराबर मात्रा में लेकर जूस बना लें। सुबह-शाम एक-एक कप पीने से पेप्टिक अल्सर के मरीजों को आराम मिलता है।गाय के दूध से बने कच्चे घी का इस्तेमाल फायदेमंद होता है।बादाम पीसकर बनाए गए दूध से मरीज को काफी लाभ पहुंचता है। ड्रम स्टिक (सहजन) के पत्ते को पीसकर दही के साथ पेस्ट बनाकर लें। 

5. यौगिक क्रियाएं--- पेप्टिक अल्सर को दूर करने के लिए योगासन नहीं हैं, लेकिन एसिड की अधिकता को कम करने के लिए योग कारगर है।वज्रासन, उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, भुजंगासन करने से एसिड का असर कम होता है।जलनेति जैसी यौगिक क्रियाएं भी उपयोगी हैं।अनुलोम-विलोम, शीतली और सीत्कारी जैसे प्राणायाम से फायदा मिलता है।पेप्टिक अल्सर ने अगर गंभीर रूप ले लिया हो तो योगासन नहीं करने चाहिए। यौगिक क्रियाएं किसी योगाचार्य की सलाह और देखरेख में ही करें।

अलसी - एक चमत्कारी आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक


जब से परिष्कृत यानी “रिफाइन्ड तेल” (जो बनते समय उच्च तापमान, हेग्जेन, कास्टिक सोडा, फोस्फोरिक एसिड, ब्लीचिंग क्ले आदि घातक रसायनों के संपर्क से गुजरता है), ट्रांसफेट युक्त पूर्ण या आंशिक हाइड्रोजिनेटेड वसा यानी वनस्पति घी (जिसका प्रयोग सभी पैकेट बंद खाद्य पदार्थों व बेकरी उत्पादनों में धड़ल्ले से किया जाता है), रासायनिक खाद, कीटनाशक, प्रिजर्वेटिव, रंग, रसायन आदि का प्रयोग बढ़ा है तभी से डायबिटीज के रोगियों की संख्या बढ़ी है। हलवाई और भोजनालय भी वनस्पति घी या रिफाइन्ड तेल का प्रयोग भरपूर प्रयोग करते हैं और व्यंजनों को तलने के लिए तेल को बार-बार गर्म करते हैं जिससे वह जहर से भी बदतर हो जाता है। शोधकर्ता इन्ही को डायबिटीज का प्रमुख कारण मानते हैं। पिछले तीन-चार दशकों से हमारे भोजन में ओमेगा-3 वसा अम्ल की मात्रा बहुत ही कम हो गई है और इस कारण हमारे शरीर में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 वसा अम्ल यानी हिंदी में कहें तो ॐ-3 और ॐ-6 वसा अम्लों का अनुपात 1:40 या 1:80 हो गया है जबकि यह 1:1 होना चाहिये। यह भी डायबिटीज का एक बड़ा कारण है। डायबिटीज के नियंत्रण हेतु आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक व दैविक भोजन अलसी को “अमृत“ तुल्य माना गया है।
अलसी शरीर को स्वस्थ रखती है व आयु बढ़ाती है। अलसी में 23 प्रतिशत ओमेगा-3 फेटी एसिड, 20 प्रतिशत प्रोटीन, 27 प्रतिशत फाइबर, लिगनेन, विटामिन बी ग्रुप, सेलेनियम, पोटेशियम, मेगनीशियम, जिंक आदि होते हैं। सम्पूर्ण विश्व ने अलसी को सुपर स्टार फूड के रूप में स्वीकार कर लिया है और इसे आहार का अंग बना लिया है, लेकिन हमारे देश की स्थिति बिलकुल विपरीत है । अलसी को अतसी, उमा, क्षुमा, पार्वती, नीलपुष्पी, तीसी आदि नामों से भी पुकारा जाता है। अलसी दुर्गा का पांचवा स्वरूप है। प्राचीनकाल में नवरात्री के पांचवे दिन स्कंदमाता यानी अलसी की पूजा की जाती थी और इसे प्रसाद के रूप में खाया जाता था। जिससे वात, पित्त और कफ तीनों रोग दूर होते है।
- ओमेगा-3 हमारे शरीर की सारी कोशिकाओं, उनके न्युक्लियस, माइटोकोन्ड्रिया आदि संरचनाओं के बाहरी खोल या झिल्लियों का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यही इन झिल्लियों को वांछित तरलता, कोमलता और पारगम्यता प्रदान करता है। ओमेगा-3 का अभाव होने पर शरीर में जब हमारे शरीर में ओमेगा-3 की कमी हो जाती है तो ये भित्तियां मुलायम व लचीले ओमेगा-3 के स्थान पर कठोर व कुरुप ओमेगा-6 फैट या ट्रांस फैट से बनती है, ओमेगा-3 और ओमेगा-6 का संतुलन बिगड़ जाता है, प्रदाहकारी प्रोस्टाग्लेंडिन्स बनने लगते हैं, हमारी कोशिकाएं इन्फ्लेम हो जाती हैं, सुलगने लगती हैं और यहीं से ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, डिप्रेशन, आर्थ्राइटिस और कैंसर आदि रोगों की शुरूवात हो जाती है।
- आयुर्वेद के अनुसार हर रोग की जड़ पेट है और पेट साफ रखने में यह इसबगोल से भी ज्यादा प्रभावशाली है। आई.बी.एस., अल्सरेटिव कोलाइटिस, अपच, बवासीर, मस्से आदि का भी उपचार करती है अलसी।
- अलसी शर्करा ही नियंत्रित नहीं रखती, बल्कि मधुमेह के दुष्प्रभावों से सुरक्षा और उपचार भी करती है। अलसी में रेशे भरपूर 27% पर शर्करा 1.8% यानी नगण्य होती है। इसलिए यह शून्य-शर्करा आहार कहलाती है और मधुमेह के लिए आदर्श आहार है। अलसी बी.एम.आर. बढ़ाती है, खाने की ललक कम करती है, चर्बी कम करती है, शक्ति व स्टेमिना बढ़ाती है, आलस्य दूर करती है और वजन कम करने में सहायता करती है। चूँकि ओमेगा-3 और प्रोटीन मांस-पेशियों का विकास करते हैं अतः बॉडी बिल्डिंग के लिये भी नम्बर वन सप्लीमेन्ट है अलसी।
- अलसी कॉलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और हृदयगति को सही रखती है। रक्त को पतला बनाये रखती है अलसी। रक्तवाहिकाओं को साफ करती रहती है अलसी।
- अलसी एक फीलगुड फूड है, क्योंकि अलसी से मन प्रसन्न रहता है, झुंझलाहट या क्रोध नहीं आता है, पॉजिटिव एटिट्यूड बना रहता है यह आपके तन, मन और आत्मा को शांत और सौम्य कर देती है। अलसी के सेवन से मनुष्य लालच, ईर्ष्या, द्वेश और अहंकार छोड़ देता है। इच्छाशक्ति, धैर्य, विवेकशीलता बढ़ने लगती है, पूर्वाभास जैसी शक्तियाँ विकसित होने लगती हैं। इसीलिए अलसी देवताओं का प्रिय भोजन थी। यह एक प्राकृतिक वातानुकूलित भोजन है।
- सिम का मतलब सेरीन या शांति, इमेजिनेशन या कल्पनाशीलता और मेमोरी या स्मरणशक्ति तथा कार्ड का मतलब कन्सन्ट्रेशन या एकाग्रता, क्रियेटिविटी या सृजनशीलता, अलर्टनेट या सतर्कता, रीडिंग या राईटिंग थिंकिंग एबिलिटी या शैक्षणिक क्षमता और डिवाइन या दिव्य है।
- त्वचा, केश और नाखुनों का नवीनीकरण या जीर्णोद्धार करती है अलसी। अलसी के शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट ओमेगा-3 व लिगनेन त्वचा के कोलेजन की रक्षा करते हैं और त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनाते हैं। अलसी सुरक्षित, स्थाई और उत्कृष्ट भोज्य सौंदर्य प्रसाधन है जो त्वचा में अंदर से निखार लाता है। त्वचा, केश और नाखून के हर रोग जैसे मुहांसे, एग्ज़ीमा, दाद, खाज, खुजली, सूखी त्वचा, सोरायसिस, ल्यूपस, डेन्ड्रफ, बालों का सूखा, पतला या दोमुंहा होना, बाल झड़ना आदि का उपचार है अलसी। चिर यौवन का स्रोता है अलसी। बालों का काला हो जाना या नये बाल आ जाना जैसे चमत्कार भी कर देती है अलसी। किशोरावस्था में अलसी के सेवन करने से कद बढ़ता है।
- लिगनेन का सबसे बड़ा स्रोत अलसी ही है जो जीवाणुरोधी, विषाणुरोधी, फफूंदरोधी और कैंसररोधी है। अलसी शरीर की रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ कर शरीर को बाहरी संक्रमण या आघात से लड़ने में मदद करती हैं और शक्तिशाली एंटी-आक्सीडेंट है। लिगनेन वनस्पति जगत में पाये जाने वाला एक उभरता हुआ सात सितारा पोषक तत्व है जो स्त्री हार्मोन ईस्ट्रोजन का वानस्पतिक प्रतिरूप है और नारी जीवन की विभिन्न अवस्थाओं जैसे रजस्वला, गर्भावस्था, प्रसव, मातृत्व और रजोनिवृत्ति में विभिन्न हार्मोन्स् का समुचित संतुलन रखता है। लिगनेन मासिकधर्म को नियमित और संतुलित रखता है। लिगनेन रजोनिवृत्ति जनित-कष्ट और अभ्यस्त गर्भपात का प्राकृतिक उपचार है। लिगनेन दुग्धवर्धक है। लिगनेन स्तन, बच्चेदानी, आंत, प्रोस्टेट, त्वचा व अन्य सभी कैंसर, एड्स, स्वाइन फ्लू तथा एंलार्ज प्रोस्टेट आदि बीमारियों से बचाव व उपचार करता है।
