Thursday, 7 September 2017

मिर्गी (अपस्मार ) की विशेष जानकारी ओर सलाह

(    
मिर्गी (अपस्मार )  अंग्रेजी: Epilepsy) एक तंत्रिकातंत्रीय विकार (न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर) है जिसमें रोगी को बार-बार दौरे पड़ते है। मस्तिष्क में किसी गड़बड़ी के कारण बार-बार दौरे पड़ने की समस्या हो जाती है। दौरे के समय व्यक्ति का दिमागी संतुलन पूरी तरह से गड़बड़ा जाता है और उसका शरीर लड़खड़ाने लगता है। इसका प्रभाव शरीर के किसी एक हिस्से पर देखने को मिल सकता है, जैसे चेहरे, हाथ या पैर पर। इन दौरों में तरह-तरह के लक्षण होते हैं, जैसे कि बेहोशी आना, गिर पड़ना, हाथ-पांव में झटके आना। मिर्गी किसी एक बीमारी का नाम नहीं है। अनेक बीमारियों में मिर्गी जैसे दौरे आ सकते हैं। मिर्गी के सभी मरीज एक जैसे भी नहीं होते। किसी की बीमारी मध्यम होती है, किसी की तेज। यह एक आम बीमारी है जो लगभग सौ लोगों में से एक को होती है। इनमें से आधों के दौरे रूके होते हैं और शेष आधों में दौरे आते हैं, उपचार जारी रहता है। अधिकतर लोगों में भ्रम होता है कि ये रोग आनुवांशिक होता है पर सिर्फ एक प्रतिशत लोगों में ही ये रोग आनुवांशिक होता है। विश्व में पाँच करोड़ लोग और भारत में लगभग एक करोड़ लोग मिर्गी के रोगी हैं। विश्व की कुल जनसँख्या के ८-१० प्रतिशत लोगों को अपने जीवनकाल में एक बार इसका दौरा पड़ने की संभावना रहती है। १७ नवम्बर को विश्व भर में विश्व मिरगी दिवस का आयोजन होता है। इस दिन तरह-तरह के जागरुकता अभियान और उपचार कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता हैमानव मस्तिष्क कई खरब तंत्रिका कोशिकाओं से निर्मित होता है। इन कोशिकाओं की क्रियाशीलता कार्य-कलापों को नियंत्रित करती है। मस्तिष्क के समस्त कोषों में एक विद्युतीय प्रवाह होता है जो नाड़ियों द्वारा प्रवाहित होता है। ये सारे कोष विद्युतीय नाड़ियों के माध्यम से आपस में संपर्क बनाये रखते हैं, लेकिन कभी मस्तिष्क में असामान्य रूप से विद्युत का संचार होने से व्यक्ति को एक विशेष प्रकार के झटके लगते हैं और वह मूर्छित हो जाता है। ये मूर्छा कुछ सेकिंड से लेकर ४-५ मिनट तक चल सकती है। मिर्गी रोग दो प्रकार का हो सकता है आंशिक तथा पूर्ण। आंशिक मिर्गी में मस्तिष्क का एक भाग अधिक प्रभावित होता है। पूर्ण मिर्गी में मस्तिष्क के दोनों भाग प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार अनेक रोगियों में इसके लक्षण भी भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रायः रोगी व्यक्ति कुछ समय के लिए चेतना खो देता है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार सूअर की आंतों में मिलने वाले फीताकृमि के संक्रमण से भी मिर्गी की संभावना रहती है। इस कृमि का सिस्ट यदि किसी प्रकार मस्तिष्क में पहुँच जाए तो उसके क्रियाकलापों को प्रभावित कर सकता है, जिससे मिर्गी की आशंका बढ़ जाती है।दौरों की अवधि कुछ सेकेंड से लेकर दो-तीन मिनट तक होती है। और यदि यह दौरे लंबी अवधि तक के हों तो चिकित्सक से तत्काल परामर्श लेना चाहिये। कई मामलों में मिरगी की स्थिति पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अलग होती है। दोनों की स्थिति में अंतर का प्रमुख कारण महिलाओं और पुरुषों में शारीरिक और सामाजिक अंतर का होना होता है। जब रोगी को दौरे आ रहे हों, या बेहोश पडा हो, झटके आ रहे हों तो उसे साफ, नरम जगह पर करवट से लिटाकर सिर के नीचे तकिया लगाकर कपडे ढीले करके उसके मुंह में जमा लार या थूक को साफ रुमाल से पोंछ देना चाहिये। दौरे का काल और अंतराल समय ध्यान रखना चाहिये। ये दौरे दिखने में भले ही भयानक होते हों, पर असल में खतरनाक नहीं होते। दौरे के समय इसके अलावा कुछ और नहीं करना होता है, व दौरा अपने आप कुछ मिनटों में समाप्त हो जाता है। उसमें जितना समय लगना है, वह लगेगा ही। ये ध्यान-योग्य है कि रोगी को जूते या प्याज नहीं सुंघाना चाहिये। ये गन्दे अंधविश्वास हैं व बदबू व कीटाणु फैलाते हैं। इस समय हाथ पांव नहीं दबाने चाहिये न ही हथेली व पंजे की मालिश करें क्योंकि दबाने से दौरा नहीं रुकता बल्कि चोट व रगड़ लगने का डर रहता है। रोगी के मुंह में कुछ नहीं फंसाना चाहिये। यदि दांतों के बीच जीभ फंसी हो तो उसे अंगुली से अंदर कर दें अन्यथा दांतों के बीच कटने का डर रहता है।
मिरगी के रोगी सामान्य खाना खा सकते हैं अतएव उन्हें भोजन का परहेज नहीं रखना चाहिये। इस अवस्था में व्रत, उपवास, रोजे आदि रखने से कुछ रोगियों में दौरे बड़ सकते हैं अतः इनसे बचना चाहिये। यदि अन्न न लेना हो तो दूध या फलाहार द्वारा पेट आवश्यक रूप से भरा रखना चाहिये।
वस्तुत: अपस्मार या मिर्गी तंत्रिकातंत्रीय विकार (neurological disorder) के कारण होता है। ये बीमारी मस्तिष्क के विकार के कारण होती है। यानि मिर्गी का दौरा पड़ने पर शरीर अकड़ जाता है जिसको अंग्रेजी में सीज़र डिसॉर्डर ( seizure disorder) भी कहते हैं।वैसे तो इस बीमारी का पता 3000 साल पहले लग चुका था लेकिन इस बीमारी को लेकर लोगों के मन में जो गलत धारणाएं हैं उसके कारण इसका सही तरह से इलाज की बात करने की बात लोग सोचते बहुत कम हैं। ग्रामीण इलाकों में लोग इस बीमारी को भूत-प्रेत का साया समझते हैं और उसका सही तरह से इलाज करवाने के जगह पर झाड़-फूंक करवाने ले जाते हैं। यहां कि तक लोग मिर्गी के मरीज़ को पागल ही समझ लेते हैं। जिन महिलाओं को मिर्गी का रोग होता है उनकी शादी होनी मुश्किल होती है क्योंकि लोग मानते हैं कि मिर्गी के मरीज़ को बच्चा नहीं हो सकता है या बच्चे भी माँ के कारण इस बीमारी का शिकार हो जाते हैं। मिर्गी का मरीज़ पागल नहीं होता है वह आम लोगों के तरह ही होता है। उसकी शारीरिक प्रक्रिया भी सामान्य होती है। मिर्गी का मरीज़ शादी करने के योग्य होता/होती है और वे बच्चे को जन्म देने की भी पूर्ण क्षमता रखते हैं सिर्फ उनको डॉक्टर के तत्वाधान में रहना पड़ता है।
कारण--- मस्तिष्क का काम न्यूरॉन्स के सही तरह से सिग्नल देने पर निर्भर करता है। लेकिन जब इस काम में बाधा उत्पन्न होने लगता है तब मस्तिष्क के काम में प्रॉबल्म आना शुरू हो जाता है। इसके कारण मिर्गी के मरीज़ को जब दौरा पड़ता है तब उसका शरीर अकड़ जाता है, बेहोश हो जाते हैं, कुछ वक्त के लिए शरीर के विशेष अंग निष्क्रिय हो जाता है आदि। वैसे तो इसके रोग के होने के सही कारण के बारे में बताना कुछ मुश्किल है। कुछ कारणों के मस्तिष्क पर पड़ सकता है असर, जैसे-
• सिर पर किसी प्रकार का चोट लगने के कारण।
• जन्म के समय मस्तिष्क में पूर्ण रूप से ऑक्सिजन का आवागमन न होने पर।
• ब्रेन ट्यूमर।
• दिमागी बुखार (meningitis) और इन्सेफेलाइटिस (encephalitis) के इंफेक्शन से मस्तिष्क पर पड़ता है प्रभाव।
• ब्रेन स्ट्रोक होने पर ब्लड वेसल्स को क्षति पहुँचती है।
• न्यूरोलॉजिकल डिज़ीज जैसे अल्जाइमर रोग।
• जेनेटिक कंडिशन।
• कार्बन मोनोऑक्साइड के विषाक्तता के कारण भी मिर्गी का रोग होता है।
• ड्रग एडिक्शन और एन्टीडिप्रेसेन्ट के ज्यादा इस्तेमाल होने पर भी मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ सकता है।
डॉ. अर्जुन श्रीवास्तव, न्यूरोसर्जन और स्पाइन ट्रस्ट इंडिया के ट्रस्टी के अनुसार बच्चों में लगभग तीस प्रतिशत मामलों में पांच वर्षों से पहले इस बीमारी के होने की संभावना नजर आती है।
लक्षण---वैसे तो मिर्गी का दौरा पड़ने पर बहुत तरह के शारीरिक लक्षण नजर आते हैं। मिर्गी का दौरा पड़ने पर मरीज़ के अलग-अलग लक्षण हो सकते हैं। लेकिन कुछ आम लक्षण मिर्गी के दौरा पड़ने पर नजर आते हैं, वे हैं-
• अचानक हाथ,पैर और चेहरे के मांसपेशियों में खिंचाव उत्पन्न होने लगता है।
• सर और आंख की पुतलियों में लगातार मूवमेंट होने लगता है।
• मरीज़ या तो पूर्ण रूप से बेहोश हो जाता है या आंशिक रूप से मुर्छित होता है।
• पेट में गड़बड़ी।
• जीभ काटने और असंयम की प्रवृत्ति।
• मिर्गी के दौरे के बाद मरीज़ उलझन में होता है, नींद से बोझिल और थका हुआ महसूस करता है।
विज्ञान के अनुसार मिर्गी रोग का निर्धारण मरीज़ के मेडिकल हिस्ट्री को देखकर ही पता लगाया जा सकता है। मरीज़ के घर के लोग या दोस्त परिजन मरीज़ के दौरे के समय ही हालत और शारीरिक प्रक्रिया में बदलाव के बारे में सही तरह से बयान कर सकते हैं। डॉक्टर मरीज़ के पल्स रेट और ब्लड प्रेशर को चेक करने के साथ-साथ न्यूरोलॉजिकल साइन को भी एक्जामीन करते हैं। इसके अलावा डॉक्टर इस रोग का पता ई.ई.जी (electroencephalogram (EEG), सी.टी.स्कैन या एम.आर.आई (CT scan or MRI) और पेट (positron emission tomography (PET) scan) के द्वारा लगाते हैं।
उपचार-----मिर्गी के रोग का एक ही उपचार हो सकता है, वह है दौरे के समय सीज़र को कंट्रोल में करना। इसके लिए एन्टी एपिलेप्टिक ड्रग (anti-epileptic drug (AED) थेरपी और सर्जरी होती है। र जिन लोगों पर ये ड्रग काम नहीं करता है उन्हें सर्जरी करने की सलाह दी जाती है।
खानपान- रिसर्च के अनुसार मिर्गी के रोगी को ज्यादा फैट वाला और कम कार्बोहाइड्रेड वाला डायट लेना चाहिए। इससे सीज़र पड़ने के अंतराल में कमी आती है।
रोकथाम---मिर्गी रोग होने का कारण सही तरह से पता नहीं होने के वजह से रोकथाम का भी पता सही तरह से चल नहीं पाया है। प्रेगनेंसी के दौरान सही तरह से देखभाल करने पर शिशुओं में होने की संभावना को कम किया जा सकता है। जेनेटिक स्क्रीनिंग होने से माँ को बच्चे में इसके होने का पता चल जाता है। सिर में चोट लगने की संभावना को कम करने से कुछ हद तक इस रोग के होने की खतरे को कम किया जा सकता है।
मिर्गी का दौरा बार-बार पड़ने की संभावना को कम करने के लिए-
• डॉक्टर द्वारा दिए गए दवा का सही तरह सेवन करनाः
• पर्याप्त नींद और एक ही समय में सोने की आदत का पालन करना।
• तनाव से दूर रहें।
• संतुलित आहार।
• नियमित रूप से चेक-अप करवाते रहें।
मिर्गी का प्राथमिक उपचार  -
प्राकृतिक उपचार की दृष्टि से देखा जाए तो मिर्गी का दौरा तब पड़ता है जब शरीर में खान पान की वजह से विषैला पदार्थ इक्कठा हो जाता है. अगर आपके सामने किसी व्यक्ति को दौरा पड़ जाए तो सबसे पहले उसके आसपास की हवा को ना रुकने दें, फिर उसे दाई या फिर बायीं करवट में लिटा दें, इसके बाद उसके मुहँ पर पानी के छीटें मारते रहें, किसी तरह उसका मुहँ खोलें और उसके दांतों के नीचे कोई कपड़ा या कुछ रख दें, इससे रोगी की जीभ काटने से बचती है. ध्यान रहें कि ना तो उसे कुछ खिलाने का प्रयास करें और ना ही कुछ पिलाने का.
मिर्गी के रोगी के लिए उपचार ( Home Treatment for Epilepsy Attack ) :
·     तुलसी और सीताफल ( Basil and Pumpkin ) : मिर्गी का दौरा आने पर रोगी की नाक में तुलसी के रस और सेंधा नमक के मिश्रण को टपकायें. अगर आसपास तुलसी का पौधा ना हो तो उसकी नाक में सीताफल के पत्तों का रस डालें.
·     करौंदे ( Gooseberry ) : मिर्गी से पीड़ित रोगियों को समय समय पर करौंदे के पत्तों से बनी चटनी का सेवन करना चाहियें. अगर वे रोग इसे खा सके तो ये उनके लिए अधिक बेहतर रहेगा.
·     सफ़ेद प्याज ( White Onion ) : साथ ही रोगियों को रोजाना 1 चम्मच सफ़ेद प्याज का रस पानी के साथ पीना चाहियें, इससे उनको दौरे आने बंद हो जाते है.
·     शहतूत ( Mulberry ) : रोगी को होश में आने के बाद शहतूत और सेब का रस निकालकर उसमें थोड़ी हिंग मिलाकर खिलानी चाहियें ताकि दौरे का प्रभाव शीघ्र खत्म हो सके और वो जल्द ही सामान्य हो जाए.
·     सुंघायें ( Smell These ) : रोगी को पानी में पीसी हुई राई, कपूर, तुलसी रस, लहसुन रस, आक की जड़ की छाल का रस, नीम्बू रस व हिंग में से किसी भी चीज को सुंघाया जा सकता है.
 व्यायाम : नित्य प्रतिदिन घुमने और व्यायाम करने से आपके मन को शान्ति मिलेगी और आपका शरीर भी स्वस्थ व रोगमुक्त रहेगा. आसनों में शीर्षासन और सर्वांगासन आपके लिए सर्वोताम है किन्तु ध्यान रहे कि आसन खाली पेट करने है. हल्के व्यायाम के बाद आपको बाथटब में नहाना चाहियें. नहाने के बाद ढीले और आरामदेह कपड़ों पहने ताकि शरीर में हवा आती जाती रहे और आपको घुटन महसूस ना हो
 दिनचर्या : कहीं भी अकेले ना जाएँ,सीढ़ी भी ना चढ़ें और चढ़ें तो किसी को साथ लेकर चढ़ें,आग और पानी से दूर रहें, साइकिल या गाडी ना चलायें,गुस्सा या झगडा ना करें, अधिक ऊँचे स्थान पर ना जाएँ, अगर मल या मूत्र त्याग के लिए जाना है तो तुरंत चले जाएँ इन्हें रोकने की कोशिश ना करें, करवट लेकर सोयें, सोते वक़्त ध्यान रखें कि आपका सिर उत्तर दिशा में हो.