- जोड़ की हर तकलीफ का तोड़ है अलसी। जॉइन्ट रिप्लेसमेन्ट सर्जरी का सस्ता और बढ़िया उपचार है अलसी। ¬¬ आर्थ्राइटिस, शियेटिका, ल्युपस, गाउट, ओस्टियोआर्थ्राइटिस आदि का उपचार है अलसी।
- कई असाध्य रोग जैसे अस्थमा, एल्ज़ीमर्स, मल्टीपल स्कीरोसिस, डिप्रेशन, पार्किनसन्स, ल्यूपस नेफ्राइटिस, एड्स, स्वाइन फ्लू आदि का भी उपचार करती है अलसी। कभी-कभी चश्में से भी मुक्ति दिला देती है अलसी। दृष्टि को स्पष्ट और सतरंगी बना देती है अलसी।
- अलसी बांझपन, पुरूषहीनता, शीघ्रस्खलन व स्थम्भन दोष में बहुत लाभदायक है।
- 1952 में डॉ. योहाना बुडविग ने ठंडी विधि से निकले अलसी के तेल, पनीर, कैंसररोधी फलों और सब्ज़ियों से कैंसर के उपचार का तरीका विकसित किया था जो बुडविग प्रोटोकोल के नाम से जाना जाता है। यह कर्करोग का सस्ता, सरल, सुलभ, संपूर्ण और सुरक्षित समाधान है। उन्हें 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता मिलती थी। इसके इलाज से वे रोगी भी ठीक हो जाते थे जिन्हें अस्पताल में यह कहकर डिस्चार्ज कर दिया जाता था कि अब कोई इलाज नहीं बचा है, वे एक या दो धंटे ही जी पायेंगे सिर्फ दुआ ही काम आयेगी। उन्होंने सशर्त दिये जाने वाले नोबल पुरस्कार को एक नहीं सात बार ठुकराया।
अलसी सेवन का तरीकाः- हमें प्रतिदिन 30 – 60 ग्राम अलसी का सेवन करना चाहिये। 30 ग्राम आदर्श मात्रा है। अलसी को रोज मिक्सी के ड्राई ग्राइंडर में पीसकर आटे में मिलाकर रोटी, पराँठा आदि बनाकर खाना चाहिये। डायबिटीज के रोगी सुबह शाम अलसी की रोटी खायें। कैंसर में बुडविग आहार-विहार की पालना पूरी श्रद्धा और पूर्णता से करना चाहिये। इससे ब्रेड, केक, कुकीज, आइसक्रीम, चटनियाँ, लड्डू आदि स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाये जाते हैं।
अलसी को सूखी कढ़ाई में डालिये, रोस्ट कीजिये (अलसी रोस्ट करते समय चट चट की आवाज करती है) और मिक्सी से पीस लीजिये. इन्हें थोड़े दरदरे पीसिये, एकदम बारीक मत कीजिये. भोजन के बाद सौंफ की तरह इसे खाया जा सकता है .
अलसी की पुल्टिस का प्रयोग गले एवं छाती के दर्द, सूजन तथा निमोनिया और पसलियों के दर्द में लगाकर किया जाता है। इसके साथ यह चोट, मोच, जोड़ों की सूजन, शरीर में कहीं गांठ या फोड़ा उठने पर लगाने से शीघ्र लाभ पहुंचाती है। यह श्वास नलियों और फेफड़ों में जमे कफ को निकाल कर दमा और खांसी में राहत देती है।
इसकी बड़ी मात्रा विरेचक तथा छोटी मात्रा गुर्दो को उत्तेजना प्रदान कर मूत्र निष्कासक है। यह पथरी, मूत्र शर्करा और कष्ट से मूत्र आने पर गुणकारी है। अलसी के तेल का धुआं सूंघने से नाक में जमा कफ निकल आता है और पुराने जुकाम में लाभ होता है। यह धुआं हिस्टीरिया रोग में भी गुण दर्शाता है। अलसी के काढ़े से एनिमा देकर मलाशय की शुद्धि की जाती है। उदर रोगों में इसका तेल पिलाया जाता हैं।
अलसी के तेल और चूने के पानी का इमल्सन आग से जलने के घाव पर लगाने से घाव बिगड़ता नहीं और जल्दी भरता है। पथरी, सुजाक एवं पेशाब की जलन में अलसी का फांट पीने से रोग में लाभ मिलता है। अलसी के कोल्हू से दबाकर निकाले गए (कोल्ड प्रोसेस्ड) तेल को फ्रिज में एयर टाइट बोतल में रखें। स्नायु रोगों, कमर एवं घुटनों के दर्द में यह तेल पंद्रह मि.ली. मात्रा में सुबह-शाम पीने से काफी लाभ मिलेगा।
इसी कार्य के लिए इसके बीजों का ताजा चूर्ण भी दस-दस ग्राम की मात्रा में दूध के साथ प्रयोग में लिया जा सकता है। यह नाश्ते के साथ लें।
बवासीर, भगदर, फिशर आदि रोगों में अलसी का तेल (एरंडी के तेल की तरह) लेने से पेट साफ हो मल चिकना और ढीला निकलता है। इससे इन रोगों की वेदना शांत होती है।
अलसी के बीजों का मिक्सी में बनाया गया दरदरा चूर्ण पंद्रह ग्राम, मुलेठी पांच ग्राम, मिश्री बीस ग्राम, आधे नींबू के रस को उबलते हुए तीन सौ ग्राम पानी में डालकर बर्तन को ढक दें। तीन घंटे बाद छानकर पीएं। इससे गले व श्वास नली का कफ पिघल कर जल्दी बाहर निकल जाएगा। मूत्र भी खुलकर आने लगेगा।
इसकी पुल्टिस हल्की गर्म कर फोड़ा, गांठ, गठिया, संधिवात, सूजन आदि में लाभ मिलता है।
डायबिटीज के रोगी को कम शर्करा व ज्यादा फाइबर खाने की सलाह दी जाती है। अलसी व गैहूं के मिश्रित आटे में (जहां अलसी और गैहूं बराबर मात्रा में हो)|
सुपर फुड अलसी में ओमेगा थ्री व सबसे अधिक फाइबर होता है। यह डब्लयू एच ओ ने इसे सुपर फुड माना है। यह रोगों के उपचार में लाभप्रद है। लेकिन इसका सेवन अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग तरह से किया जाता है।  स्वस्थ व्यक्ति को रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच अलसी का पाउडर पानी के साथ ,सब्जी, दाल या सलाद मंे मिलाकर लेना चाहिए । अलसी के पाउडर को ज्यूस, दूध या दही में मिलाकर भी लिया जा सकता है। इसकी मात्रा 30 से 60 ग्राम प्रतिदिन तक ली जा सकती है। 100-500 ग्राम अलसी को मिक्सर में दरदरा पीस कर किसी एयर टाइट डिब्बे में भर कर रख लें। अलसी को अधिक मात्रा मंे पीस कर न रखें, यह पाउडर के रूप में खराब होने लगती है। सात दिन से ज्यादा पुराना पीसा हुआ पाउडर प्रयोग न करें। इसको एक साथ पीसने से तिलहन होने के कारण खराब हो जाता है।
  • खाँसी होेने पर अलसी की चाय पीएं। पानी को  उबालकर उसमें अलसी पाउडर मिलाकर चाय तैयार करें।एक चम्मच अलसी पावडर को दो कप (360 मिलीलीटर) पानी में तब तक धीमी आँच पर पकाएँ जब तक यह पानी एक कप न रह जाए। थोड़ा ठंडा होने पर शहद, गुड़ या शकर मिलाकर पीएँ। सर्दी, खाँसी, जुकाम, दमा आदि में यह चाय दिन में दो-तीन बार सेवन की जा सकती है। दमा रोगी एक चम्मच अलसी का पाउडर केा आधा गिलास पानी में 12 घंटे तक भिगो दे और उसका सुबह-शाम छानकर सेवन करे तो काफी लाभ होता है। गिलास काँच या चाँदी को होना चाहिए।
  • समान मात्रा में अलसी पाउडर, शहद, खोपराचूरा, मिल्क पाउडर व सूखे मेवे मिलाकर नील मधु तैयार करें।  कमजोरी में व बच्चों के स्वास्थ्य के लिए नील मधु उपयोगी है।
  • डायबीटिज के मरीज को आटा गुन्धते वक्त प्रति व्यक्ति 25 ग्राम अलसी काॅफी ग्राईन्डर में ताजा पीसकर आटे में मिलाकर इसका सेवन करना चाहिए। अलसी मिलाकर रोटियाँ बनाकर खाई जा सकती हैं। अलसी एक जीरो-कार फूड है अर्थात् इसमें कार्बोहाइट्रेट अधिक होता है।शक्कर की मात्रा न्यूनतम है।
  • कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से निकला तीन चम्मच तेल, छः चम्मच पनीर में मिलाकर उसमें सूखे मेवे मिलाकर देने चाहिए। कैंसर की स्थिति मेें डाॅक्टर बुजविड के आहार-विहार की पालना श्रद्धा भाव से व पूर्णता से करनी  चाहिए। कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से  निकले तेल की मालिश भी करनी चाहिए।
  • साफ बीनी हुई और पोंछी हुई अलसी  को धीमी आंच पर तिल की तरह भून लें।मुखवास की तरह इसका सेवन करें। इसमें संेधा नमक भी मिलाया जा सकता है। ज्यादा पुरानी भुनी हुई अलसी प्रयोग में न लें।
  • बेसन में 25 प्रतिशत मिलाकर अलसी मिलाकर व्यंजन बनाएं। बाटी बनाते वक्त भी उसमें भी अलसी पाउडर मिलाया जा सकता है। सब्जी की ग्रेवी में भी अलसी पाउडर का प्रयोग करें।
  • अलसी सेवन के दौरान खूब पानी पीना चाहिए। इसमें अधिक फाइबर होता है, जो खूब पानी माँगता है


Friday, 15 September 2017

मेथीदाना (fenugreek) – बुढ़ापे तक स्वास्थय का खजाना

जो व्यक्ति बुढ़ापे तक स्वस्थ और हट्टा कट्टा रहना चाहता हैं, और चाहता हैं के उसको मधुमेह, रक्तचाप, हृदय रोग, joint pain जैसी बीमारिया ना लगे तो उसको मेथी दाने  का रोज़ाना सेवन बताई गयी विधि द्वारा करना चाहिए।

मेथीदाने के फायदे--मैथीदाना, जितने साल जिसकी आयु हो उतने दाने लेकर धीरे-धीरे खूब चबा-चबाकर रोजाना प्रात: खाली पेट, या शाम को पानी की सहायता से  सेवन करने चाहिए, अगर चबाने में दिक्कत हो तो पानी की सहायता से निगल सकते हैं। ऐसा करने से व्यक्ति सदैव निरोग और चुस्त बना रहेगा और मधुमेह, जोड़ों के दर्द, शोथ(सूजन), रक्तचाप, बलगमी बीमारियां, अपचन आदि अनेकानेक रोगों से बचाव होगा। वृध्दावस्था की व्याधियां जैसे सायटिका, घुटने का दर्द, हाथ-पैरों का सुन्न पड़ जाना, मांसपेशियों का खिचाव, भूख न लगना, बार-बार मूत्र आना, चक्कर आना आदि, उसके पास नही फटकेगी। ओज, कान्ति और स्फूर्ति में वृद्धि होकर व्यक्ति दीर्घायु होगा।

मेथीदाना सेवन के तरीके-यद्यपि अलग-अलग बिमारियों के इलाज के लिए मैथीदाना का प्रयोग कई प्रकार से किया जाता है जैसे मैथीदाना भिगोकर उसका पानी पीना या भिगोये मैथीदाना को घोट छानकर पीना, उसे अंकुरित करके चबाना या रस निकालकर पीना, उसे उबालकर उसका पानी पीना या सब्जी बनाकर खाना, खिचड़ी या कढी पकाते समय उसमे डालकर सेवन करना, सबूत मैथीदाना प्रात: चबाकर खाना और रात्रि में पानी संग निगलना, भूनकर या वैसे ही उसका दलिया या चूर्ण बनाकर ताजा पानी के साथ फक्की लेना, मैथीदाना के लड्डू बनाकर खाना आदि परन्तु मैथी के सेवन का निरापद और सबसे अच्छा तरीका है उसका काढ़ा या चाय बनाकर पीना।