Wednesday, 6 September 2017

किडनी रोग - लक्षण - आहार

हमारे शरीर के हानिकारक पदार्थो को शरीर से छानकर बाहर निकलने का काम किडनी का ही होता है! किडनी हमारे शरीर के लिए रक्त शोधक का काम करती है, हम जो कुछ भी खाते है उसमे से विषैले तत्वों और नुकसान पहुचने वाले पदार्थो को यूरिनरी सिस्टम (मूत्राशय) के जरिये बाहर निकाल देती है जिससे के शरीर ठीक तरीके से काम कर सके और जहरीले तत्व कोई हानि नहीं पंहुचा सके!
हमें देश में दिन प्रति दिन ये बीमारी विकराल रूप से बड रही हैऔर इस बीमारी की वजह से लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते है! दुख की बात तो ये है के इस बीमारी का बहुत देर से पता चलता  है जब तक किडनी 60-65% तक ख़राब हो चुकी होती है! इस रोग में बहूत सावधानी बरतनी पड़ती है!

किडनी रोग के लक्षण क्या है ?

इस रोग का पता वैसे तो जल्दी नहीं लग पता लेकिन अगर सावधानी रखी जाए और लक्षणों पर गौर किया जाए तो निम्न लक्षण के जरिये इसका पता चलता है-
Although It is hard to know kidney disease in early stage, but if we keep awareness and look on its symptoms then we can know about this disease.
  • हाथ पैर व आँखों के नीचे का भाग में सुजन आ जाती है!- Swelling on hand and under eye.
  • रोगी को भूख नहीं लगती है और शरीर में खून की कमी होने लगती है!- Patient will not feel hungry and he or she may suffer with anemia disease.
  • शरीर में खुजली होना, बार बार मूत्र आना, कमजोरी महसूस होती है!- patient feels itching and feels to pass urine many times.
  • शरीर पीला पड़ जाता है व उलटी होने के साथ जी मचलाता है!
  • सांसे फूलने लगती है और हाजमा भी खराब रहता है! Patient feels constipation and his digestion system do not works well.

किडनी के रोग को 4 भागो (4 stages )में बाटा गया है ! 

इस रोज के चरणों को पहचानने के लिए इसे विभिन्न भागो में बांटा गया है, जिसके जरिये रोगी की स्थिति का पता चलता है और उसी के हिसाब से उसका इलाज सही प्रकार से किया जा सकता है!-

किडनी रोग का पहला चरण (Kidney Disease First Stage): 

नार्मल क्रीयेटीनिन, एक पुरुष के 1 डेसिलीटर खून में .6-1.2 मिलीग्राम और एक महिला के खून में 0.5-1.1 मिलीग्राम EGFR (Estimated Glomerular Filtration rate) सामान्यत: ९० या उससे ज्यादा होता है!

दूसरा चरण ( Second Stage):

इस stage में EGFR कम हो जाता है जो 90% - 60% तक हो जाता है, लेकिन फिर भी क्रीयेटीनिन सामान्य ही रहता है! लेकिन मूत्र में प्रोटीन ज्यादा आने लगता है!

तीसरा चरण (Third Stage):

इस stage में EGFR और घट जाता है जो 60-30 के बीच हो जाता है और क्रीयेटीनिन बढ़ जाता है! इस चरण में ही किडनी रोग के लक्षण दिखाई पड़ने लगते है, पेशाब में यूरिया बढ़ने से खुजली होने लगती है, मरीज एनेमिया से भी ग्रसित हो सकता है!

चौथा चरण (Forth Stage): 

इस चरण में EGFR 30-50 तक आ जाता है और थोरी सी भी लापरवाही खतरनाक हो सकती है इसमे क्रीयेटीनिन भी 2-4 के बीच हो जाता है! अगर सावधानी नहीं बरती गई तो डायलेसिस या फिर ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है!

पाचवां चरण (Fifth Stage):

इसमे EGFR 15 से नीचे (कम ) हो जाता है तथा क्रीयेटीनिन 4-5 या अधिक होता है  इसमे मरीज को डायलेसिस या ट्रांसप्लांट तक करानी पड़ जाती है!

किडनी रोग का इलाज क्या है? Kidney Disease Treatment

इसके इलाज में रोगी को रीनल रिप्लेसमेंट की जरूरत पड़ती है, वैसे तो पूर्णता: इलाज किडनी ट्रांसप्लांट के द्वारा ही हो सकता है! परन्तु जब तक मरीज का ट्रांसप्लांट नहीं हो जाता है तब तक डायलेसिस के जरिये ही काम लिया जा सकता है! वैसे तो डॉक्टर्स का कहना है के खाने पिने में लापरवाही ना की जाए और खाना ठीक प्रकार से लिया जाए तो डायलेसिस से भी काम चल जाता है! इसमे रोगी को अपना खाना डाइट चार्ट के हिसाब से लेना चाहिए और रोजाना बिना किसी प्रकार के लापरवाही किये नियमित तरीके से रूटीन फॉलो करते हुए डायलेसिस समय समय पर करवाता रहे तो वो काफी लम्बे समय तक (कई सालो तक) जीवित रह सकता है!

किडनी ट्रांसप्लांट स्थाई इलाज व उपाय है (Kidney Transplant is Permanent Solution):

डायलेसिस तो अस्थाई इलाज है इस बीमारी का पूर्णता: ठीक होने ले लिए किडनी ट्रांसप्लांट जरूरी होता है इस रोग में! इसके लिए मरीज को किडनी प्रदान करने वाले किसी डोंनर (Donner) की जरूरत होती है जिसका ब्लड ग्रुप मरीज के साथ मिलना जरूरी होता है! इसमे ट्रांसप्लांट के वक़्त दोनों व्यक्तियों का (मरीज और किडनी डोंनर) के शरीर से टिश्यू लेकर उसका मिलान किया जाता है!
इस बीच कई दुसरे जरूरी टेस्ट भी किये जाते है! जिससे ये पता चलता है के ट्रांसप्लांट के लिए डोंनर और मरीज दोनों के लिए सब ठीक है के नहीं! ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया के बाद किडनी प्रदान करने वाला यक्ति तो केवल कुछ दिन में ही अपनी जिंदगी सामान्य तरीके से जीना शुरू कर देता है, लेकिन रोगी को फिर भी कुछ समय तक सावधानी की जरूरत पड़ती है!

किडनी रोगों में आहार----- 

किडनी रोगों में प्रोटीन, सोडियम और पोटैशियम की मात्रा कम लेनी चाहिए. ये तत्व अधिक मात्रा में लेने पर हानिकारक हैं, जबकि शरीर के लिए जरूरी भी हैं. इस कारण इन्हें पूरी तरह से लेना बंद भी नहीं किया जा सकता है. अत: इस रोग में डायट के मामले में काफी परहेज रखना पड़ता है ! किडनी शरीर से अनावश्यक और जहरीले पदार्थों को बाहर निकाल कर डिटॉक्सीफिकेशन का कार्य करता है. किडनी की विभिन्न बीमारियों और विभिन्न अवस्थाओं में खान-पान का परहेज अलग-अलग होता है. यह कई बातों पर निर्भर करता है. खान-पान में परहेज करके किडनी के कई रोगों से बचा जा सकता है. इसके परहेज में मुख्यत: प्रोटीन, पोटैशियम, सोडियम, फॉस्फोरस व तरल पदार्थों की मात्रा आती है. सामान्यत: जानकारी के अभाव में मरीज अनावश्यक परहेज करने लगते हैं, जिससे भोजन स्वादहीन, रंगहीन और पौष्टिकता विहीन हो जाता है. लगातार ऐसा भोजन करने से मरीज शिकायत करने लगते हैं कि धीरे-धीरे जीभ का स्वाद जा रहा है.
 