विशेष-गर्मियों में इसकी फक्की लेने की बजाये रात में इसको एक गिलास पानी में भिगो कर रख दे, सुबह मेथीदाना चबा चबा कर खा ले और ऊपर से यही भिगोया हुआ पानी पी ले।

अंकुरित मूंग रहना है फिट तो जरुर खाएं

मूंग को रात को भिगो कर सुबह उबाल कर उसे मसाले का छोंक लगा कर या अंकुरित मूंग खाये स्वाद मे तो अच्छे लगेगे ही मगर शरीर मे बहुत फायदा करेगा मे इस पोस्ट मे आपको इसके फायदे की जानकारी प्रदान कर रहा हु ! जैन धर्म मे उपवास के बाद पारने मे मूंग खाते है इसका मुख्य कारण क्या है अगर आप पूरे मेरे विचार आप पढ़ोगे त समझ जाओगे !    जरूरी नहीं कि स्‍वाद में जो अच्‍छा हो, वो स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक भी हो। अक्‍सर ऐसा ही होता है, जो चीज खाने में बिल्‍कुल अच्‍छी नहीं लगती है वो गुणों से भरपूर ही होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण करेला है, स्‍वाद में कितना कड़वा और बेकार लगता है लेकिन सारी सब्जियों में सबसे ज्‍यादा गुण करेले में ही होते हैं। स्‍वादिष्‍ट भोजन करने से पहले आपको इस बात को हमेशा ध्‍यान में रखना चाहिए कि शरीर के विकास के लिए विटामिन और खनिज की जरूरत होती है दालों में सबसे पौष्टिक दाल, मूंग की होती है, इसमें विटामिन ए, बी, सी और ई की भरपूर मात्रा होती है। साथ ही पौटेशियम, आयरन, कैल्शियम की मात्रा भी मूंग में बहुत होती है। इसके सेवन से शरीर में कैलोरी भी बहुत नहीं बढ़ती है। अगर अंकुरित मूंग दाल खाएं तो शरीर में कुल 30 कैलोरी और 1 ग्राम फैट ही पहुंचता है।अंकुरित मूंग दाल में मैग्‍नीशियम, कॉपर, फोलेट, राइबोफ्लेविन, विटामिन, विटामिन सी, फाइबर, पोटेशियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, आयरन, विटामिन बी -6, नियासिन, थायमिन और प्रोटीन होता है। मूंग की दाल के स्‍प्राउट ऐसे ही कुछ लाभकारी गुण निम्‍न प्रकार हैं
मूंग की दाल के स्‍प्राउट में ग्‍लूकोज लेवल बहुत कम होता है इस वजह से मधुमेह रोगी इसे खा सकते हैं।
मूंग की दाल के स्‍प्राउट में ओलियोसाच्‍चाराइडस होता है जो पॉलीफिनॉल्‍स से आता है। ये दोनों की घटक, गंभीर रोगों से लड़ने की क्षमता को प्रबल करते हैं। कैंसर के रोगी भी इसका सेवन आराम से कर सकते हैं
मूंग की दाल में ऐसे गुण होते हैं जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देते हैं और उसे बीमारियों से लड़ने की ताकत देते हैं। इसमें एंटी-माइक्रोबियल और एंटी-इंफलामेट्री गुण होते हैं जो शरीर की इम्‍यूनिटी बढ़ाते हैं
मूंग की दाल के स्‍प्राउट में शरीर के टॉक्सिक को निकालने के गुण होते हैं। इसके सेवन से शरीर में विषाक्‍त तत्‍वों में कमी आती है ! इस बात को मजाक में न लें, मूंग की दाल के स्‍प्राउट के सेवन से पाचन क्रिया हमेशा सही बनी रहती है जिसके कारण, आपको पेट सम्‍बंधी समस्‍या नहीं होती है और जीवन खुशहाल रहता है। मूंग की दाल के स्‍प्राउट में साइट्रोजेन होता है जो शरीर में कोलेजन और एलास्टिन बनाएं रखता है जिससे उम्र का असर, जल्‍दी ही चेहरे पर दिखाई नहीं देता है। मूंग की दाल के स्‍प्राउट में फाइबर की भरपूर मात्रा होती है। जिससे फ्रेश होने में कोई समस्‍या नहीं होती है व पाचन क्रिया दुरूस्‍त बनी रहती है।मूंग की दाल के स्‍प्राउट में पेप्टिसाइड होता है जो बीपी को संतुलित रखता है और शरीर को फिट बनाएं रखने में कारगर होता है।अगर आप शाकाहारी हैं तो मूंग की दाल के स्‍प्राउट का सेवन अवश्‍य करें। यह शरीर में आवश्‍यक तत्‍वों की कमी हो पूरी करता है और शरीर को मजबूत बनाती है। इससे बेहतर शाकाहारी खाद्य सामग्री कोई नहीं होती है। यह सुपाच्‍य भी होता है।