ये सावधानियां बरतें- 
प्रोटीन : प्रोटीन की मात्रा संयमित की जाती है. ज्यादा प्रोटीन बीमारी बढ़ा सकता है. चूंकि प्रोटीन कोशिकाओं और शारीरिक क्रियाकलापों के लिए जरूरी है. अत: इसे बंद करने के बजाय कम किया जाता है. सामान्यत: किडनी रोग में 0.5-0.8 मिग्रा/ किलोग्राम रोज के हिसाब से प्रोटीन युक्त फूड दिया जाता है.
 
सोडियम : एक चम्मच नमक दिन भर के लिए काफी है. प्रोस्सड फूड, जंक फूड आदि में ज्यादा मात्रा में सोडियम और प्रिजर्वेटिव होते हैं. अत: इनसे बचना चाहिए. दो ग्राम नमक में 400 मिग्रा सोडियम होता है.
 
पोटैशियम : गुरदे की कुछ बीमारियों में पोटैशियम की मात्रा बढ़ने लगती है, जो खतरनाक है. भोजन में पोटैशियम की मात्रा का निर्धारण बीमारी के स्तर को देख कर किया जाता है.
 
फॉस्फोरस : ज्यादा मात्रा में फॉस्फोरस किडनी फेल्योर के साथ-साथ हड्डी रोग या हृदय रोग के लिए भी जिम्मेदार हो सकता है. इसकी मात्रा भी संतुलित होनी चाहिए.
 
पेय-पदार्थ : पानी तभी पीएं जब ज्यादा प्यास लगी हो. 500-700 मिली पानी रोज अन्य पेय पदार्थों के अलावा दिया जाता है. नमक ज्यादा खाने से प्यास भी ज्यादा लगती है. ज्यादा प्यास लगने पर मुंह पोंछने से लाभ होता है.
 
भोजन में स्वाद बढ़ाने के लिए नीबू, शिमला मिर्च, लहसुन, प्याज का प्रयोग करें. इनमें पोटैशियम कम और विटामिन सी, ए , बी 6, फॉलिक एसिड, फाइबर इत्यादि अच्छी मात्रा में होता है, जो लाभदायक है.
 
बाजरा, ज्वार, मकई, चना, चना दाल, मटर, खेसारी दाल, लाल चना, धनिया पत्ती, अरबी, शक्करकंद, मूली, बैगन, कटहल, धनिया, जीरा, गाय व बकरी का दूध, फूलगोभी, चुकंदर, कटहल मीटर, शरबत, आइसक्रीम, मिल्क शेक, आचार, पापड़, चटनी, बेकिंग पाउडर इत्यादि. स्किम्ड मिल्क, छाछ, कद्दू, खीरा, भिंडी, हरा पपीता, झिंगनी, कुम्हरा, परवल, करेला, आलू, गाजर, सेब, अंगूर, पपीता (हल्का उबाल कर पानी हटा देने से सोडियम-पोटािशयम की मात्रा में कमी आ जाती है) अत: इन्हें किडनी रोग में दे सकते हैं

Tuesday, 5 September 2017

वात रोग – आयुर्वेद

आयुर्वेदिक ग्रन्थों के अनुसार वात 80 प्रकार का होता है एवं इसी से सामंजस्य रखता हुआ एक और रोग है जिसे बाय या वायु कहते हैं। यह 84 प्रकार का होता है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि जब वात एवं वायु के इतने प्रकार हैं, तो, यह कैसे पता लगाया जाय कि यह वात रोग है या बाय एवं यह किस प्रकार का है ? यह कठिन समस्या है और यही कारण है कि इस रोग की उपयुक्त चिकित्सा नहीं हो पाती है, जिससे इस रोग से पीड़ित 50 प्रतिशत व्यक्ति सदैव परेशान रहते हैं। उन्हें कुछ दिन के लिए इस रोग में राहत तो जरूर मिलती है, परन्तु पूर्णतया सही नहीं हो पाता है। इस रोग की चिकित्सा एलोपैथी के माध्यम से पूर्णतया सम्भव नहीं है, जबकि आयुर्वेद के माध्यम से इसे आज कल 90 प्रतिशत तक जरूर सही किया जा सकता है,
वात रोग लक्षण एवं परेशानी- इस रोग के कारण शरीर के सभी छोटे-बडे़ जोडो़ं व मांसपेशियों में दर्द व सूजन हो जाती है। गठिया में शरीर के एकाध जोड़ में प्रचण्ड पीड़ा के साथ लालिमायुक्त सूजन एवं बुखार तक आ जाता है। यह रोग शराब व मांस प्रेमियों को सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा जल्दी पकड़ता है। यह धीरे-धीरे शरीर के सभी जोड़ों तक पहुँचता है। संधिवात उम्र बढ़ने के साथ मुख्यतः घुटनों एवं पैरों के मुख्य जोड़ों को क्रमशः अपनी गिरफ्त में लेता हैं।
वात रोग की शुरूआत धीरे-धीरे होती है। शुरू में सुबह उठने पर हाथ पैरों के जोडा़ें में कड़ापन महसूस होता है और अंगुलियाँ चलाने में परेशानी होती है। फिर इनमें सूजन व दर्द होने लगता है और अंग-अंग दर्द से ऐंठने लगता है जिससे शरीर में थकावट व कमजोरी महसूस होती है। साथ ही रोगी चिड़चिड़ा हो जाता है। इस रोग की वजह सेे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम पड़ जाती है। इसी के साथ छाती में इन्फेक्शन, खांसी, बुखार तथा अन्य समस्यायें उत्पन्न हो जाती है। साथ ही चलना फिरना रुक जाता है।
इन सबसे खतरनाक कुलंग वात होता है। यह रोग कुल्हे, जंघा प्रदेश एवं समस्त कमर को पकड़ता है एवं रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करता है। इस रोग में तीव्र चिलकन (फाटन) जैसा तीव्र दर्द होता है और रोगी बेचैन हो जाता है, यहाँ तक कि इसमें मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। यह रोग की सबसे खतरनाक स्टेज होती हैै। इस का रोगी दिन-रात दर्द से तड़पता रहता है और कुछ समय पश्चात् चलने-फिरने के काबिल भी नहीं रह जाता है। वह पूर्णतया बिस्तर पकड़ लेता है और चिड़चिड़ा हो जाता है।
लक्षण --- हाइपरयूरीसेमिया, वात रोग का मूल कारण होता है। यह कई कारणों से हो सकता है, जिनमें आहार, आनुवंशिक गड़बड़ी, या यूरेट, यूरिक एसिड के लवणों का कम उत्सर्जन शामिल हैं। लगभग 90% मामलों में हाइपरयूरीसेमिया का मुख्य कारण गुर्दों में यूरिक एसिड का कम उत्सर्जन होता है, जब कि ज़रुरत से अधिक उत्पादन 10% के कम मामलों में कारण होता है। हाइपरयूरीसेमिया वाले लगभग 10% लोगों में उनके जीवन काल में किसी न किसी बिंदु पर वात रोग विकसित हो जाता है। लेकिन, हाइपरयूरीसेमिया के स्तर के आधार पर, जोखिम अलग-अलग हो सकता है। जब स्तर 415 और 530 माइक्रोमोल/लीटर (7 और 8.9 मिलीग्राम/डेसीलीटर) के बीच हों, तो जोखिम 0.5% प्रति वर्ष होता है, जब कि 535 माइक्रोमोल/लीटर (9 मिलीग्राम/डेसीलीटर) से ऊपर के स्तरों वाले लोगों में यह जोखिम 4.5% प्रति वर्ष होता है

जीवन शैली---- लगभग 12% वात रोग का कारण आहार से संबंधित होता है और इसमें अल्कोहल, फ्रक्टोज-से मीठे किये गये पेय, मीट और समुद्री भोजन के उपभोग के साथ मज़बूत संबंध होता है। अन्य ट्रिगरों में शारीरिक बड़ी चोट और सर्जरी शामिल हैं। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि आहार से संबंधित कारक जिन्हें कभी संबंधित समझा जाता था, वास्तव में संबंधित नहीं हैं, जिनमें प्यूरीन-से भरपूर सब्जियों (जैसे, सेम, मटर, मसूर और पालक) और कुल प्रोटीन का सेवन शामिल है। कॉफी, विटामिन Cऔर डेयरी उत्पादों का सेवन और साथ ही शारीरिक तंदरुस्ती, जोखिम को कम करते प्रतीत होते हैं। माना जाता है कि यह आंशिक रूप से इंसुलिन प्रतिरोध को कम करने में उनके प्रभाव के कारण है !

वात रोग प्यूरीन चयापचय का एक विकार है, और उस समय होता है जब इसका अंतिम मेटाबोलाइट, यूरिक एसिड, मोनोसोडियम यूरेट के रूप में क्रिस्टलीकृत हो कर जोड़ों में, स्नायुओं पर और आसपास के ऊतकों में नीचे बैठ जाता है। उसके बाद यह क्रिस्टल एक स्थानीय प्रतिरक्षा-कीमध्यस्थता वाली सूजन वाली प्रतिक्रिया शुरू करता है, जिसमें सूजन प्रवाह के मुख्य प्रोटीनों में से एक इंटरल्यूकिन 1β होता है। मनुष्यों में विकास के साथ-साथ यूरीकेस, जो कि यूरिक एसिड को तोड़ता है और प्राइमेट्स की कमी ने इस समस्या को आम बना दिया है।
इस बात को अच्छी तरह से समझा नहीं गया है कि क्या चीज़ यूरिक एसिड का अवक्षेपण शुरू करती है। जब कि यह सामान्य स्तरों पर क्रिस्टलों में परिवर्तित हो सकता है, स्तरों के बढ़ने पर ऐसा होने की अधिक संभावना होती है। गठिया का एक तीव्र प्रकरण शुरू करने में महत्वपूर्ण माने जाते अन्य कारकों में ठंडे तापमान, यूरिक एसिड के स्तरों में तेजी से बदलाव, एसिडोसिस, जोड़ जलयोजन और बाह्य मैट्रिक्स प्रोटीन, जैसे कि प्रोटियोग्लाईकैन्स, कोलेजन औरचोन्ड्रोयटिन सल्फेट शामिल है। कम तापमानों पर क्रिस्टलों के अवक्षेपण की बढ़ी हुई क्रिया आंशिक रूप से इस बात की व्याख्या करती है कि पैरों के जोड़ सबसे अधिक क्यों प्रभावित होते हैं। यूरिक एसिड में तेजी से बदलाव, कई कारणों से हो सकते हैं जिनमे आघात, शल्य चिकित्सा, कीमोथेरेपी, मूत्रवर्धक दवाइयां और एलोप्यूरिनॉल को रोकना या शुरू करना शामिल हैं।उच्च रक्तचाप के लिए अन्य दवाओं की तुलना में कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स और लोसार्टन को वात रोग के कम जोखिम के साथ जोड़ा जाता है !