पंचगव्य... गाय के दूध, घृत, दही, गोमूत्र और गोबर



गाय के दूध, घृत, दही, गोमूत्र और गोबर के रस को मिलाकर पंचगव्य तैयार होता है। पंचगव्य के प्रत्येक घटक द्रव्य महत्वपूर्ण गुणों से संपन्न हैं।इनमें गाय के दूध के समान पौष्टिक और संतुलित आहार कोई नहीं है। इसे अमृत माना जाता है। 
यह विपाक में मधुर, शीतल, वातपित्त शामक, रक्तविकार नाशक और सेवन हेतु सर्वथा उपयुक्त है।
गाय का दही भी समान रूप से जीवनीय गुणों से भरपूर है। गाय के दही से बना छाछ पचने में आसान और पित्त का नाश करने वाला होता है।गाय का घी विशेष रूप से नेत्रों के लिए उपयोगी और बुद्धि-बल दायक होता है। इसका सेवन कांतिवर्धक माना जाता है।गोमूत्र प्लीहा रोगों के निवारण में परम उपयोगी है। रासायनिक दृष्टि से देखने पर इसमें पोटेशियम, मैग्रेशियम, कैलशियम, यूरिया, अमोनिया, क्लोराइड, क्रियेटिनिन जल एवं फास्फेट आदि द्रव्य पाये जाते हैं।गोमूत्र कफ नाशक, शूल गुला उदर रोग, नेत्र रोग, मूत्राशय के रोग, कष्ठ, कास, श्वास रोग नाशक, शोथ, यकृत रोगों में राम-बाण का काम करता है।चिकित्सा में इसका अन्त: बाह्य एवं वस्ति प्रयोग के रूप में उपयोग किया जाता है। यह अनेक पुराने एवं असाध्य रोगों में परम उपयोगी है।गोबर का उपयोग वैदिक काल से आज तक पवित्रीकरण हेतु भारतीय संस्कृति में किया जाता रहा है।यह दुर्गंधनाशक, पोषक, शोधक, बल वर्धक गुणों से युक्त है। विभिन्न वनस्पतियां, जो गाय चरती है उनके गुणों के प्रभावित गोमय पवित्र और रोग-शोक नाशक है। दुग्धाहार, श्रेष्ठाहार- दूध स्तनधारी प्राणियों के लिये वरदान है उस ईश्वर का जिसने दुनिया में उन्हें भेजा। गाय के साथ-साथ भैंस और बकरी के दूध का भी हम इस्तेमाल करते हैं। शायद ही ऐसा कोई मनुष्य हो जो दूध का पान किए बगैर ही बड़ा हो गया हो। “मातृ क्षीरंत अमृतं शिशुभ्य:” मां का दूध बच्चे के लिये अमृत है। गौमाता की सुरक्षा के लिए संकल्प लीजिए, गौमाता की पूजा के लिये संकल्प लीजिए। चाहे किसी भी जाति सम्प्रदाय के हों, दूध पीने की आदत डालें। प्रक्रिया जो भी हो, मांस लाल होता है, दूध सफेद होता है। सफेद यानी शांति का प्रतीक। यह भी ईश्वर का एक संकेत ही है।
गाय को लेकर विशेष चर्चा इसलिए है कि गाय को बचाने के प्रयास हो रहे हैं। गाय हमारी माता है। हम सब उसके बच्चे हैं, उसके दूध पर आश्रित हैं। गाय का दूध गिलास में लेकर हम पीते हैं तो यह पुष्टिका है, कम से कम इतना तो कहा जा सकता है। गाय के दूध की उपयोगिता का वर्णन प्राय: असंभव है। ये बड़ी-बड़ी डेयरियां कहां से चलती हैं? ये पकवान कहां से बनते हैं? ये चाकलेट कहां से बनती है? ये मिठाइयां कहां से बनती हैं? स्वादिष्ट पनीर, दही, मावा सब के सब दूध से ही ताे बनते हैं। एक तरह से दूध न होता तो संसार नहीं होता।
गौमाता को अपने घर में रखकर तन-मन-धन से सेवा करनी चाहिये, ऐसा कहा गया है जो तन-मन-धन से गौ की सेवा करता है, तो गौमाता उसकी सारी मनोकामनाएँ पूरी करती है।यदि रास्ते में गौ आती हुई दिखे, तो उसे अपने दाहिने से जाने देना चाहिये।गौ के सामने कभी पैर करके बैठना या सोना नहीं चाहिये, न ही उनके ऊपर कभी थूकना चाहिये, जो ऐसा करता है वो महान पाप का भागी बनता है।गौमाता को घर पर रखकर कभी भूखी – प्यासी नहीं रखना चाहिये, न ही गर्मी में धूप में बाँधना चाहिये। ठण्ड में सर्दी में नहीं बाँधना चाहिये, जो गाय को भूखी – प्यासी रखता है उसका कभी श्रेय नहीं होता।नित्य प्रति भोजन बनाते समय सबसे पहले गाय के लिए रोटी बनानी चाहिये। गौग्रास निकालना चाहिये। गौ ग्रास का बड़ा महत्व है।गौओ के लिए चरणी बनानी चाहिये, और नित्य प्रति पवित्र ताजा ठंडा जल भरना चाहिये, ऐसा करने से मनुष्य की “२१ पीढियाँ” तर जाती है।गाय उसी ब्राह्मण को दान देना चाहिये, जो वास्तव में गाय को पाले, और गाय की रक्षा सेवा करे, यवनों को और कसाई को न बेचे। अनाधिकारी को गाय दान देने से घोर पाप लगता है।नित्य प्रति गाय के परम पवित्र गोबर से रसोई लीपना और पूजा के स्थान को भी, गोमाता के गोबर से लीपकर शुद्ध करना चाहिये।गाय के दूध, घी, दही, गोबर और गौमूत्र, इन पाँचो को ‘पञ्चगव्यऽ के द्वारा मनुष्यों के पाप दूर होते है।कहते हैं गौ के “गोबर में लक्ष्मी जी” और “गौ मूत्र में गंगा जी” का वास होता है इसके अतिरिक्त दैनिक जीवन में उपयोग करने से पापों का नाश होता है, और गौमूत्र से रोगाणु नष्ट होते है।जिस देश में गौमाता के रक्त का एक भी बिंदु गिरता है, उस देश में किये गए योग, यज्ञ, जप, तप, भजन, पूजन , दान आदि सभी शुभ कर्म निष्फल हो जाते है।नित्य प्रति गौ की पूजा आरती परिक्रमा करना चाहिये। यदि नित्य न हो सके तो “गोपाष्टमी” के दिन श्रद्धा से पूजा करनी चाहिये।गाय यदि किसी गड्डे में गिर गई है या दलदल में फस गई है, तो सब कुछ छोडकर सबसे पहले गौमाता को बचाना चाहिये। गौ रक्षा में यदि प्राण भी देना पड़ जाये तो सहर्ष दे देने से गौलोक धाम की प्राप्ति होती है।यदि तीर्थ यात्रा की इच्छा हो, पर शरीर में बल या पास में पैसा न हो, तो गौ माता के दर्शन, गौ की पूजा और परिक्रमा करने से, सारे तीर्थो का फल मिल जाता है। गाय सर्वतीर्थमयी है। गौ की सेवा से घर बैठे ही ३३ करोड़ देवी – देवताओ की सेवा हो जाती है। ओर इसी गोमाता से हमे पंचगव्य प्राप्त होता है अब आपको इसकी जानकारी दूंगा क्या हैं पंचगव्य घृत ?
पंचगव्य घृत किस रोगों में काम आता हैं ??
आयुर्वेद में, पंचगव्य गाय से प्राप्त पांच महत्वपूर्ण पदार्थों, दूध, घी, दही मूत्र और गोबर का वर्णन करने के लिये प्रयुक्त शब्द हैं  पंचगव्य घृत, पंचगव्य के सभी पांच घटकों से तैयार किया जाता हैं । इसे यकृत रोग, बुखार, एनीमिया और एक टॅोनिक के रूप में प्रयोग किया जाता हैं । इसके सेवन से शरीर में ताकात आती हैं । यह पौष्टिक होने के साथ-साथ शरीर के भीतर की रूक्षता को दुर करता हैं ओर कब्ज़ से राहत देता है । यह पाचक और बस्ती को शुद्ध करता हैं । यह धातुक्षीणता को दूर करता है ओर शरीर को सबल बनाता है ।
*पंचगव्य घृत के घटक Ingredients of Panchgvya Ghrita*
- गोमय स्वरस (3.0721)
- क्षिर Milk - 3.0721
- दधि Curd - 3.072 kg
- गो मूत्र cow's urine - 3.0721
- घी Go ghirta - 768 g
पंचगव्य घृत के लाभ / फायदे (Benefits Of Panchgvya Ghrita)*
- यह यकृत की रक्षा करता है ।
- इसमे रक्त शोधन गुण हैं ।
- यह मुख्य रुप से तंत्रिका और मनोवैज्ञानिक रोगो में प्रयोग किया जाता हैं ।
- यह स्त्रोंतों को साफ करता हैं ।
- यह विशेष रुप से मिरगी, उन्माद / मनोविकृति ओर तंत्रिकाजन्य विकारों में अत्यन्त लाभप्रद है ।
- यह अत्यंत पौष्टिक है ।
- यह वजन, कान्ति, और पाचन को बढ़ाता है ।
- यह धातुओं को पुष्ट करता हैं ।
- यह पित्त विकार को दूर करता है ।
*पंचगव्य घृत के चिकित्सीय उपयोग*
- मिरगी
- पागलपन
- पीलिया
- मलेरिया / टाइफाइड, विषम ज्वर
- मनोभ्रंश, अवसाद और अल्जाइमर रोग
- ओबसेसिव कम्पलसिव डिसओडॅर
सेवन विधि और मात्रा Dosage Of Panchgvya Ghrita
- 5 ग्राम - 12 ग्राम दिन में दो बार, सुबह ओर शाम लें ।
- इसे गाय के दुध साथ लें ।
- यह डोक्टर द्वारा निर्देशित रुप में लें ।