सोरिआसिस ( छाल रोग )

छालरोग या सोरियासिस (अंग्रेज़ी:Psoriasis) एक चर्मरोग है। सामान्य भाषा में इसे अपरस भी कहते हैं। यह रोग एक असंक्रामक दीर्घकालिक त्वचा विकार है जो कि परिवारों के बीच चलता रहता है। छाल रोग सामान्यतः बहुत ही मंद स्थिति का होता है। इसके कारण त्वचा पर लाल-लाल खुरदरे धब्बे बन जाते हैं। यह दीर्घकालिक विकार है जिसका अर्थ होता है कि इसके लक्षण वर्षों तक बने रहेंगे। ये पूरे जीवन में आते-जाते रहते हैं। यह स्त्री-पुरुष दोनों ही को समान रूप से हो सकता है। इसके सही कारणों की जानकारी नहीं है। अद्यतन सूचना से यह मालूम होता है कि सोरिआसिस निम्नलिखित दो कारणों से होता हैः
  • वंशानुगत पूर्ववृत्ति
  • स्वतः असंक्राम्य प्रतिक्रिया 
  • पहचान ------ लाल खुरदरे धब्बे, त्वचा के अनुपयोगी परत में त्वचा कोशिकाओं की संख्या बढ़ जाने के कारण पैदा होते हैं। सामान्यतः त्वचा कोशिकाएं पुरानी होकर शरीर के तल से झड़ती रहती है। इस प्रक्रिया में लगभग 4 सप्ताह का समय लग जाता है। कुछ व्यक्तियों को सोरिआसिस होने पर त्वचा कोशिकाएं 3 से 4 दिन में ही झड़ने लगती है। यही अधिकाधिक त्वचा कोशिकाओं का झड़ाव त्वचा पर छालरोग के घाव पैदा कर देता है। छालरोग में त्वचा पर लाल, खुरदरे धब्बे, खुजली और मोटापा, चिटकना और हथेलियों या पैर के तलवों में फफोले पड़ना, के लक्षण से पहचाने जाते हैं। ये लक्षण हल्के-फुल्के से लेकर भारी मात्रा में होते हैं। इससे विकृति और अशक्तता की स्थिति पैदा हो सकती है।
    कुछ कारक है जिनसे छाल रोग से पीड़ित व्यक्तियों में चकते पड़ सकते हैं। इन कारकों में त्वचा की खराबी (रसायन, संक्रमण, खुरचना, धूप से जलन) मद्यसार, हार्मोन परिवर्तन, धूम्रपान, बेटा-ब्लाकर जैसी औषधी तथा तनाव सम्मिलित हैं। छाल रोग से व्यक्तियों पर भावनात्मक तथा शारीरिक प्रभाव पड़ सकते हैं। छाल रोग आर्थरायटिस वाले व्यक्तियों को होते हैं। इससे दर्द होता है तथा इससे व्यक्ति अशक्त भी हो सकता है। छाल रोग संक्रामक नहीं है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को नहीं लगता ! प्राय सोरायसिस के रोगी अपने इस रोग को आम दाद-खाज खुजली के रोग से जोड़कर लंबे समय तक इसका उपचार कराने से कतराते रहते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि जब यह रोग काफी पुराना तथा जटिल हो जाता है तब रोगी इसके इलाज के लिए चिंतित होता है। रोग के संदर्भ में विशेष बात यह ध्यान देने योग्य है कि रोग जितना पुराना हो जाता है उसके उपचार में उतना ही समय लगता है 
  • क्या है सोरायसिस
    मनुष्य की सामान्य त्वचा पर सोरायसिस रोग पपड़ीदार, रक्तिम;रक्तवर्णितद्ध वह विकार है जो चकतों के रूप में अलग से उभरे होते हैं। यह कुछ-कुछ मछली की उपरी खाल की तरह होते हैं। यह चकते प्राय हाथ-पैर, घुटनों, कोहनी, सिर के बालों के नीचे और पीठ के निचले हिस्सों पर देखने को मिलते हैं। इन चकतों का आकार मुख्यत 2-4 मिमि से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है, जिनमें खुजली की शिकायत भी रोगी को होती है।  आयुर्वेद में इस रोग को एककुष्ठ कहा जाता है। यह रोग सामान्यतया शरीर में हो जाने वाली दाद-खाज से भिन्न प्रकृति का है। जहां दाद-खाज का घरेलू उपचार संभव है वहीं सोरायसिस के रोगी को चिकित्सकीय उपचार की परम आवश्यकता होती है। उपयुक्त उपचार के अभाव में रोगी के प्राणों पर भी संकट उत्पन्न हो सकता है।
    सोरियासिस (PSORIASIS) "अपरस रोग / छाल रोग" :

    [1] सोरायसिस (Psoriasis) त्वचा पर होने वाली Autoimmune रोग है | जिसके होने से त्वचा का कोशिका मरने लगता है और लाल एवं सफ़ेद धब्बे के रूप में शारीर में दिखने लगता है | यह रोग प्रतिराकक्षा प्रणाली के गलत संदेश के कारण कोशिकाओ की तीव्र वृद्धि दर के कारण उत्पन होता है | लोग इस बीमारी को छुवाछुत मानते है ,परंतू यह बीमारी छुवाछुत के कारण नहीं फैलता है | यह genetic एवं और immune system से सम्बंधित है, न की छुआछुत से | यह बीमारी किसी को भी हो सकता है ,चाहे वो लड़का हो या लड़की | यह शारीर के किसी भी भाग में हो सकता है | एक बार यह किसी के शारीर में होने के बाद ऊम्र भर रह जाता है |
    [2] सोरियासिस / अपरस रोग / छाल रोग (अंग्रेज़ी: PSORIASIS) एक प्रकार का असंक्रामक दीर्घकालिक त्वचा विकार (चर्मरोग) है जो कि परिवारों के बीच चलता रहता है। यह रोग सर्दियों के मौसम में होता है। यह रोग उन व्यक्तियों को होता है जो अधिक परेशानियों से घिरे रहते हैं। छाल रोग सामान्यतया बहुत ही मंद स्थिति का होता है। इसके कारण त्वचा पर लाल-लाल खुरदरे धब्बे बन जाते हैं। यह ऐसा दीर्घकालिक विकार है जिसका यह अर्थ होता है कि इसके लक्षण वर्षों तक बने रहेंगे। ये पूरे जीवन में आते-जाते रहते हैं। यह स्त्री-पुरुष दोनों ही को समान रूप से हो सकता है। सोरियासिस में त्वचा में कोशिकाओं की संख्या बढने लगती है। चमडी मोटी होने लगती है और उस पर खुरंड और पपडियां उत्पन्न हो जाती हैं। इस रोग के भयानक रुप में पूरा शरीर मोटी लाल रंग की पपडीदार चमडी से ढक जाता है। इस रोग का प्रभाव अधिकतर व्यक्तियों की हाथों-पैरों, कलाइयों, कोहनियों, कमर, हथेलियों, घुटनों, खोपडी तथा कंधों पर होता है।
    [3] सोरायसिस रोग जब किसी व्यक्ति को हो जाता है तो जल्दी से ठीक होने का नाम नहीं लेता है। यह छूत का रोग नहीं है। इस रोग का शरीर के किसी भाग पर घातक प्रभाव नहीं होता है। जब यह रोग किसी को हो जाता है तो उस व्यक्ति का सौन्दर्य बेकार हो जाता है तथा वह व्यक्ति भद्दा दिखने लगता है। यदि इस बीमारी के कारण भद्दा रूप न हो और खुजली न हो तो सोरायसिस के साथ आराम से जिया जा सकता है।
    [4] सोरायसिस रोग होने के लक्षण-
    जब किसी व्यक्ति को सोरायसिस हो जाता है तो उसके शरीर के किसी भाग पर गहरे लाल या भूरे रंग के दाने निकल आते है। कभी-कभी तो इसके दाने केवल पिन के बराबर होते हैं। ये दाने अधिकतर कोहनी, पिंडली, कमर, कान, घुटने के पिछले भाग एवं खोपड़ी पर होते हैं। कभी-कभी यह रोग नाम मात्र का होता है और कभी-कभी इस रोग का प्रभाव पूरे शरीर पर होता है। कई बार तो रोगी व्यक्ति को इस रोग के होने का अनुमान भी नहीं होता है। शरीर के जिस भाग में इस रोग का दाना निकलता है उस भाग में खुजली होती है और व्यक्ति को बहुत अधिक परेशान भी करती है। खुजली के कारण सोरायसिस में वृद्धि भी बहुत तेज होती है। कई बार खुजली नहीं भी होती है। जब इस रोग का पता रोगी व्यक्ति को चलता है तो रोगी को चिंता तथा डिप्रेशन भी हो जाता है और मानसिक कारणों से इसकी खुजली और भी तेज हो जाती है।
    सोरायसिस रोग के हो जाने के कारण और भी रोग हो सकते हैं जैसे- जुकाम, नजला, पाचन-संस्थान के रोग, टान्सिल आदि। यदि यह रोग 5-7 वर्ष पुराना हो जाए तो संधिवात का रोग हो सकता है।
    [5] सोरियासिस का शरीर पर प्रभाव क्षेत्र:-
    अपरस रोग में रोगी की त्वचा पर जगह-जगह लाल-लाल से खुरदरे दाग-धब्बे हो जाते हैं। जितने यह दाग-धब्बे भयानक लगते हैं उतनी ज़्यादा इनमें खुजली नहीं होती है। जब यह रोग किसी व्यक्ति के शरीर के किसी भाग पर होता है तो उस भाग की त्वचा का रंग गुलाबी (लाल) होकर सूज जाता है और फिर त्वचा के ऊपर सफेद सादी, सूखी एवं कड़ी खाल (त्वचा की पतली परत) जम जाते हैं। त्वचा सूखकर फट सी जाती है। जब ऊपर की पपड़ी उतरती हैं तो त्वचा से रक्त निकलने लगता हैं। लेकिन इसमें से कुछ मवाद आदि नहीं निकलता। ये लक्षण हल्के-फुल्के से लेकर भारी मात्रा में होते हैं। इससे विकृति और अशक्तता की स्थिति पैदा हो सकती है|
    [6] दीर्घकालिक प्रभाव-
    छाल रोग से व्यक्तियों पर भावनात्मक तथा शारीरिक प्रभाव पड़ सकते हैं। छाल रोग ऑर्थरायटिस वाले व्यक्तियों को होते हैं। इससे दर्द होता है तथा इससे व्यक्ति अशक्त भी हो सकता है। छाल रोग संक्रामक नहीं है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को नहीं लगता।
    [7] सोरायसिस रोग होने का कारण:-
    १=अंत:स्रावी ग्रन्थियों में कोई रोग होने के कारण सोरायसिस रोग हो सकता है।
    २=पाचन-संस्थान में कोई खराबी आने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
    ३=बहुत अधिक संवेदनशीलता तथा स्नायु-दुर्बलता होने के कारण भी सोरायसिस रोग हो सकता है।
    ४=खान-पान के गलत तरीकों तथा असन्तुलित भोजन और दूषित भोजन का सेवन करने के कारण भी सोरायसिस रोग हो सकता है।
    ५=असंयमित जीवन जीने, जीवन की विफलताएं, परेशानी, चिंता तथा एलर्जी के कारण भी यह रोग हो सकता है।
    [8] अति शीघ्र बढ़ने या ख़राब होने का कारण:-
    कुछ कारक है जिनसे छाल रोग से पीड़ित व्यक्तियों में चकते पड़ सकते हैं। इन कारकों में त्वचा की ख़राबी (रसायन, संक्रमण, खुरचना, धूप से जलन) मद्यसार, हार्मोन परिवर्तन, धूम्रपान, बीटा-ब्लाकर जैसी औषधी तथा तनाव सम्मिलित हैं।
    [9] Psoriasis के प्रकार:-
    सोरायसिस के मुख़्य प्रकार जो की उनके लक्षणों और होने वाले भागो के अनुसार बांटे गए है -
    1 -पट्टिका psoriasis:
    यह बात के रोगियों को पीड़ा से psoriasis के सब के साथ 80% psoriasis है के प्रकार व्यापक अधिकांश. यह चांदी सफेद रंग और लाल रंग के धब्बे सूजन के पैमाने से भिन्न है. एक यह घुटने, कोहनी, पीठ के निचले हिस्से पर खोज सकते हैं, और खोपड़ी, लेकिन यह कहीं भी हो सकता है.
    2-उलटा छालरोग:
    कांख, स्तनों के नीचे, कमर, त्वचा गुप्तांग क्षेत्र में सिलवटों, नितंबों सबसे आम जगहों पर जहां उलटा छालरोग से पता चला है.
    3-Erythrodermic छालरोग:
    Erythrodermic सोरायसिस बीमारी का सबसे अधिक भाग के भड़काऊ प्रकार है कि अक्सर पूरे शरीर पर फैल रहा है के लिए एक है. Erythrodermic छालरोग अक्सर अस्थिर पट्टिका psoriasis के लिए नेतृत्व कर सकते हैं. प्रासंगिक, व्यापक, उज्ज्वल लालिमा इस अवधि के दौरान त्वचा की मुख्य विशेषताएं हैं.
    4-Guttate छालरोग:
    अभिव्यक्ति छोटे आकार के छोटे लाल धब्बे बचपन या जवानी अवधि में शुरुआत के माध्यम से पता चला है.
    5-Pustular psoriasis:
    एक नियम के रूप में वयस्कों में मनाया, pustular psoriasis के आसपास लालिमा के साथ मवाद के गैर संक्रामक फफोले के माध्यम से प्रकट होता है. रोग के रूप में यह एक संक्रमण नहीं है, नहीं फैलता है.
    6-Palmo पदतल Psoriasis:
    पीपीपी या Palmo पदतल Psoriasis (Palmoplantar Pustulosis) काफी अलग तरह से प्रकट होता है. स्पॉट हथेलियों और तलवों पर स्थित हैं|
    7-कील Psoriasis: नाखून परिवर्तन
    8-खोपड़ी Psoriasis:
    यह सिर के पीछे होता है, लेकिन खोपड़ी के अन्य क्षेत्रों में भी यह हो सकता है.
    9-Psoriatic गठिया:
    Psoriatic गठिया में दर्द होता है और ज्यादा रोग जोड़ों के आसपास सूजन, जोड़ों का दर्द, तराजू, लाली बढ़ती है, त्वचा के घावों psoriatic गठिया के दौरान देखा जाता है.
    [10] रोक थाम:-
    • धूप तीव्रता सहित त्वचा को चोट न पहुंचने दें। धूप में जाना इतना सीमित रखें कि धूप से जलन न होने पाएं।
    • मद्यपान और धूम्रपान न करें।
    • स्थिति को और बिगाड़ने वाली औषधी का सेवन न करें।
    • तनाव पर नियंत्रण रखें।
    • त्वचा का पानी से संपर्क सीमित रखें।
    • फुहारा और स्नान को सीमित करें, तैरना सीमित करें।
    • त्वचा को खरोंचे नहीं।
    • ऐसे कपड़े पहने जो त्वचा के संपर्क में आकर उसे नुकसान न पहुंचाएँ।
    • संक्रमण और अन्य बीमारियाँ हो तो डाक्टर को दिखाएं।
    [11] प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:

    • ज़्यादा मिर्च मसालेदार चीज़ें न खाएं।
    • सोरियासिस या अपरस रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को कम से कम 7 से 15 दिनों तक फलों का सेवन करना चाहिए और उसके बाद फल-दूध पर रहना चाहिए।
    • अपरस रोग से पीड़ित व्यक्ति को यदि कब्ज की शिकायत हो तो उसे गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ़ करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप रोगी का यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
    •अपरस रोग से पीड़ित रोगी को उपचार करने के लिए सबसे पहले उसके शरीर के दाद वाले भाग पर थोड़ी देर गर्म तथा थोड़ी देर ठण्डी सिकाई करके गीली मिट्टी का लेप करना चाहिए। इसके फलस्वरूप अपरस रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
    • रोगी व्यक्ति के अपरस वाले भाग को आधे घण्टे तक गर्म पानी में डुबोकर रखना चाहिए तथा इसके बाद उस पर गर्म गीली मिट्टी की पट्टी लगाने से लाभ होता है।
    • रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक प्रतिदिन गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ़ करना चाहिए और फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए। इसके फलस्वरूप अपरस रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
    • अपरस रोग से पीड़ित रोगी को नीबू का रस पानी में मिलाकर प्रतिदिन कम से कम 5 बार पीना चाहिए और सादा भोजन करना चाहिए।
    • अपरस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को दाद वाले भाग पर रोजाना कम से कम 2 घण्टे तक नीला प्रकाश डालना चाहिए।
    • अपरस रोग से पीड़ित रोगी को आसमानी रंग की बोतल के सूर्यतप्त जल को 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन दिन में 4 बार पीने से अपरस रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
    • अपरस रोग से पीड़ित रोगी को नमक का सेवन नहीं करना चाहिए।
    • रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में स्नान करना चाहिए और उसके बाद घर्षण स्नान करना चाहिए और सप्ताह में 2 बार पानी में नमक मिलाकर स्नान करना चाहिए।
    • रोगी को अपने शरीर के अपरस वाले भाग को प्रतिदिन नमक मिले गर्म पानी से धोना चाहिए और उस पर जैतून का तेल या हरे रंग की बोतल व नीली बोतल का सूर्यतप्त तेल लगाना चाहिए। इसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।
    • रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन अपने शरीर के रोगग्रस्त भाग पर नीला प्रकाश डालना चाहिए। इसके अलावा रोगी को रोजाना हल्का व्यायाम तथा गहरी सांस लेनी चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।
    [12] सोरियासिस (छाल रोग) का घरेलू नुस्खों से इलाज-
    • बादाम 10 नग का पावडर बनाले। इसे पानी में उबालें। यह दवा सोरियासिस रोग की जगह पर लगावें। रात भर लगी रहने के बाद सुबह मे पानी से धो डालें। यह नुस्खा अच्छे परिणाम प्रदर्शित करता है।
    • एक चम्मच चंदन का पावडर लें। इसे आधा लिटर में पानी मे उबालें। तीसरा हिस्सा रहने पर उतार लें। अब इसमें थोडा गुलाब जल और शक्कर मिला दें। यह दवा दिन में 3 बार पियें। बहुत कारगर उपाय है।
    • पत्ता गोभी सोरियासिस में अच्छा प्रभाव दिखाता है। ऊपर का पत्ता लें। इसे पानी से धोलें। हथेली से दबाकर सपाट कर लें। इसे थोडा सा गरम करके प्रभावित हिस्से पर रखकर उपर सूती कपडा लपेट दें। यह उपचार लम्बे समय तक दिन में दो बार करने से जबर्दस्त फ़ायदा होता है।
    • पत्ता गोभी का सूप सुबह शाम पीने से सोरियासिस में लाभ होता है।
    • नींबू के रस में थोडा पानी मिलाकर रोग स्थल पर लगाने से सुकून मिलता है।
    • शिकाकाई पानी में उबालकर रोग के धब्बों पर लगाने से नियंत्रण होता है।
    • केले का पत्ता प्रभावित जगह पर रखें। ऊपर कपड़ा लपेटें।
    • इस रोग को ठीक करने के लिये जीवन शैली में बदलाव करना जरूरी है। सर्दी के दिनों में 3 लीटर और गर्मी के मौसम मे 5 से 6 लीटर पानी पीने की आदत बनावें। इससे विजातीय पदार्थ शरीर से बाहर निकलेंगे।
    •विटामिन `ई´ युक्त पदार्थों का अधिक सेवन करने से यह रोग कुछ ही महीनों में ठीक हो जाता है।
    [13] आहार का महत्त्व-
    १-व्यक्ति को जो आहार अच्छा लगे, वही उसके लिए उत्तम आहार है क्योंकि छाल रोग से पीड़ित व्यक्ति खान-पान की आदतों से उसी प्रकार लाभान्वित होता है जैसे हम सभी होते हैं। कई लोगों ने यह कहा है कि कुछ खाद्य पदार्थों से उनकी त्वचा में निखार आया है या त्वचा बेरंग हो गई है।
    २-सोरायसिस रोग से पीड़ित रोगी को दूध या उससे निर्मित खाद्य पदार्थ, मांस, अंडा, चाय, काफी, शराब, कोला, चीनी, मैदा, तली भुनी चीजें, खट्टे पदार्थ, डिब्बा बंद पदार्थ, मूली तथा प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए।
    ३-जौ, बाजरा तथा ज्वार की रोटी इस रोग से पीड़ित रोगी के लिए बहुत अधिक लाभदायक है।
    ४-नारियल, तिल तथा सोयाबीन को पीसकर दूध में मिलाकर प्रतिदिन पीने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
    आंवले का प्रतिदिन सेवन करने से रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
    ५-इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को 1 सप्ताह तक फलों का रस (गाजर, खीरा, चुकन्दर, सफेद पेठा, पत्तागोभी, लौकी, अंगूर आदि फलों का रस) पीना चाहिए। इसके बाद कुछ सप्ताह तक रोगी व्यक्ति को बिना पका हुआ भोजन खाना चाहिए जैसे- फल, सलाद, अंकुरित दाल आदि और इसके बाद संतुलित भोजन करना चाहिए
    ।

ब्रेन स्ट्रोक


जानलेवा हो सकता है ब्रेन स्ट्रोक
बिगड़ती जीवनशैली, अनियमित खानपान, हाइपरटेंशन और धूम्रपान की वजह से ब्रेन स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन ज्यादातर लोग अब भी इसकी गंभीरता से अनजान हैं। इलाज के बेहतर विकल्प उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को समय पर सही उपचार मिलने में परेशानी होती है। ब्रेन स्ट्रोक के बारे में कुछ प्रमुख जानकारी, आइए जानते हैं।
न्यूरोलॉजी  विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल हर छठा आदमी अपनी जिंदगी में कभी न कभी स्ट्रोक की समस्या से रूबरू होता है। हर छठे सेकंड में एक व्यक्ति की मौत स्ट्रोक से होती है।  60 से ऊपर की उम्र के लोगों में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण स्ट्रोक होता है। 15 से 59 आयुवर्ग में मृत्यु का पांचवां सबसे बड़ा कारण है। अगर आप इसके लक्षणों को जानते हैं और समय पर चिकित्सा के उपाय किए जाते हैं तो मरीज को बचाने में काफी सहूलियत हो सकती है।
क्या होती है प्रॉब्लम-
ब्रेन स्ट्रोक का सबसे सामान्य लक्षण होता है शरीर के किसी एक ओर के हिस्से में कमजोरी या लकवा जैसी स्थिति होना। स्ट्रोक होने पर ऐसा भी संभव है कि मरीज अपनी इच्छानुसार एक ओर के हाथ-पैर भी न हिला सके और कोई संवेदना भी महसूस न हो।
मरीज को बोलने में भी दिक्कत आ सकती है, और चेहरे की मांस पेशियां कमजोर हो जाती हैं जिससे लार बहने लगती है। सुन्न पडऩा या झुरझुरी होना भी इसका सामान्य लक्षण होता है।
स्ट्रोक आने के बाद 70 फीसदी मरीज अपनी सुनने और देखने की क्षमता खो देते हैं। साथ ही 30 फीसदी मरीजों को दूसरे लोगों के सहारे की जरूरत पड़ती है। आमतौर पर 20 फीसदी हृदय मरीजों को स्ट्रोक की समस्या होती है।

स्ट्रोक के दो प्रकार

स्किमिक स्ट्रोक-
धमनियों में चर्बी की मात्रा अधिक होने से वह पतली हो जाती है, जिससे ब्लॉकेज आ जाती है। इससे स्ट्रोक पड़ता है। इसे स्किमिक स्ट्रोक कहते हैं। 

ब्रेन हेमरेज -
यह स्ट्रोक ब्लड प्रेशर अधिक होने से होता है। इसमें ब्रेन के अन्दर रक्त नलिकाओं में लिकेज आ जाता है, जिससे ब्रेन हेमरेज हो जाता है। ब्रेन हेमरेज में ब्रेन के अन्दर भी लीकेज होता है और उसके सतह पर भी।
इन लक्षणों न करें नजरंदाज -
कई बार बड़े स्ट्रोक से पहले छोटा स्ट्रोक पड़ता है, जिसमें कुछ समय के लिए आंख की रोशनी चली जाती है और फिर लौट आती है। या फिर अंग का कोई हिस्सा कमजोर हो जाता है और फिर ठीक हो जाता है। ऐसा चक्कर व तेज सिर दर्द हो सकता है, जो जिंदगी में पहली बार हुआ हो। पीडि़त को सांस लेने में भी तकलीफ हो सकती है और वह अचेत भी हो सकता है।
क्यों होता है ऐसा
न्यूरो विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी की वजह से दिमाग की किसी रक्त नलिका में रक्त का जमाव हो जाता है। इसके कारण रक्त का बहाव नहीं हो पाता। इससे उस रक्त नालिका से जुड़े शरीर के अन्य भाग काम करना बंद कर देते हैं।  सर्दियों में ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों की संख्या गर्मियों की अपेक्षा बढ़कर लगभग दोगुनी हो जाती है। इसके पीछे कारण ये होता है कि सर्दियों में रक्त गाढ़ा हो जाता है। शरीर को गर्म रखने के लिए रक्तचाप भी बढ़ जाता है। इसके अलावा ठंड के मौसम में लोग बेहतर स्वास्थ्य के लिए ज्यादा कैलोरी युक्त भोजन लेने लगते हैं, जिससे कॉलेस्ट्रॉल काफी तेजी से बढ़ता है, और रक्त प्रवाह में अवरोध बनता है।