Thursday, 14 September 2017

सफेद बालों से छुटकारा चाहते हैं तो खाने में शामिल करें ये फूड्स

अगर आपके बाल सफेद हो रहे हैं तो इन खाद्य-पदार्थों को अपने डाइट चार्ट में शामिल कीजिए और सफेद बालों से छुटकारा पाइए

आहार जो दूर करें बालों की सफेदी---असमय बाल सफेद होना-- आपको परेशान कर सकता है। इसके लिए आप तमाम तरह के उपाय करते हैं। लेकिन, इन सबके साथ ही अगर आप अपने आहार में कुछ चीजों को शामिल कर लें, तो आप वक्‍त से पहले पकते बालों की समस्‍या को दूर कर सकते हैं।

हरी पत्‍तेदार सब्जियां-- पत्‍तेदार सब्जियों में भरपूर मात्रा में विटामिन-बी पाया जाता है जो बालों को सफेद होने से बचाता है। विटामिन बी-6 और विटामिन बी-12 लाल रक्‍त कोशिकाओं का निर्माण करते हैं जिससे सिर में ऑक्‍सीजन जाता है। लेकिन बिटामिन बी की कमी से बालों को भरपूर मात्रा में ऑक्‍सीजन नही मिल पाता है, इसलिए विटामिन बी की कमी दूर करने के लिए पत्‍तेदार सब्जियों का सेवन कीजिए।

चॉकलेट- मेलेनिन के कारण बालों को रंग प्रदान करता है और मेलेनिन का उत्‍पादन शरीर में कॉपर की मात्रा पर निर्भर है। अगर शरीर में कॉपर की कमी है तो बाल सफेद हो जाते हैं। शरीर में कॉपर की कमी दूर करने के लिए स्‍वीट थेरेपी का सहारा लीजिए। कॉपरयुक्‍त खाद्य-पदार्थों का सेवन कीजिए, इसके लिए चॉकलेट, मशरूम और दाल खाइए।

स्‍ट्रॉबेरीज- स्ट्रॉबेरी में विटामिन सी पाया जाता है, जो कोलेजन उत्पादन करता है। कोलेजन बढ़ती उम्र में बालों को सफेद होने से बचाता है। स्‍ट्रॉबेरी खाने में स्‍वादिस्‍ता तो होता ही साथ ही यह बालों के लिए बहुत फायदेमंद है। इसलिए बालों को सफेद होने से बचाने के लिए पोषण और विटामिन युक्‍त आहार ज्‍यादा मात्रा में लीजिए।

अखरोट और बादाम- बादाम में भरपूर मात्रा में कॉपर और विटामिन-ई पाया जाता है। बाजार में मौजूद आलमंड के हेयर ऑयल भी बालों को सफेद होने से बचाते हैं। इसके अलावा अगर सुबह के नास्‍ते में बादाम का सेवन किया जाए तो बालों को सफेद होने से बचाया जा सकता है।

डेयरी उत्‍पाद- डेयरी उत्‍पादों में विटामिन बी प्रचुर मात्रा में होता है। विटामिन बी6 और बी12 लाल रक्‍त कोशिकाओं के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं। इससे स्‍कैल्‍प में ऑक्‍सीजन और पोषक तत्‍वों की मात्रा बढ़ जाती है। लेकिन, फॉलिक एसिड और बॉयोटिन की कमी से बालों का रंग सफेद होने लगता है। साबुत अनाज, पास्‍ता, पॉल्‍ट्री उत्‍पाद, मीट, अंडा और हरी पत्‍तेदार सब्जियों में विटामिन बी प्रचुर मात्रा में होता है

आंवला- बालों को सफेद होने से बचाने के लिए आंवला श्रेष्‍ठ उत्‍पाद माना जाता है। आंवला बालों को काला करने और उन्‍हें असमय सफेद होने से रोकता है। यह बालों के लिए किसी टॉनिक से कम नहीं। रोजाना सुबह एक आंवला आपके बालों और पूरे शरीर की सेहत को ठीक रखता है।

करी पत्ता- करी पत्ता भी बालों को असमय सफेद होने से रोकता है। यह बालों की जड़ों को मजबूत बनाता है। अपने आहार में करी पत्‍ते का इस्‍तेमाल करने के साथ-साथ आप इसे नारियल के तेल में उबाल भी सकते हैं। फिर वह तेल बालों की जड़ों में लगाने से भी बाल मजबूत बनते हैं।

सूरजमुखी के बीज- सूरजमुखी के बीजों में काफी मात्रा में मिनरल मौजूद होते हैं, जो शरीर को सही प्रकार से काम करने में मदद करते हैं। ये मिनरल मेलनिन के निर्माण और उसके स्‍तर को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। अगर आपके शरीर में इन मिनरल्‍स की कमी हो जाए, तो बाल सफेद हो सकते हैं।

Wednesday, 13 September 2017

गाय का घी बीमारियों में दवा ओर अमृत की तरह काम करता है

हिन्दू धर्म मे गाय को माँ का दर्जा दिया है ! गो मूत्र , गोबर , गो घृत  से आयुर्वेद मे बहुत सी ओषधि बनाई जाती है मगर अब तक तो आप यही जानते हो  कि देशी घी ही रोगों की सबसे बड़ी जड़ है? लेकिन यह सच नहीं है! गाय का घी स्‍वादिष्‍ट और सुगन्‍धित होने के साथ-साथ बीमारी को दूर करने और त्‍वचा के लिए भी बहुत गुणकारी होता है।

आज आप जानिए---- फायदेमंद है गाय का घी ज्यादातर लोग वजन और कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के डर से घी का सेवन करने से बचते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गाय का घी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होता है।  गाय का घी स्वादिष्ट और सुगन्धित होने के साथ-साथ किसी दवा से कम नहीं है। आयुर्वेद में तो गाय के घी को अमृत समान बताया गया है। अगर गाय के घी का सेवन नियमित रूप से किया जाये तो वजन तो नियंत्रित रहता ही है, साथ ही हर प्रकार की बीमारी से भी बचे रहते हैं। जिस प्रकार गाय के दूध में खूब सारी एनर्जी होती है उसी प्रकार देशी घी खाने वाले भी एनर्जी से भरपूर होते हैं। गाय का घी खाने वाले व्यक्ति के चेहरे पर एक अलग प्रकार की चमक, शरीर में एनर्जी और मस्तिष्क तेज होता है। 

कोलेस्ट्रॉल कम करें- घी पर हुए शोध के अनुसार, इससे रक्त और आंतों में मौजूद कोलेस्ट्रॉल कम होता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि घी से बाइलरी लिपिड का स्राव बढ़ जाता है। देशी घी शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल के लेवल को सही रखता है और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करता है। इसलिए अगर आप कोलेस्ट्रॉल की समस्या से परेशान है, तो अपने आहार में गाय के घी को शामिल करें।