स्ट्रोक की स्थिति में क्या करें
मरीज को स्ट्रोक के साढ़े चार घंटे के अंदर ही अस्पताल पहुंचाने की कोशिश करें। अच्छा होगा कि पहले घंटे के अंदर ही सही चिकित्सक के पास पहुंचें। हार्ट अटैक की तरह बे्रन स्ट्रोक में भी पहला घंटा गोल्डर ऑवर माना जाता है। जांच व इलाज में देरी से ब्रेन को गंभीर नुकसान भी हो सकता है। अगर मरीज को सही इलाज मिल जाए तो कभी-कभी स्ट्रोक से पूरी तरह उबरा जा सकता है। यह मुमकिन न हो, तब भी इलाज से मरीज को बहुत कुछ अपने लायक बनाया जा सकता है। ध्यान रखें कि मरीज के पहले 48 से 72 घंटे बहुत नाजुक होते हैं।
अस्पताल में उपचार प्रक्रिया-
अस्पताल पहुंचने पर क्लीनिकल परीक्षण के बाद मस्तिष्क का सीटी स्कैन या एमआरआई किया जाता है। इस जांच से यह मसला सुलझ जाता है कि लकवा खून का दौरा रुकने से हुआ है या धमनी फटने से। डॉक्टर धमनियों के माध्यम से दवाइयां देते हैं, जो मस्तिष्क में जाकर रक्त के थक्के के तोड़ देती हैं। ऐसी दवाएं भी दी जाती हैं जिनसे मस्तिष्क की सूजन कम हो। कोशिश यह रहती है कि मस्तिष्क का कम-से-कम नुकसान हो और जीवन के लिए जरूरी क्रियाएं सुचारू रूप से चलती रहें। सांस चलाए रखना, शरीर को समुचित मात्र में द्रव और पोषक तत्व देने के लिए नाक से प्लास्टिक की ट्यूब से द्रव रूप में आहार देना, मूत्राशय में केथेटर लगाना, मल-त्याग पर नियंत्रण न रहने की स्थिति में साफ-सफाई, समय से करवट दिलाना, पेशियों की नियमित मालिश और व्यायाम जैसी अनेक चीजों पर ध्यान देने की सख्त जरूरत होती है। तुरंत इलाज मिल जाने पर मरीज के लाखों रुपये का खर्च भी बच जाता है। मरीज 2 से 3 दिन में पूरी तरह से स्वस्थ होकर घर जा सकता है।
दिनचर्या में रखें ध्यान-
आमतौर पर लोग यह सोचते हैं कि अगर स्ट्रोक हो भी गया, तो तीन घंटे का वक्त इलाज मिलने के लिए काफी होता है। इसलिए वे इसकी ज्यादा परवाह नहीं करते। लेकिन, कुछ ही लोग इतनी भाग्यशाली होते हैं कि उनके ऊपर दवा काम कर जाती हैं, लेकिन हर कोई उनकी तरह भाग्यशाली नहीं होता। इसे रोकने का एक ही तरीका है और वह है-बचाव। ऐसे लोगों को अपने लाइफ स्टाइल में बदलाव लाना चाहिए ताकि वे स्ट्रोक की स्टेज के आसपास भी न पहुंच पाएं।
हाई ब्लड प्रेशर, डायबीटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं से ग्रस्त लोग नियमित जांच कराते रहें। तनाव मुक्त जीवन जीने की सलाह दी जाती है। तनाव का भी असर ब्रेन स्ट्रोक पर पड़ता है।
मोटापे को हावी न होने दें ओर सही व संतुलित आहार को अपनी आदतों में ढालें।  शारीरिक रूप से सक्रियता बनाएं रखें और हो सके तो रोज उचित व्यायाम करें।
सिगरेट-तंबाकू का सेवन करते हों तो तुरंत बंद कर देंं। शराब पीने की आदत हो तो सीमित मात्रा में सेवन करें। साथ ही स्ट्रोक की चेतावनी देने वाले शरीर संकेतों को पहचानना सीखें।

Monday, 4 September 2017

ऍसिडिटी ( आम्लपित्त)

अम्लपित्त या ऍसिडिटी के कारण पेट में जलन होती है| इसका अनुभव लगभग कभी ना कभी सभीको होता है !कुछ वर्ष पहले हम जल्दबाजी, चिंता और तिखा आहार यह ऍसिडीटी के कारण मानते थे| लेकिन इससे केवल तत्कालिक ऍसिडिटी होती है| आधुनिक विज्ञान के अनुसार अब इसका असली कारण एच. पायलोरी जिवाणू है| यह संक्रमण दूषित खान-पानसे होता है|
कुछ लोगोंको गरम खाना, शराब, ऍलर्जी और तले हुए पदार्थोंके कारण तत्कालिक अम्लपित्त होता है| जादातर यह शिकायत कुछ समय बाद या उल्टी के बाद रूक जाती है|   तमाखू खानेसे या धूम्रपान के कारण ऍसिडिटी होती है| अरहर या चनादाल या बेसन के कारण कुछ लोगोंको अम्लपित्त होता है| मिर्च खानेसेभी ऍसिडिटी होती है|

 अम्लपित्त / एसिडीटी

इसको आयुर्वेदमे अम्लपित्त कहा जाता है ।

“अम्लगुणोद्रिक्तं पित्तं अम्लपित्तम । “ याने जिस व्याधीमे अम्लगुणसे पित्त ब‌ढ़ता है उसे अम्लपित्त कहा जाता है ।

अपने शरीरमे पित्त दो प्रकारका होता है । एक प्राकृत पित्त जो तीखे रसवाला रहता है और दुसरा विकृत पित्त जो अम्लरसका होता है ।

अम्लपित्त एक ऐआ व्याधी है जो तेयार होनेमे कई दिन तो क्या , कई महिनेभी लग सकते है । धीरे धीरे निर्माण होनेवाला ये व्याधी है  और इसिलिये उसपे उपचार लेते समय भी जल्द्बाजी करके फायदा नही होता है ।वर्षा ऋतूके प्रभावसे शरीरमे पित्त संचित होने लगता है । और ऐसी स्थितीमे अगर विरुद्धाहार, दुषित भोजन का सेवन, एक्दम खट्टे-जलन करनेवाले पदार्थोंका सेवन करना, जादा पानी पिना, नया धान्य-मद्य आदि का सेवन, फर्मेंटेड चीझोंका सेवन, खट्टा दहि या छाछ का अतिसेवन, जादा उपवास करना, रात को जागरन, दिनमे सोना, बाँसी चीझे खाना ऐसे कारनोंसे पित्त और जादा दुषित होता है और फिर अम्लपित्तकी शुरुवात होती है ।
भूक न लगना, छाती-कंठमे जलन होना, जी मचलना, अन्न का पचन न होना, क्लम ( बैठे बैठे थकान महसूस होना, खट्टी या कड़्वी ड़्कारे आना, अरुचि, पेट भराभरासा लगना, पेटमे दर्द, सिरदर्द, हृत्शूल, गैसेस, कभी कभी पतले दस्त होना, गुदामे जलन होना ये सब लक्षण अम्लपित्त के है ।

आयुर्वेदने अम्लपित्तके दो प्रकार वर्णन किये है । वह इस प्रकार –

१) उर्ध्वग अम्लपित्त – इसमे उल्टिया होती है । उल्टी का रंग हरा, पीला, नीला या काला रहता है । उल्टी एक्दम कड़्वी या खट्टी रहती है । उल्टी के बाद सिरद्रद, पेटमे जलन आदि लक्षण कम हो जाते है ।

२) अधोग अम्लपित्त – ये बहोत कम बार दिखनेवाला प्रकार है । इसमे उल्टीकी बजाय टट्टीद्वारा हरे / काले / पीले रंग का पित्त निकलता है । मल निकलते समय गुददाहभी होता है । इसमेभी पित्त निकल जानेके बाद सिरदर्द, पेटकी जलन आदि लक्षण कम हो जाते है ।

अम्लपित्त ये एक ऐसा व्याधी है जो औषधी की बजाय परहेज से जल्दी ठीक होता है । अगर परहेज पालन नही हो रहा है तो दवाई लेना व्यर्थ है ।
डॉक्टरी इलाज कब करे?
जलन और दर्द जादा हो और दवा से न रुके तब अपने डॉक्टर से मिलिए| हप्ते- दो हप्ते के बाद जलन और दर्द होता रहे तो डॉक्टरसे मिलना चाहिए| दर्द अगर एकाध बिंदू से जुडा हो तब अल्सर की संभावना होती है| इसके लिए डॉक्टरसे मिले| डॉक्टर गॅस्ट्रोस्कोपीकी सलाह दे सकते है| गॅस्ट्रोस्कोपीका मतलब है दुर्बीनसे जठरका अंदरुनी स्थिती देखना|
रोकथाम- तीखे, मसालेदार और जादा गरम पदार्थ, तमाखू, धूम्रपान और शराब सेवन न करे| अरहर, चनादाल या बेसनसे मूँग अच्छा होता है|अम्लपित्त ऍलर्जीका प्रभाव हो तो आहार में उस चीज का पता करना पडेगा| जाहिर है की इस पदार्थको न खाए| योगशास्त्रनुसार तनाव से छुटकारा होनेपर ऍसिडिटी कम होती है| इसके लिये योग उपयोगी है|
एच. पायलोरी जीवाणू संक्रमण टालनेके लिए खानापिना साफ सुथरा चाहिए| दर्द और जलन अक्सर होती रहे तो जल्दी ही डॉक्टरसे मिलकर अल्सर याने छाला टालना चाहिए|

Sunday, 3 September 2017

रक्तचाप

रक्तचाप (अंग्रेज़ी:ब्लड प्रैशर) रक्तवाहिनियों में बहते रक्त द्वारा वाहिनियों की दीवारों पर द्वारा डाले गये दबाव को कहते हैं। धमनियां वह नलिका है जो पंप करने वाले हृदय से रक्त को शरीर के सभी ऊतकोंऔर इंद्रियों तक ले जाते हैं। हृदय, रक्त को धमनियों में पंप करके धमनियों में रक्त प्रवाह को विनियमित करता है और इसपर लगने वाले दबाव को ही रक्तचाप कहते हैं। किसी व्यक्ति का रक्तचाप, सिस्टोलिक/डायास्टोलिक रक्तचाप के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है। जैसे कि १२०/८० सिस्टोलिक अर्थात ऊपर की संख्या धमनियों में दाब को दर्शाती है। इसमें हृदय की मांसपेशियां संकुचित होकर धमनियों में रक्त को पंप करती हैं। डायालोस्टिक रक्त चाप अर्थात नीचे वाली संख्या धमनियों में उस दाब को दर्शाती है जब संकुचन के बाद हृदय की मांसपेशियां शिथिल हो जाती है। रक्तचाप हमेशा उस समय अधिक होता है जब हृदय पंप कर रहा होता है बनिस्बत जब वह शिथिल होता है। एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति का सिस्टोलिक रक्तचाप पारा के 90 और १२० मिलिमीटर के बीच होता है। डायालोस्टिक रक्तचाप पारा के ६० से ८० मि.मि. के बीच होता है। वर्तमान दिशा-निर्देशों के अनुसार सामान्य रक्तचाप १२०/८० होना चाहिए। रक्तचाप को मापने वाले यंत्र को रक्तचापमापी या स्फाइगनोमैनोमीटर कहते हैं

निम्न रक्तचाप- निम्न रक्तचाप (हाइपोटेंशन) वह दाब है जिससे धमनियों और नसों में रक्त का प्रवाह कम होने के लक्षण या संकेत दिखाई देते हैं। जब रक्त का प्रवाह काफी कम होता हो तो मस्तिष्क, हृदय तथा गुर्दे जैसे महत्वपूर्ण इंद्रियों में ऑक्सीजन और पौष्टिक पदार्थ नहीं पहुंच पाते जिससे ये इंद्रियां सामान्य रूप से काम नहीं कर पाती और इससे यह स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती है। उच्च रक्तचाप के विपरीत, निम्न रक्तचाप की पहचान मूलतः लक्षण और संकेत से होती है, न कि विशिष्ट दाब संख्या के। किसी-किसी का रक्तचाप ९०/५० होता है लेकिन उसमें निम्न रक्त चाप के कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते हैं और इसलिए उन्हें निम्न रक्तचाप नहीं होता तथापि ऐसे व्यक्तियों में जिनका रक्तचाप उच्च है और उनका रक्तचाप यदि १००/६० तक गिर जाता है तो उनमें निम्न रक्तचाप के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। यदि किसी को निम्न रक्तचाप के कारण चक्कर आता हो या मितली आती हो या खड़े होने पर बेहोश होकर गिर पड़ता हो तो उसे आर्थोस्टेटिक उच्च रक्तचाप कहते हैं। खड़े होने पर निम्न दाब के कारण होने वाले प्रभाव को सामान्य व्यक्ति शीघ्र ही काबू में कर लेता है। लेकिन जब पर्याप्त रक्तचाप के कारण चक्रीय धमनी में रक्त की आपूर्ति नहीं होती है तो व्यक्ति को सीने में दर्द हो सकता है या दिल का दौरा पड़ सकता है। जब गुर्दों में अपर्याप्त मात्रा में खून की आपूर्ति होती है तो गुर्दे शरीर से यूरिया और क्रिएटाइन जैसे अपशिष्टों को निकाल नहीं पाते जिससे रक्त में इनकी मात्रा अधिक हो जाती है

उच्च रक्तचाप- १३०/८० से ऊपर का रक्तचाप, उच्च रक्तचाप या हाइपरटेंशन कहलाता है। इसका अर्थ है कि धमनियों में उच्च चाप (तनाव) है। उच्च रक्तचाप का अर्थ यह नहीं है कि अत्यधिक भावनात्मक तनाव हो। भावनात्मक तनाव व दबाव अस्थायी तौर पर रक्त के दाब को बढ़ा देते हैं। सामान्यतः रक्तचाप १२०/८० से कम होनी चाहिए और १२०/८० तथा १३९/८९ के बीच का रक्त का दबाव पूर्व उच्च रक्तचाप (प्री हाइपरटेंशन) कहलाता है और १४०/९० या उससे अधिक का रक्तचाप उच्च समझा जाता है। उच्च रक्तचाप से हृदय रोग, गुर्दे की बीमारी, धमनियों का सख्त हो जाने, आंखे खराब होने और मस्तिष्क खराब होने का जोखिम बढ़ जाता है। है। युवाओं में ब्लड प्रेशर की समस्या का मुख्य कारण उनकी अनियमित जीवन शैली और गलत खान-पान होते हैं। यदि चक्कर आयें, सिर दर्द हो, साँस में तक़लीफ़ हो, नींद न आए, शीथीलता रहे, कम मेहनत करने पर सांस फूले और नाक से खून गिरे इत्यादि तो चिकित्सक से जांच करायें, संभव है ये उच्च रक्तचाप के कारण हो।

 उच्च रक्तचाप के कारण- 

  • चिंता, क्रोध, ईर्ष्या, भय आदि मानसिक विकार

  • कई बार, बार-बार या आवश्यकता से अधिक खाना।

  • मैदा से बने खाद्य, चीनी, मसाले, तेल-घी अचार, मिठाईयां, मांस, चाय, सिगरेट व शराब आदि का सेवन।

  • नियमित खाने में रेशे, कच्चे फल और सलाद आदि का अभाव।

  • श्रमहीन जीवन, व्यायाम का अभाव।

  • पेट और पेशाब संबंधी पुरानी बीमारी।

  • रक्त चाप बढने से तेज सिर दर्द,थकावट,टांगों में दर्द ,उल्टी होने की शिकायत और चिडचिडापन होने के लक्छण मालूम पडते हैं। यह रोग जीवन शैली और खान-पान की आदतों से जुडा होने के कारण केवल दवाओं से इस रोग को समूल नष्ट करना संभव नहीं है। जीवन चर्या एवं खान-पान में अपेक्षित बदलाव कर इस रोग को पूरी तरह नियंत्रित किया सकता है।
    हाई ब्लड प्रेशर के मुख्य कारण--
    १) मोटापा
    २) तनाव(टेंशन)
    ३) महिलाओं में हार्मोन परिवर्तन
    ४) ज्यादा नमक उपयोग करना
    अब यहां ऐसे सरल घरेलू उपचारों की चर्चा की जायेगी जिनके सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करने से बिना गोली केप्सुल लिये इस भयंकर बीमारी पर पूर्णत: नियंत्रण पाया जा सकता है-
    १) सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रोगी को नमक का प्रयोग बिल्कुल कम कर देना चाहिये। नमक ब्लड प्रेशर बढाने वाला प्रमुख कारक है।
    २) उच्च रक्तचाप का एक प्रमुख कारण है रक्त का गाढा होना। रक्त गाढा होने से उसका प्रवाह धीमा हो जाता है ! 
    इससे धमनियों और शिराओं में दवाब बढ जाता है।लहसुन ब्लड प्रेशर ठीक करने में बहुत मददगार घरेलू वस्तु है।यह रक्त का थक्का नहीं जमने देती है। धमनी की कठोरता में लाभदायक है। रक्त में ज्यादा कोलेस्ट्ररोल होने की स्थिति का समाधान करती है।

    ३)एक बडा चम्मच आंवला का रस और इतना ही शहद मिलाकर सुबह -शाम लेने से हाई ब्लड प्रेशर में लाभ होता है।

    ४) जब ब्लड प्रेशर बढा हुआ हो तो आधा गिलास मामूली गरम पानी में काली मिर्च पावडर एक चम्मच घोलकर २-२ घंटे के फ़ासले से पीते रहें। ब्लड प्रेशर सही मुकाम पर लाने का बढिया उपचार है।

    ५) तरबूज का मगज और पोस्त दाना दोनों बराबर मात्रा में लेकर पीसकर मिला लें। एक चम्मच सुबह-शाम खाली पेट पानी से लें।३-४ हफ़्ते तक या जरूरत मुताबिक लेते रहें।

    ६) बढे हुए ब्लड प्रेशर को जल्दी कंट्रोल करने के लिये आधा गिलास पानी में आधा निंबू निचोडकर २-२ घंटे के अंतर से पीते रहें। हितकारी उपचार है।

    ७) तुलसी की १० पती और नीम की ३ पत्ती पानी के साथ खाली पेट ७ दिवस तक लें।

    ८) पपीता आधा किलो रोज सुबह खाली पेट खावें। बाद में २ घंटे तक कुछ न खावें। एक माह तक प्रयोग से बहुत लाभ होगा।

    ९) नंगे पैर हरी घास पर १५-२० मिनिट चलें। रोजाना चलने से ब्लड प्रेशर नार्मल हो जाता है।

    १०) सौंफ़,जीरा,शकर तीनों बराबर मात्रा में लेकर पावडर बनालें। एक गिलास पानी में एक चम्मच मिश्रण घोलकर सुबह-शाम पीते रहें।

    ११) उबले हुए आलू खाना रक्त चाप घटाने का श्रेष्ठ उपाय है।आलू में सोडियम(नमक) नही होता है।

    पालक और गाजर का रस मिलाकर एक गिलास रस सुबह-शाम पीयें। अन्य सब्जीयों के रस भी लाभदायक होते हैं।

    १३) नमक दिन भर में ३ ग्राम से ज्यादा न लें।

    १४) अण्डा और मांस ब्लड प्रेशर बढाने वाली चीजें हैं। ब्लड प्रेशर रोगी के लिये वर्जित हैं।

    १५) करेला और सहजन की फ़ली उच्च रक्त चाप-रोगी के लिये परम हितकारी हैं।

    १६) केला,अमरूद,सेवफ़ल ब्लड प्रेशर रोग को दूर करने में सहायक कुदरती पदार्थ हैं।

    १७) मिठाई और चाकलेट का सेवन बंद कर दें।

    १८)सूखे मेवे :--जैसे बादाम काजू, आदि उच्च रक्त चाप रोगी के लिये लाभकारी पदार्थ हैं।

    १९)चावल:-(भूरा) उपयोग में लावें। इसमें नमक ,कोलेस्टरोल,और चर्बी नाम मात्र की होती है। यह उच्च रक्त चाप रोगी के लिये बहुत ही लाभदायक भोजन है। इसमें पाये जाने वाले केल्शियम से नाडी मंडल की भी सुरक्षा हो जाती है।

    २०)अदरक:-प्याज और लहसून की तरह अदरक भी काफी फायदेमंद होता है। बुरा कोलेस्ट्रोल धमनियों की दीवारों पर प्लेक यानी कि कैलसियम युक्त मैल पैदा करता है जिससे रक्त के प्रवाह में अवरोध खड़ा हो जाता है और नतीजा उच्च रक्तचाप के रूप में सामने आता है। अदरक में बहुत हीं ताकतवर एंटीओक्सीडेट्स होते हैं जो कि बुरे कोलेस्ट्रोल को नीचे लाने में काफी असरदार होते हैं। अदरक से आपके रक्तसंचार में भी सुधार होता है, धमनियों के आसपास की मांसपेशियों को भी आराम मिलता है जिससे कि उच्च रक्तचाप नीचे आ जाता है।

    २०)लालमिर्च:-धमनियों के सख्त होने के कारण या उनमे प्लेक जमा होने की वजह से रक्त वाहिकाएं और नसें संकरी हो जाती हैं जिससे कि रक्त प्रवाह में रुकावटें पैदा होती हैं। लेकिन लाल मिर्च से नसें और रक्त वाहिकाएं चौड़ी हो जाती हैं, फलस्वरूप रक्त प्रवाह सहज हो जाता है और रक्तचाप नीचे आ जाता है।

उच्च रक्त चाप का निदान महत्वपूर्ण है जिससे रक्त चाप को सामान्य करके जटिलताओं को रोकने का प्रयास संभव हो। फार्मैकोॉजी विभाग, कोलोन विश्वविद्यालय, जर्मनी में हुई एक शोध के अनुसार चॉकलेट खाने और काली व हरी चाय पीने से रक्तचाप नियंत्रण में रहता है। कनाडा के शोधकर्त्ता रॉस डी.फेल्डमैन के अनुसार उच्च रक्तचाप के रोगियों की विशेष देखभाल और जांच की जरूरत होती है, इससे दिल के दौरे की आशंका एक-चथाई कम हो सकती है वहीं मस्तिष्काघात की भी सम्भावना ४० प्रतिशत कम हो सकती है

थायराइड -एक गंभीर समस्‍या

आज थायराइड एक गंभीर समस्‍या बन गई है। थायराइड शरीर का एक प्रमुख एंडोक्राइन ग्लैंड है जो तितली के आकार का होता है एवं गले में स्थित है। इसमें से थायराइड हार्मोन का स्राव होता है जो हमारे मेटाबॉलिज्म की दर को संतुलित करता है। यह हार्मोन मेटाबॉलिज्म को बनाए रखने के लिए जरूरी होती हैं। यह थाइराक्सिन नामक हार्मोन बनाती है, जिससे शरीर की एनर्जी का क्षय, प्रोटीन उत्पादन एवं अन्य हार्मोन के प्रति होने वाली संवेदनशीलता नियंत्रित होती है। थायराइड हार्मोन का स्राव असंतुलित हो जाने पर शरीर की समस्त कार्यप्रणालियां अव्यवस्थित हो जाती हैं। इस रोग में काफी दिक्कत होती है। कभी वजन अचानक से बढ़ जाता है तो कभी अचानक से कम हो जाता है। 

आज थायराइड मानव जाति के लिए एक बेहद गंभीर समस्‍या बन गई है। क्‍योंकि थायराइड को साइलेंट किलर माना जाता है, और लक्षण व्यक्ति को धीरे-धीरे पता चलते हैं और जब इस बीमारी का निदान होता है तब तक देर हो चुकी होती है। इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी से इसकी शुरुआत होती है। जिसके चलते छोटे रोगों से लेकर बड़े-बड़े रोग उत्पन्न होने लगते है, और लोग इसे कंट्रोल करने के लिए दवा खा-खा कर परेशान हो रहे हैं। एलोपैथी में इसका कोई इलाज भी नहीं हैं, बस जीवन भर दवाई लेते रहो, फिर भी पूरी तरह से कोई आराम नहीं। 

थायराइड क्या होता है? 