पाचन शक्ति बढ़ाये- घी का स्मोकिंग पॉइंट दूसरे फैट की तुलना में बहुत अधिक है। यही कारण है कि पकाते समय आसानी से नहीं जलता। घी में स्थिर सेचुरेटेड बॉण्ड्स बहुत अधिक होते हैं, जिससे फ्री रेडिकल्स निकलने की आशंका बहुत कम होती है। घी की छोटी फैटी एसिड की चेन को शरीर बहुत जल्दी पचा लेता है। जिससे आपकी पाचन शक्ति अच्छी रहती है

दिल के लिए फायदेमंद- अब तक तो यही समझा जाता था कि देशी घी ही रोगों की सबसे बड़ी जड़ है? लेकिन यह सच नहीं है क्योंकि गाय का घी दिल समेत कई बीमारियों को दूर करने में सहायक होता है। दिल की नलियों में ब्लॉकेज होने पर गाय का घी एक ल्यूब्रिकेंट की तरह काम करता है। जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाई खाने की मनाही है, वह गाय का घी खाएं, इससे दिल मजबूत होता है।

त्‍वचा में निखार लाये- गाय के घी में बहुत अधिक मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, जो फ्री रेडिकल्स से लड़ता है और चेहरे की चमक बरकरार रखता है। साथ ही यह त्वचा को मुलायम और नमी प्रदान करता है और त्वचा को नॉरिश करने के साथ-साथ ड्रायनेस को भी कम करता है और त्वचा की कांति बढ़ाता है। आप देशी घी से रोज चेहरे की मसाज कर सकते हैं

मेटाबॉल्जिम को सही रखें- देशी घी शरीर में जमा फैट को गला कर विटामिन में बदलने का काम करता है। इसमें चेन फैट एसिड कम मात्रा में होता है, जिससे आपका खाना जल्दी डाइजेस्ट होता है और मेटाबॉल्जिम सही रहता है। इसके अलावा खाने में देशी घी मिलाकर खाने से खाना जल्दी डाइजेस्ट होता है। यह मेटाबॉल्जिम प्रक्रिया को बढाता है

वजन को निय‍ंत्रित रखें- देशी घी में सीएलए होता है जो मेटाबॉल्जिम को सही रखता है। इससे वजन कंट्रोल में रहता है। सीएलए इंसुलिन की मात्रा को कम रखता है, जिससे वजन बढ़ने और शुगर जैसी दिक्कतें होने का खतरा कम रहता है। इसके अलावा यह हाइड्रोजनीकरण से नहीं बनाया जाता है, इसलिए देशी घी खाने से शरीर में एक्स्ट्रा फैट बनने का सवाल ही नहीं पैदा होता 

इम्यून सिस्टम मजबूत बनाये- देशी घी में विटामिन के2 पाया जाता है, जो ब्लड सेल में जमा कैल्शियम को हटाने का काम करता है। इससे ब्लड सर्कुलेशन सही रहता है। देसी घी इम्यून सिस्टम को मजबूत करने में मदद करता है, जिससे इन्फेक्शन से और बीमारियों से लड़ने की ताकत मिलती है।

कैंसर से लड़े- देसी घी में सूक्ष्म जीवाणु, एंटी-कैंसर और एंटी-वायरल जैसे तत्व मौजूद होते हैं जो कई बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं। गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है। गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है।

माइग्रेन की समस्‍या से बचाये- माइग्रेन में आमतौर पर सिर के आधे हिस्से में दर्द होता है और सिरदर्द के वक्त मितली या उलटी भी आ सकती है। इस समस्या से बचने के लिए गाय का घी आपकी मदद कर सकता है। दो बूंद गाय का देसी घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ठीक होता है। साथ ही गाय के घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म होती है, नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तरोताजा हो जाता है।

भीगे हुए चने बादाम से भी ज्‍यादा फायदेमंद

बादाम से ज्‍यादा फायदेमंद है भीगे हुए चने- भीगे बादाम हमारी सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं, यह बात तो हम सभी जानते हैं। लेकिन  भीगे चने भीगे बादाम से भी ज्‍यादा फायदेमंद होते है।  यह सच है  भीगे चने में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, नमी, फैट, फाइबर, कैल्शियम, आयरन व विटामिन्स पाए जाते हैं। जिससे यह सस्‍ती चीज बड़ी से बड़ी बीमारियों से लड़ने में मदद करता है। साथ ही इससे खून साफ होता है जिससे सुंदरता बढ़ती है और यह दिमाग भी तेज करता है। अगर आप मोटापा कम करने की कोशिश कर रहे है तो नाश्‍ते में रोजाना भीगे चने का सेवन करें।

इम्‍यूनिटी में मजबूती--शरीर को सबसे ज्‍यादा पोषण भीगे काले चने से मिलते हैं। चनों में बहुत सारे विटामिन्स और क्लोरोफिल के साथ फास्फोरस आदि मिनरल्स होते हैं जिन्हें खाने से शरीर को कोई बीमारी नहीं लगती है। रोजाना सुबह के समय भीगे चने खाने से आपको बीमारियों से लड़ने की शक्ति मिलती है। इसके लिए काले चनों को रातभर भिगोकर रख लें और हर दिन सुबह दो मुट्ठी खाएं। कुछ दिनों में आपको फर्क महसूस होने लगेगा। 

डायबिटीज से बचाव-- अगर आप डायबिटीज से परेशान है तो अपने आहार में भीगे चनों को शामिल करें। 25 ग्राम काले चने रात में भिगोकर सुबह खाली पेट सेवन करने से डायबिटीज दूर हो जाती है।

पेट की समस्‍याओं से राहत-- चनों को रातभर पानी में भिगो दें। फिर सुबह चनों से पानी को अलग कर उसमें अदरक, जीरा और नमक को मिक्स करके खाये। चनों को इस तरह से खाने से कब्ज और पेट दर्द से राहत मिलती है।

एनर्जी से भरपूर--अगर आप पूरा दिन एनर्जी से भरपूर रहना चाहते हैं तो शरीर की ताकत बढ़ाने के लिए भीगे चनों में नींबू, अदरक के टुकड़े, हल्का नमक और काली मिर्च डालकर सुबह नाश्ते में खाएं।

पुरुषों के लिए फायदेमंद-- सुबह खाली पेट काले चने खाना पुरुषों के लिए भी बेहद फायदेमंद होता है। चीनी के बर्तन में रात को चने भिगोकर रख दे। सुबह उठकर चनों को अच्‍छे से चबा-चबाकर खाएं। इसके लगातार सेवन करने से वीर्य में बढ़ोतरी होती है और वीर्य का पतलापन दूर हो जाता है। यानी पुरुषों की कमजोरी से जुड़ी समस्याएं खत्म हो जाती हैं।