Thyroid गले में स्थित एक ग्रंथि (gland) का नाम है। यह ग्लैंड गले के आगे के हिस्से में मौजूद होता है और इसका आकार एक तितली के समान होता है। यह बॉडी के कई तरह के metabolic processes*को control करने के काम आता है

थायराइड की समस्याएं क्या होती हैं?

Thyroid Gland से produce होने वाले hormones शरीर में होने वाले सभी मेटाबोलिक प्रक्रियाओं को affect करते हैं। थायराइड disorders से घेंघा जैसी छोटी बीमारी से लेकर जानलेवा कैंसर तक हो सकता है। लेकिन जो सबसे common थायराइड प्रॉब्लम होती है वो है थायराइड हॉर्मोन्स का सही मात्रा में प्रोडक्शन ना होना। इसमें दो तरह की समस्या आती है-
  1. Hyperthyroidism (हाइपरथायरायडिज्म / अतिगलग्रंथिता ): ज़रुरत से अधिक hormones का पैदा होना
  2. Hypothyroidism (हाइपोथायरायडिज्म / अवटु-अल्पक्रियता): ज़रूअत से कम हॉर्मोन्स का प्रोडक्शन होना
इन  समस्याओं की वजह से कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं, लेकिन अगर सही से diagnose करके इलाज किया जाए तो इन्हें अच्छे से manage किया जा सकता है।
अगर आप भी इस समस्‍या से जूझ रहे हैं तो आज हम आपको एक ऐसे घरेलू उपाय के बारे में बता रहे है जिसे आप बिना किसी संकोच के कर सकते हैं।
थायराइड के लिए 10 जड़ी बूटी----थायराइड ग्रंथि के ठीक से काम न करने से रक्त में थायराक्सिन नामक हार्मोन का स्तर पर प्रभाव पड़ता है। इस प्रभाव को दो श्रेणी हाइपरथायराइडिज्म और हाइपोथायाराइडिज्म में रखा जाता है। इस स्थिति में वजन बढ़ने या घटने की समस्या होती है। इस महत्वपूर्ण हार्मोनल ग्रंथि को स्वस्थ व संतुलित बनाये रखने के लिए कुछ जड़ी बूटियां उपयोगी साबित हो सकती है।
मुलेठी--- मुलेठी थायराइड ग्‍लैंड में संतुलन बना कर रखता है जिससे थायराइड के मरीजों में होने वाली थकान एनर्जी में बदलती है। 2011 में, टेक्सास में बायोसाइंसेज और टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट के अनुसार, मुलेठी में पाया जाने वाला प्रमुख घटक ट्रीटरपेनोइड ग्लाइसेरीथेनिक एसिड अत्यधिक आक्रामक होता है जो थायराइड कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकता है।
अश्वगंधा- अश्वगंधा एक ऐसी जड़ी बूटी है जिसमें मौजूद एंटीऑक्‍सीडेंट गुण हार्मोन की सही मात्रा में उत्पादन कर थायराइड को रोकने का कम काम करता है। हार्मोन संतुलन के साथ, अश्वगंधा में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी प्रभाव के कारण यह प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार कर तनाव से मुक्ति दिलाता है
गेहूं का ज्‍वारा- गेहूं का ज्‍वारा प्रकृति की अनमोल देन है। इसमें अनेक औषधीय और रोग निवारक गुण पाए जाते हैं। गेहूं का ज्‍वारा रक्त व रक्त संचार संबंधी रोगों, रक्त की कमी, उच्च रक्तचाप, सर्दी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, साइनस, पाचन संबंधी रोग और थायराइड ग्रंथि के रोग में काम आता है
अलसी- अलसी में ओमेगा-3 फैटी एसिड भरपूर मात्रा में पाया जाता है। यह एसिड थायरायड ग्रंथि के सही तरीके से काम करने में आवश्‍यक भूमिका निभाता है। हाइपोथायरायडिज्म से पीड़ित लोगों को अलसी और अलसी के तेल का प्रयोग जरूर करना चाहिए।
अदरक- अदरक जिंक, मैग्नीशियम और पौटेशियम का एक अच्छा स्रोत है। इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण थायराइड की कार्यक्षमता में सुधार लाने में मदद करते हैं। हाइपोथायरायडिज्म से पीड़ित लोगों को अपने आहार में इसको शामिल करना चाहिए। अदरक का उपयोग आहार में भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार से कर सकते हैं
इचिन्‍सिया- इचिन्‍सिया एक लोकप्रिय जड़ी-बूटी है, इसका उपयोग प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार करने के लिए किया जाता है। इचिन्‍सिया में मौजूद तत्व हाइपोथायरायडिज्म से पी‍ड़‍ित लोगों के इससे निजात दिलाते हैं।
ब्लैडररैक- यह एक प्रकार का हर्ब है जिसका प्रयोग हाइपोथायराडिज्म समेत कई बीमारियों में होता है। इस समुद्री शैवाल में प्राकृतिक आयोडीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है जो थायराइड ग्रंथि को संतुलित करने के लिए जाना जाता है।
बाकोपा- अगर आप थायराइड की समस्या से ग्रस्त हैं तो आप बाकोपा नामक जड़ी बूटी की मदद ले सकते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक बकपा एक शक्तिशाली जड़ी बूटी जो थायराइड ग्रंथि को संतुलित करने के काम करती है।
काले अखरोट- सीफूड के अलावा काले अखरोट को आयोडीन का सबसे अच्छा स्रोत माना जाता है। विभिन्‍न अनुसंधान से पता चलता है कि आयोडीन एक आवश्‍यक पोषक तत्‍व है जो थायराइड ग्रंथि के स्वास्थ्य और कामकाज को ठीक रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
नींबू बाम- मिंट परिवार से सं‍बंधित नींबू बाम एक अद्भुत जड़ी बूटी है। इस जड़ी बूटी को थायरॉयड ग्रंथि के लिए फायदेमंद माना जाता है। रिसर्च बताते है‍ कि यह जड़ी बूटी अति थायरॉयड ग्रंथि की गतिविधियों को सामान्य बनाने में उपयोगी होती है। साथ ही यह थायराइड हार्मोन का उत्पादन भी कम करता है

स्वाइन फ्लू

स्वाइन फ्लू-वायरल बुखार है जो वायरस से फैलता है। बारिश की वजह से स्वाइन फ्लू का वायरस और घातक हो जाता है। वातावरण में नमी बढ़ने के साथ ही यह तेजी से फैलने लगता है। यही वजह है कि मौसम बदलने के साथ एकाएक इसके मामलों की बाढ़ सी आ गई है। यदि बारिश के मौसम में आपको सर्दी, खांसी और बुखार हो और यह 2-3 दिनों में ठीक न हो, तो H1N1 की जांच कराएं !   स्वाइन फ्लू उन्हीं व्यक्तियों में होता है, जिनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। इसके आसान टार्गेट पहले से बीमार चल रहे मरीज, गर्भवती महिलाएं आदि होते हैं !   अगर घर में कोई शख्स स्वाइन फ्लू की चपेट में आ गया हो तो, घर के बाकी लोगों को भी इससे बचने के लिए डॉक्टरी सलाह लेकर दवा खा लेनी चाहिए। स्वाइन फ्लू से बचाव ही इसे रोकना का सबसे बड़ा उपाय है। आराम करना, खूब पानी पीना, शरीर में पानी की कमी न होने देना इसका सबसे बेहतर उपाय है।
क्या है स्वाइन फ्लू ?
स्वाइन फ्लू , इनफ्लुएंजा यानी फ्लू वायरस के अपेक्षाकृत नए स्ट्रेन इनफ्लुएंजा वायरस A से होने वाला इनफेक्शन है। इस वायरस को ही H1N1 कहा जाता है। इसके इनफेक्शन ने 2009 और 10 में महामारी का रूप ले लिया था-लेकिन WHO ने 10 अगस्त 2010 में इस महामारी के खत्म होने का भी ऐलान कर दिया था। अप्रैल 2009 में इसे सबसे पहले मैक्सिको में पहचाना गया था। तब इसे स्वाइन फ्लू इसलिए कहा गया था क्योंकि सुअर में फ्लू फैलाने वाले इनफ्लुएंजा वायरस से ये मिलता-जुलता था। 

क्या है स्वाइन फ्लू के लक्षण ?
स्वाइन फ्लू के लक्षण भी सामान्य एन्फ्लूएंजा जैसे ही होते हैं 
-नाक का लगातार बहना, छींक आना
-कफ, कोल्ड और लगातार खांसी 
-मांसपेशियां में दर्द या अकड़न 
-सिर में भयानक दर्द
-नींद न आना, ज्यादा थकान 
-दवा खाने पर भी बुखार का लगातार बढ़ना
-गले में खराश का लगातार बढ़ते जाना

स्वाइन फ्लू का वायरस तेजी से फैलता है। कई बार मरीज के आसपास रहने वाले लोगों और तिमारदारों को चपेट में ले लेता है। लिहाजा, किसी में स्वाइन फ्लू के लक्षण दिखें तो उससे कम से कम तीन फीट की दूरी बनाए रखना चाहिए, स्वाइन फ्लू का मरीज जिस चीज का इस्तेमाल करे, उसे भी नहीं छूना चाहिए।

कैसे फैलता है स्वाइन फ्लू? 
-स्वाइन फ्लू का वायरस हवा में ट्रांसफर होता है 
-खांसने, छींकने, थूकने से वायरस सेहतमंद लोगों तक पहुंच जाता है

डॉक्टरों का ये भी कहना है कि अगर किसी घर में कोई शख्स स्वाइन फ्लू की चपेट में आ गया तो, घर के बाकी लोगों को इससे बचने के लिए डॉक्टरी सलाह ले कर खुद भी इसकी दवाईयां खानी चाहिए। 

स्वाइन फ्लू से बचाव इसे रोकना का बड़ा उपाय है, हालांकि इसका इलाज भी अब मौजूद है। आराम करना, खूब पानी पीना, शरीर में पानी की कमी न होने देना इसका सबसे बेहतर है। शुरुआत में पैरासीटमॉल जैसी दवाएं बुखार कम करने के लिए दी जाती हैं। बीमारी के बढ़ने पर एंटी वायरल दवा ओसेल्टामिविर (टैमी फ्लू) और जानामीविर (रेलेंजा) जैसी दवाओं से स्वाइन फ्लू का इलाज किया जाता है।

लेकिन इन दवाओं को कभी भी खुद से नहीं लेना चाहिए। वैसे सर्दी-जुखाम जैसे लक्षणों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली तुलसी, गिलोए, कपूर, लहसुन, एलोवीरा, आंवला जैसी आयुर्वेदिक दवाईयों का भी स्वाइन फ्लू के इलाज में बेहतर असर देखा गया है। सर्दियों में इन्हें लेने से वैसे भी जुखाम तीन फिट की दूरी पर रहता है, और स्वाइन फ्लू के वायरस से बचने के लिए भी इतने ही फासले की जरूरत होती है।