आलूबुखारा त्‍वचा के लिए कमाल का

स्‍वाद में खट्टा मीठा और टेस्‍टी आलूबुखारा सेहत के साथ-साथ आपके चेहरे और बालों के लिए भी बहुत अच्‍छा होता हैं ! आलू बुख़ारा एक गुठलीदार फल है। आलू बुख़ारे लाल, काले, पीले और कभी-कभी हरे रंग के होते हैं। आलू बुख़ारों का ज़ायका मीठा या खट्टा होता है और अक्सर इनका पतला छिलका अधिक खट्टा होता है। इनका गूदा रसदार होता है और इन्हें या तो सीधा खाया जा सकता है या इनके मुरब्बे बनाए जा सकते हैं। इनके रस पर खमीर उठने पर आलू बुख़ारे की शराब भी बनाई जाती है। सुखाए गए आलू बुख़ारों को बहुत जगहों पर खाया जाता है और उनमें ऑक्सीकरण रोधी (ऐन्टीआक्सडन्ट) पदार्थ होते हैं जो कुछ रोगों से शरीर को सुरक्षित रखने में मददगार हो सकते हैं। आलू बुख़ारों की कई क़िस्मों में कब्ज़ का इलाज करने वाले (यानि जुलाब के) पदार्थ भी होते हैं।

चेहरे के लिए कमाल है आलूबुखारा- स्‍वाद में खट्टा मीठा और टेस्‍टी आलूबुखारा सेहत के लिए बेहद ही फायदेमंद होता है। लेकिन इसमें मौजूद प्रोटीन मिनरल और आयरन जैसे पोषक तत्‍वों के कारण आलूबूखारा शरीर के साथ-साथ चेहरे और बालों के लिए भी बहुत अच्‍छा माना जाता हैं। जी हां आलूबुखारे में विटामिन 'ए' और विटामिन 'सी' के साथ फाइबर और एंटीऑक्‍सीडेंट भी पाये जाते हैं जो आपकी त्‍वचा के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं।

 आलूबुखारा आपकी त्‍वचा के लिए कितना फायदेमंद होता है---

मुंहासो के निशान हटाएं---आलूबुखारा चेहरे पर मुंहासों के दाग मिटाने के साथ चेहरे का कालापन भी दूर करता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्‍सीडेंट के कारण यह दाग-धब्‍बे हटाने में मदद करता है। साथ ही यह चेहरे के ब्‍लड सर्कुलेशन को बढ़ता है जिससे त्‍वचा में ग्‍लो आता है।

उम्र के असर को बेअसर करें--विटामिन्‍स से भरपूर होने के कारण आलूबुखारा चेहरे को बढ़ती उम्र के नुकसान से बचाता है। साथ ही इस फल में मौजूद एंटीऑक्‍सीडेंट चेहरे पर असमय झुर्रियां पड़ने नहीं देता। अगर आप अपने चेहरे को लंबे समय तक जवां बनाए रखना चाहती है तो आलूबुखारे के गुदे से चेहरे की मसाज करें। या इसका मास्‍क बनाकर अपने चेहरे पर लगाएं। आलूबुखारे में मौजूद पौष्टिक तत्‍व न केवल चेहरे को असमय झुर्रियों से बचाते है बल्कि इससे चेहरे की झाइयां भी कम होती है।

त्‍वचा को चमकदार बनाएं--अगर आप त्‍वचा को चमकदार बनाना चाहते हैं तो अपने आहार में आलूबुखारे को शामिल करें। इसमें मौजूद विटामिन सी त्‍वचा को चमकदार और लचीला बनाते है। साथ ही यह चेहरे की रंगत निखारने के साथ आपको लंबे समय तक जवां भी बनाये रखता है। साथ ही अपने डाइट में आलूबुखारे  को शामिल करके आप धूप की खतरनाक किरणों से भी बच सकती हैं क्‍योंकि इसमें प्रोटीन की मात्रा बहुत अधिक होती है।

बालों के लिए वरदान---आलूबुखारे में मौजूद विटामिन सी बालों की जड़ों में ब्‍लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है। आलूबुखारे के बीज को पीसकर पानी मिक्‍स करके बालों की जड़ों में लगाने डैंड्रफ और डैंड्रफ से होने वाली खुजली दूर हो जाती है। इसके अलावा आलूबुखारे में विटामिन और प्रोटीन की ज्‍यादा मात्रा बालों को मजबूत और घना बनाते है। साथ ही विटामिन ई बालों को झड़ने से भी रोकता है। साथ ही यह बालों के प्राकृतिक रंग को भी बरकरार रखता है।

बालों के लिए वरदान--आलूबुखारे में मौजूद विटामिन सी बालों की जड़ों में ब्‍लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है। आलूबुखारे के बीज को पीसकर पानी मिक्‍स करके बालों की जड़ों में लगाने डैंड्रफ और डैंड्रफ से होने वाली खुजली दूर हो जाती है। इसके अलावा आलूबुखारे में विटामिन और प्रोटीन की ज्‍यादा मात्रा बालों को मजबूत और घना बनाते है। साथ ही विटामिन ई बालों को झड़ने से भी रोकता है। साथ ही यह बालों के प्राकृतिक रंग को भी बरकरार रखता है

गठिया, मधुमेह और कोलेस्‍ट्रॉल से छुटकारा 1 कप अदरक के जूस से

एक कप अदरक के जूस के सेवन से सर्दी जुखाम, पेट की खराबी, गले के दर्द, जोडों के दर्द, मधुमेह, बढे हुए कोलेस्‍ट्रॉल यहां तक कि कैंसर तक से बचाव होता है। तो चलिए जानें कितना फायदेमंद है रोजाना एक कप अदरक का जूस पीना !

अदरक के जूस के फायदे---अदरक एक कमाल की हर्ब है, जिसके बड़े सारे स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं। इसे भोजन बनाने से लेकर रोगों के इलाज तक में प्रयोग किया जाता है। यह ना सिर्फ  खाने का स्‍वाद बढ़ाता है बल्‍कि बीमारियों से भी निजात दिलाने में मदद करता है। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि अदरक खाने के अलावा इसके जूस का सेवन करने के भी कई कमाल के फायदे होते हैं। अदरक का एक कप जूस पिने से कई बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। इसके सेवन से सर्दी-जुखाम, पेट की खराबी, गले के दर्द, जोडों के दर्द, मधुमेह, बढे हुए कोलेस्‍ट्रॉल यहां तक कि कैंसर तक से बचाव होता है।  

कितना फायदेमंद है रोजाना एक कप अदरक का जूस पीना----

मधुमेह को नियंत्रित करे- अदरक में एंटी डायबिटिक गुण होते हैं, जो ब्‍लड शुगर के स्तर को सामान्य बनाए रखने में मदद करते हैं। एक गिलास अदरक के जूस का सेवन आपके फास्‍टिंग ग्‍लूकोज लेवल को भी नियंत्रित कर सकता है।

कैंसर से बचाव में मददगार-- साबुत अदरक में कुछ ऐसे गुणकारी पदार्थ होते हैं, जिसमें एंटी कैंसर गुण होते हैं और वे कैंसर से बचाव में बेहद असरदार भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा अदरक का जूस जहां एक ओ ग्‍लूकोज के स्तर को सामान्य बनाए रखता है वहीं, इससे कोलेस्‍ट्रॉल का स्तर भी कम करने में मदद मिलती है।

गठिया के दर्द में आराम -- एक शोध के अनुसार, अदरक में दर्द कम करने वाले गुण भी होते हैं। गठिया रोग और जोड़ों के दर्द से जूझ रहे लोगों के लिए इसका सेवन लाभदायक होता है। इसका जूस बनाने के लिए अदरक को धोकर इसके छोटे टुकड़े काट लें और जूसर में डाल कर पीसें और जूस निकाल लें। इस जूस में आप नींबू का रस और शहद भी मिला सकते हैं  !